आखिर क्यों हम टैक्स सिस्टम में दूसरों की नकल करते हैं?

भारत एक बहुत बड़ा, बहुत ज्यादा जनसंख्या वाला विविधता भरा देश है, जिसकी ज़रूरतें अलग हैं, मान्यताएं अलग हैं…

तो आखिर क्यों हम टैक्स सिस्टम में दूसरों की नकल करते हैं?

कुछ अलग नज़रिया क्यों नही उपयोग करते भारत की बेहतरी के लिए, कुछ अलग सोचा है जिसको लागू करने की आवश्यकता है आगामी समय में।

पहला, इंडिविजुअल इनकम टैक्स पूरी तरह खत्म हो, अभी भी मात्र 6 प्रतिशत लोग ही इनकम टैक्स देते हैं, कॉरपोरेट टैक्स को बनाये रखा जाए।

दूसरा, जीएसटी को किसी भी वस्तु के उत्पादन या इम्पोर्ट पॉइंट पर ही वसूला जाए एमआरपी पर, अर्थात 100 रुपये की चीज़ पर 1000 एमआरपी हो तो उस पर टैक्स देकर ही आगे वो मार्किट में जाये।

इससे बहुत सारे रिटेल होलसेल दुकानदार बिना बात के किताबी भार से मुक्त होंगे। आखिर अभी भी जीएसटी अंतिम एमआरपी पर ही लिया जाता है, बस बहुत सारे पॉइंट पर लिया जाता है। इससे ये सिंगल पॉइंट हो जाएगा और बहुत सारी मैन पावर सेव होगी।

तीसरा, भारत हमेशा बचा रहा है विश्व व्यापी मंदी या आर्थिक फेल्योर से क्योंकि भारत की पुरानी परंपरा है बचत। चादर के हिसाब से पैर पसारने की कहावत शायद किसी और देश मे है ही नहीं सिवाय भारत के। बाकी जगह तो ऋण लेकर घी पिया जाता है और घी खत्म होने पर दूसरे की थाली में नज़र मारी जाती है।

पर आज का सिनेरियो ऐसा हो गया है कि हम बचत भूल ईएमआई के जाल में फंसे हुए हैं। इसको बदलने का तरीका है कि बजाय कमाई के, खर्च पर टैक्स लगाया जाए।

इनकम टैक्स खत्म कर जीएसटी की दरें बढ़ाई जा सकती हैं। जो जितना ज्यादा खर्च करेगा वो अपनी खरीदी पर उतना ही ज्यादा टैक्स भी देगा, इससे लोग बचत के लिए उद्यत होंगे।

यानी कोई अगर 1 करोड़ सालाना कमा कर 50 लाख खर्च करता है तो उसको 50 लाख के खर्च पर ही gst चुकानी है, बचत पर कोई नहीं। ऐसे लोग जो रिटायर हैं और सिर्फ बैंक ब्याज से ही खर्च चलाते हैं उनको भी एक स्तर के बाद इनकम टैक्स अभी देना ही होता है, जबकि अपनी बचत पर टैक्स देना बहुत कष्टदायक है। इस उपाय से उन पर भी बस उतना ही टैक्स लगेगा इस तरह जितना वो खर्च करेंगे।

चौथा, दवा, इलाज और पढ़ाई, इन क्षेत्रों में सेवाओं की कीमत सरकार तय करे कि अमुक वस्तु या सेवा इस कीमत से ज्यादा पर नही बेची जा सकती।

स्कूलों को बुक बैंक बनाना अनिवार्य हो जिससे सेम पाठ्यक्रम होने पर हर साल हर अगली क्लास के बच्चे उन्ही पुरानी किताबों से पढ़ सकें, न कि हर साल मां बाप नई किताबों के बोझ से दबते रहें वो भी स्कूल वालों की मर्जी से।

पूरे देश मे एक सा सिलेबस और एक सी किताबें, और सब स्कूल में ही जमा रहें जिससे बस्ते उठाने का चलन खत्म हो। शिक्षा और स्वास्थ्य सबसे बड़े भ्रष्ट क्षेत्र हैं भारत के।

और बहुत कुछ है लिखने को पर सरकारों को भारत को बदलने की इच्छा शक्ति को और प्रबल बनाने को उद्यत होना ही होगा सुनहरे भविष्य के लिए।

जय हिंद।

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