आर्यों को बाहरी बताने और मनुस्मृति को जलाने से वामपंथियों को भला क्या फायदा!

“तुम्हारी पुस्तक ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’ पढ़ी, अच्छी लगी, व्यवहारिक और गहरी बातें लिखी हैं।”

कुछ दिन पूर्व ही उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए एक वरिष्ठ नागरिक के साथ शाम की चाय पर उनसे चर्चा हो रही थी।

-जी धन्यवाद।

“मैंने भी पढ़ी है, मुझे भी बहुत अच्छी लगी, सरल हिंदी में थी तो पढ़ ली, नहीं तो मैं हिंदी की किताबें नहीं पढ़ पाती।”

-मैडम मातृभाषा सदा ही सरल होती है और फिर यह तो हमारी अपनी संस्कृति के बारे में है तो फिर सरल तो लगनी ही थी। बल्कि अगर मैं यही पुस्तक अंग्रेज़ी में लिखता तो शायद आप इतना पसंद नहीं करतीं।

“हाँ यह भी ठीक कह रहे हो।” एक वरिष्ठ अफसर की धर्मपत्नी इतनी जल्दी मान जाएगी, यकीन नहीं था।

“आजकल क्या लिख रहे हो?” अधिकारी ने बात आगे बढ़ाई थी।

-आर्यों की कथा ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ लिख रहा हूँ।

“अब यह मत कह देना कि आर्य बाहर से नहीं आये थे।”

-कितनी आसानी से बोल दिया आप ने, मगर आप के पास आर्यों के बाहरी होने का क्या आधार है?

“इतिहास की किताबें भरी पड़ी हैं।”

-आप तो इतिहास के छात्र रहे हैं, क्या बता सकते हैं कि इतिहासकारों के पास ऐसा कहने का क्या आधार है, क्या प्रमाण है। उन्होंने तो सिर्फ शंका के आधार पर एक पूरी कहानी गढ़ दी।

“कौन सी शंका? बड़े बड़े इतिहासकार ने यह माना और इसपर लिखा है।”

-यह बड़े होने का क्या पैमाना है और बड़ा किसने बनाया? बहरहाल, मेरे लिए उनका बड़ा होना कोई मायने नहीं रखता क्योंकि सामान्य से सवाल के जवाब भी वे अब तक नहीं दे पाए।

“कौन सा सवाल, कोई एक पूछो।”

-क्या वे बता सकते हैं कि यह उनके वाले आर्य कहाँ से आये थे, और अगर कहीं से आते तो अपने मूलस्थल का कहीं तो उल्लेख करते। अभी तक वे अनुमान ही लगा रहे हैं कि यहां से नहीं तो वहां से आये थे।

“तो आप के पास क्या प्रमाण है कि आर्य यहीं के हैं। मैं यहां हवा हवाई पौराणिक कथाओं को आधार नहीं मानूँगा।”

-वैसे तो पौराणिक कथाओं में भी इतिहास है मगर आप नहीं मानेंगे जानता हूँ, बल्कि भारत में कोई भी पढ़ा लिखा नहीं मानता, यह हमारा दुर्भाग्य और हमारी शिक्षा पद्धति का दुष्परिणाम, इसपर फिर कभी बात करेंगे, फिलहाल अगर मैं यहां अपनी बात के समर्थन में कोई लिखित तथ्य दूँ तो उस को तो मानेंगे।

“क्यों नहीं मानेंगे, कोई भी मानेगा।”

-मैं यूं तो अनेक तथ्य और तर्क विस्तार से पुस्तक में दे रहा हूँ, उनमें से यहां एक-दो ही रख रहा हूँ। यह तो आप मानेंगे कि वेद प्राचीनतम लिखित ग्रंथ हैं और आर्यों से संबंधित हैं।

“जी हाँ”

-उसी वेद में सरस्वती नदी का वर्णन है और सरस्वती नदी इसी भारत भूखंड में थी।

“मगर कहा जाता है कि वो वर्णन शिक्षा व ज्ञान की देवी सरस्वती के संदर्भ में है।”

-मुझे खुशी है कि आप वही सवाल पूछ रहे हैं जिसे वामपंथ ने फैलाकर कुतर्क गढ़े, लेकिन मगर फिर उनका जवाब नहीं सुना। यूं तो ऋग्वेद में सरस्वती नदी की स्तुति में अनेक ऋचाएं हैं, मगर छठे मंडल के 61वें सूक्त की ऋचाओं में उसके नदी रूप का ही वर्णन है जैसे कि 6.61.2 में उसके प्रबल वेग की चर्चा है तो 6.61.11 में उसके क्षितिज तक फैले पाट की और 6.61.12 में कहा गया कि अनेक नदियां इसमें मिलती है।

और तो और, पता नहीं ऋषि विश्वामित्र को यह कैसे पता था कि कलयुग में कोई शंका कर सकता है, जो उन्होंने अपनी ऋचा 1.3.12 में साफ़ साफ कहा हैं कि जिस तरह सरस्वती नदी ने जल राशि उत्पन्न की उसी तरह से सुमति को जगाने वाली सरस्वती देवी ने सभी यज्ञ करने वालो की ज्ञान बुद्धि को प्रखर किया।

“अब मैंने वेद तो पढ़े नहीं, आप आजकल पढ़ रहे हो तो आप को याद है।”

-तो आप भी पढ़ लीजिये, अपने ही ग्रंथ हैं। और फिर यह तो और अधिक दुखद है कि आप जैसा प्रबुद्ध बिना पढ़े एक की बात आँख बंद करके मानता आ रहा है! चलिए आप को एक ऐसे की बात बताता हूँ जिसका नाम आप सुन चुके होंगे। आपने उर्वशी अप्सरा का नाम तो सुना ही होगा?

“जी हाँ, मगर वो भी काल्पनिक है और एक कथा की पात्र हैं।”

-एक बार के लिए मान लिया कि वो हमारी कथाओं में एक काल्पनिक पात्र है मगर हमारी उस काल्पनिक उर्वशी का नाम वेद में आता है। दसवे मंडल का 95 सूक्त में राजा पुरुरवा और उर्वशी का प्रेम संवाद है। अब यह तो आप मानेगे कि हमारी कल्पना और वेद की कल्पना एक ही है। क्या यह प्रमाण नहीं हुआ? अच्छा चलिए मनु को क्या कहेंगे, काल्पनिक या वास्तविक?

“……”

-अच्छा हुआ आप ने इसका जवाब नहीं दिया। मैं बताता हूँ क्यों? अगर आप मनु को भी काल्पनिक कहेंगे तो फिर आप को अपने उन वामपंथी मित्रों से यह कहना होगा कि काल्पनिक मनु की मनुस्मृति को जलाना बंद करें, जो वे बिना पढ़े जलाते आएं हैं।

और अगर मनुस्मृति को एक ग्रंथ मानते हैं तो मनु को भी मानना होगा, यह मैं बता दूँ कि उसी मनु का वर्णन ऋग्वेद में 1.80.16 में और अन्य स्थानों पर भी हुआ है। वैसे यह स्पष्ट करता चलूँ कि मनु हम सब मानव के पितामह हैं, हम मानव के जन्मदाता नहीं। इसी मनु से हम मनुज व मानव कहलाये और इसी से अंगरेज़ी का शब्द मैन भी बना।

“अच्छा अध्ययन कर रहे हो, गुड, मगर यह बतलाओ कि आर्य को बाहरी घोषित कर देने और मनुस्मृति को जलाने से हिंदुस्तान के वामपंथियों को क्या फायदा मिलेगा?”

-इसे एजेंडा राइटिंग कह सकते हैं। लिखवाने वाले ने कुछ देकर लिखवाया और लिखने वाले ने कुछ लेकर लिखवाने वाले का फायदा किया।

“वो कैसे?”

-आप सब जानते हैं मगर मेरे ही मुँह से अगर सुनना चाहते हैं, खैर हमारे विदेशी शासक जो सब बाहरी थे उन्होंने अपने बाहरी होने को भी उचित ठहराने के लिए यह सब लिखवाया। इसे एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है जैसे कि आजकल चौकीदार को चोर बोल दिया गया।

“अब यह क्या बात हुई, कुछ तो होगा, नहीं तो ऐसे ही नहीं कोई बोल सकता।” अब तक चुपचाप सुन रही मैडम ने अचानक कहा था।

-यह कुछ तो क्या होता है, इस पर विश्वास करने से पहले सामान्य से सवाल तो पूछने चाहिए कि 100 रूपये के काम में 200 रूपये की चोरी कैसे हो सकती है? और फिर चौकीदार उस चोरी के माल से क्या कर रहा है, क्या चौकीदार का नाम देश-दुनिया की अमीरों की सूची में आ गया, क्या उनकी माता दिल्ली-मुंबई के किसी भव्य बंगले में रहने लगीं, क्या उनका परिवार चार्टेड हवाईजहाज़ में उड़ने लगा, क्या उनके किसी जीजी-जीजाजी या भाई-भाभी ने अचानक करोड़ो का धंधा शुरू कर दिया? आखिर उस चोरी के माल को चौकीदार ने ज़मीन में गाड़ दिया या नदी में बहा दिया?

“हाँ, यह बात तो है, मगर इससे आरोप लगाने वाले को क्या फ़ायदा?”

-जैसे आर्यों के बाहरी होने से बाहरी शासकों की सत्ता पर जबरन कब्जा करना न्यायोचित लगने लगता है उसका अपराध छिप जाता है, वैसे ही चौकीदार को चोर बोलकर चोर की चोरी छिप सकती है।

” मगर बाकी भी तो कई यही आरोप लगा रहे हैं।”

-ये बाकी कौन हैं, और जो भी हैं वे भी वामपंथियों की तरह छोटे छोटे लाभ के लिए उनकी तरह ही एजेंडा राइटिंग कर रहे हैं। ये लोभी अधिक बड़े मूर्ख हैं।

“वो कैसे?”

-ये किसी छोटे लाभ के लिए अपना अधिक नुकसान करवा लेते हैं। यह कुछ कुछ ऐसा ही है कि चन्द हज़ार रूपये लेकर अपने आप को ही मकान मालिक की जगह अपने ही लाखों के मकान में किरायेदार घोषित कर देना। या फिर जैसे कोई चौकीदार को चोर बोलकर ईमानदार चौकीदार को हटवा दे और फिर चोर को ही चौकीदार बनवा दे।

अबकी बार दोनों मौन थे और चुपचाप सुन रहे थे।

-याद रखियेगा, हर झूठ के अपने दुष्परिणाम होते हैं, जैसेकि चौकीदार को चोर बोलने के झूठ को अगर मान लिया जाए तो चोर के चौकीदार बनते ही आने वाले पांच सालों तक नुकसान होगा, ठीक इसी तरह आर्य बाहरी थे इस झूठ को पिछले दो-चार सौ साल से मानने पर आदिकाल से चली आ रही महान सनातन संस्कृति को क्या नुकसान हुआ होगा अनुमान लगाया जा सकता है।

जब वापस चलने को हुआ तो पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि मैंने चौकीदार के समर्थन में दो वोट पक्के कर दिए, और एक सजग नागरिक होने का अपना कर्तव्य एकबार फिर निभाने का सफल प्रयास किया।

-और हाँ, आपने एक सवाल और उठाया था कि मनुस्मृति जलाने-जलवाने से क्या फायदा, तो मैं बताता चलूँ कि ऐसा करके पीढ़ियों को उनकी अपनी एक आदर्श व्यवस्था से दूर किया जा पा रहा है, और आदर्श व्यवस्था की अनुपस्थिति से समाज में अराजकता फैलती है, अब अराजकता से किसको लाभ होता है यह तो आप जानते ही होंगे। अराजकता से लाभ होता है चोर, डकैत और लुटेरों को।

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