मोदी सरकार के भारतीय जनऔषधि परियोजना का लाभ उठाकर पाएं कम कीमत पर जैनरिक दवाइयां

आज के समय में लोग जितना धन समृद्धि के लिए प्रार्थनाएं करते हैं उतना ही तन को स्वस्थ्य रखने के लिए भी करते हैं। लोग कहते भी हैं कि –

‘पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख जेब में हो माया।’  

निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं। जितना खर्च आज के समय में स्वास्थ्य और अन्य शारीरिक उपभोग की वस्तुओं पर हो रहा है उतना किसी पर नहीं। खाँसी से लेकर कैंसर तक हर छोटी – बड़ी बीमारी में खर्च इतना आ जाता है कि लोगों को कई बार अपना निजी सामान यहाँ तक कि घर भी बेचना पड़ जाता है। दवाइयाँ, इलाज, फीस में इतना पैसा लगने से कई लोगों को समय पर उपचार भी नहीं मिल पाता, जो कि चिंता का विषय होना ही चाहिए।

आज के समय में सरकार के द्वारा भी कई चिकित्सा सुविधाएं जनता को उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिनका उपभोग करके वो कम से कम पैसे में, अपनी बीमारी का उपचार करा सके। इसीलिए लोग सरकारी अस्पताल  की तरफ ज़्यादा रुख करते हैं| क्यूंकि वहां कम पैसों में ही उनका इलाज हो जाता है। सरकार की तरफ से भी कई योजनाओं के तहत चिकित्सा सुविधाओं के साथ – साथ दवाएं भी कम से कम रेट पर उपलब्ध कराई जा रही हैं और वर्षों से। लेकिन हर अच्छी चीज़ और सोच के साथ, एक भ्रम भी जन्म लेता है, जो लोगों के मन में घर कर जाता है।

मोदी सरकार के द्वारा  “भारतीय जन औषधि परियोजना” सत्र 2015 में लागू की गई। जिसका प्रोजेक्ट 2014 में ही पारित हो चुका था। इसके अंतर्गत सरकार की तरफ से बड़ी – बड़ी कंपनियों के द्वारा दवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इन दवाओं को ” जैनरिक दवा” या शुद्ध हिंदी में कहूँ तो “सामान्य दवाएं” कहा जाता है। ‘जैनरिक’ शब्द कोई बहुत बड़ा साइंस, फिक्शन का शब्द नहीं है जिससे लोग डरे कि ये क्या होता है? ये मूलतः वो औषधियाँ होती हैं जिनको सरकार बड़ी- बड़ी कंपनियों से बनवाकर ‘प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र’ में बेचती हैं।
    
जैनरिक दवाईयां गुणवत्ता में किसी भी प्रकार से ब्राण्डेड दवाईयों से कम नहीं होतीं तथा ये उतनी ही असरकारक हैं जितनी ब्राण्डेड दवाईयाँ। लेकिन असरकारक दवाइयों  को अ – सरकार समझकर जनता उसे अस्वीकार कर देती है। जनता का दोष इसमें कहीं नहीं हैं , दोष डॉक्टर और मेडिकल का है; जो इन दवाओं को स्वीकार नहीं करते। यहाँ तक कि जैनरिक दवाइयों की मात्रा (डोज), साइड-इफेक्ट, सक्रिय तत्व आदि सभी ब्रांडेड दवाओं के जैसे ही होते हैं। जैनरिक दवाईयों को बाजार में उतारने का लाईसेंस मिलने से पहले गुणवत्ता मानकों की सभी सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना होता है और यहाँ तो प्रक्रियाओं से गुज़रकर , सरकार की मौहर लगाकर उसे जरूरतमंद , और सभी तबक़े के लोगों को सही कीमत पर उपलब्ध कराई जाती है। फिर भी डॉक्टर्स क्यों इसे प्राथमिकता नहीं देते हैं ?? है आपके पास जवाब ?? इसकी सीधी – सीधी वजह है कमीशन का बटना।

मैं ये सब क्यों लिख रहा हूँ इसकी यही वजह है कि –  मैं इसी लाइन में ‘ह्यूमन रिसोर्स मैनेजर’ कार्यरत हूँ। किस प्रोडक्ट में क्या – क्या मटेरियल कितना लग रहा है और कौन गुणवत्ता पर खरा उतर रहा है। ये मैं हमेशा से देखता आ रहा हूँ। मगर कुछ समय पहले चौकाने बाला खुलासा देखने और समझने मिला। जैनरिक दवाइयों के बारे में लोगों के बीच फैली भ्रांतियों को नजदीक से जाना, तो देखा कि कितना अच्छी तरीके से माइंड सेट करके हमको बेबकूफ बनाया जा रहा है और हम बनते चले जा रहे हैं।

आपके साथ एक सच साझा करने जा रहा हूँ , साझा करने के साथ – साथ आपको दिखा भी रहा हूँ। अगर फिर भी आप आँख मूंदे रहें तो मैं क्या कह सकता हूँ।

‘शुगर’ की बीमारी आजकल हर 10 में से 6-7 लोगों को देखने  मिल जाती है और ये बीमारी उम्र देखकर नहीं होती। बूढ़े ,बच्चे ,जवान सभी उम्र के लोगों में ये देखने को मिलती है। शुगर के लिए ‘इन्सुलिन ग्लारजीन’ नाम से एक प्रोडक्ट आता है जिसे कई बड़ी भारतीय फार्मा कंपनी जैसे : सनोफी , Lupin  , वॉकहॉर्ड , बायकॉन जैसी कंपनियां बनाती हैं। सबसे ज्यादा डॉक्टर की पसंद सनोफी का ‘Lantus’ और बायकॉन का ‘Basalog’ रहता है।

Sanofi Lupin Wockhardt      Biocon
Lantus      Basugine   Glaritus   Basalog
656 Rs. 594 Rs. 574 Rs.   505 Rs.

एक ही बीमारी की अलग- अलग कम्पनीज़ की ये दवाएँ , अलग – अलग रेट में उपलब्ध हैं जैसा कि मैंने ऊपर उनकी कीमत के साथ लिखा है। वही सनोफी की Lantus 656 रूपए  की है और Biocon की Basalog 505 रूपए की है। ज्यादातर डॉक्टर ‘सनोफी’ और ‘बायकॉन’ को ही प्राथमिकता देते हैं। क्यूंकि इन दवाओं में डॉक्टर्स और मेडिकल स्टोर का सीधे – सीधे कमिशन जुड़ा होता है।

ये ठीक वैसे ही है जैसे रोड के किनारे बैठी महिला खिलौने बेच रही हो सस्ते दाम में , और वही खिलौने जब पैकिंग करके मॉल में चले जाते हैं तो उनका रेट एकदम से दो गुना , तीन गुना हो जाता  है।

सब मार्केटिंग का कमाल है। आपका और हमारा ब्रैनबॉश इसीलिए ही किया गया है ताकि सस्ती दरों पर उपलभ्ध होने बाली दवाएं ,  आप बिना प्रश्न किये उच्च मूल्यों पर खरीद सकें। चूँकि मैं आज इन महँगी दवाओं और सामान्य (जैनरिक) दवाओं के बीच क्या फर्क है ; ये बताने के लिए यह लेख लिख रहा हूँ तो मैं आपको और उदाहरण देता हूँ जिससे शायद आप इन दोनों के बीच अंतर कर पाएं। भले डॉक्टर वो दवाएं आपको न लिखे और कहे कि उसका डोज़ हाई है , या उसके सेवन से कोई परेशानी हो जायगी या ऐसा ही आपको लग रहा है तो उसके पहले आप आगे का जरूर पढ़े ……

ऊपर नीले पैकेट में दिखाई गई दवा Biocon की ‘Insulin Glargin Injection’ है जो बाज़ार में आमतौर पर हर मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध हो जाती है। इसकी बाज़ार में कीमत 1516 रूपए है जो दूसरे चित्र में आप देख सकते हैं , दूसरी तरफ उसी Biocon कंपनी की ‘Insulin Glargin Injection’ दवा जो कि प्रधानमन्त्री की ‘भारतीय जनऔषधि योजना’ के अंतर्गत आती है , फोटो में सफ़ेद पैकेट में है , उसकी कीमत मात्र 798 रूपए है।

दोनों के पैकेट के पीछे का हिस्सा अगर आप देखें तो वहाँ Composition , Dosage , Storage Temperature 2C and 8C , Use Instruction , Manufactured By , Marketed By  , Refer top flap for , यहाँ तक क़ि Manufactured Date Oct 2018 और Expiry Date Sep 2020 सभी कुछ जैसे का तैसा है। न ही डोज़ में कोई अंतर न ही दवा की कंपनी में। वही कंपनी बाजार में same प्रोडक्ट 1516 रूपए का बेच रही है और उसी कंपनी का same प्रोडक्ट जो कि प्रधानमन्त्री की ‘भारतीय जनऔषधि योजना’ के अंतर्गत आता है वह बाज़ार में 798 रूपए का मिल रहा है।  सभी टैक्सेस , सभी ड्यूटीज मिलाकर।

अब क्या कहेंगे आप ??? कौन किसको मूर्ख बना रहा है। दोनों दवाओं में आप फर्क कर पाएं इसीलिए दोनों हो दवाएँ आपके सामने लाया हूँ। 718 रूपए का फर्क वो भी सिर्फ एक तरह की दवा में।

थोड़ा – थोड़ा समझ आया या आ रहा है तो और एक उदाहरण से आपको समझाता हूँ।  ब्लड कैंसर की दवा ‘नोवार्टिस कंपनी’ ‘ग्लिवेक’ नाम से निकालती है , जिसकी एक महीने की खुराक की कीमत तकरीबन 1.14 लाख रुपए है, जबकि इसकी जैनरिक दवा का महीनेभर का खर्च करीब 11 हजार रुपए ही पड़ता है। दोनों के मूल्यों में कितना डिफ्रेंस है यह लिखकर क्या बताऊँ ? सब आपके ही सामने है , फिर क्या कारण है कि लोग जैनरिक दवाइयों को लेकर इतना नकारत्मक हुए जा रहे हैं ? क्यों लोगों के मन में जैनरिक दवाओं को एक भूत की तरह प्रदर्शित किया गया है।

वजह क्या है ? वजह है इसका नकारात्मक प्रचार ! हमारे दिमाग में ये पहले से ही फीड होता है कि जो सस्ता है वो थोड़ा कम असरकारक या उतना प्रभावी नहीं होता जितना कि ज्यादा कीमत बाला। हर जगह ,हर चीज़ में हमारा दिमाग हमें बता देता है कि जो सस्ता है वो कम फायदेमंद होगा। जैनरिक दवाएं गुणवत्ता के सभी मापदंडों पर खरे उतरकर , सरकार के द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से गुजरकर बाज़ार में उपलब्ध होती हैं।
इनके बीच के अंतर को जानने के लिए मैं आपको एक चीज़ के बारे में और बताता हूँ और वो है पेटेंट !  पेटेंट दरअसल अपनी चीज़ को कागज़ी रूप से अपनी बनाने की प्रक्रिया है , जिससे कोई अन्य कंपनी उसकी नकल न कर सके  और न ही उसे बेच सके।  ऐसी पेटेंटेड दवाएं ब्रैंडेड दवाएं कहलाती हैं। क्यूंकि  इन दवाओं के बनने के प्रोसेस में जो पैसा और समय खर्च होता है , उसको बसूलने के लिए कंपनियाँ इन दवाओं को ऊंची कीमत पर बेचती हैं।

   लेकिन एक समय के बाद ब्रैंडेड दवाओं का पेटेंट खत्म हो जाता है। यह पेटेंट रजिस्ट्रेशन से लगभग 2o साल तक चलता है। 20 साल के बाद यह दवाएं पेटेंट -फ्री हो जाती  है फिर इन्हें सामान्य (जैनरिक) दवाओं के रूप में जाना जाने लगता है और फिर कोई भी कंपनी जरूरत के हिसाब से उन्हीं के समान फार्मूलेशन वाली दवाएं बनाने लगती हैं। अब जो पेटेंट धारी कंपनियां हैं वो चाहें तो उनके फॉर्मूले को इस्तेमाल करके वही दवाई बना सकती हैं। जिससे शोध में लगा समय और पैसा भी बचता है और सरकार इन्हें कम दाम पर खरीदकर जरूरतमंदों के लिए उपलब्ध भी कराती है।  

मगर हमारा दिमाग वैदिक काल वाला है जहाँ दो दीवारें मिलें वहीँ हमारा दिमाग कहता है थूक। जैसे ही 90 डिग्री पर दो दीवारें मिलें वहीँ अंदर से आवाज़ आती है थूक साले .. थूक थूक थूक ! 89 * होगा तो हम नहीं थूकेंगे।  ऐसे ही जो हमारे दिमाग में इन दवाओं के लेकर नकारात्मक सोच बन चुकी है वो अब से नहीं , बल्कि धीरे धीरे करके डेवलप हुई है। डॉक्टर कभी खुद जैनरिक दवाएँ नहीं लिखेगा , आप को जागरूक होना है। सवाल करना है। बॉलीवुड से आमिर खान ने भी इस विषय पर आवाज़ उठाई थी , मगर उनको कहा गया की वो गुमराह कर रहे हैं।

दरअसल गुमराह वो नहीं कर रहे , बल्कि हम गुमराह हो चुके हैं। रत्ती भर का फर्क नहीं है ऊपर दिखाई गई दवाओं में।एक- एक चीज़ आपके सामने उधेड़कर रख दी है। अब सिर्फ समझना आपको है।  सब मार्जन और कमिशन का खेल है। अब तो डॉक्टर्स अपना सुझाया हुआ ही मेडिकल आपको बताते हैं और अपना सुझाया हुआ ही क्लिनिक जहाँ आप बड़ी – बड़ी जाँचे करवाके आते हैं। कुल मिलाकर खाली ये कोल कल्पित या गाल बजाने के लिए ये सब नहीं बोल रहा हूँ। आप वाकई इस बात को जानने की कोशिश करें कि डेढ लाख की दवा और 10200 रूपए या 11000 रूपए की दवा में ऐसा क्या फर्क है ??
  

क्या फर्क है शुगर की दवा Basalog में जो कि एक ही कंपनी से एक ही समय एक ही गुणवत्ता पर खरी होकर आपके सामने आ रही है और हम ये तक नहीं सोच पाते कि  इतना अंतर कैसे हो सकता है ? अगर वाकई गुणवत्ता या दवाई में कमी होती तो क्या सरकार के द्वारा इन दवाओं पर ठप्पा लगाया जाता ? सभी क्वॉलिटी मानक से तो गुज़रकर पास हो रहीं हैं दवाएं।  लगता है ‘सरकारी’ शब्द गरीबी रेखा के नीचे आने लगा है। ये भी अच्छा है कम से कम वो लोग तो लाभ उठा सकें ? मगर कैसे ??
  

यह लेख उन पड़े लिखों तक तो पहुँच जाएगा जो इसे पढ़ते-पढ़ते यहाँ तक आ गये हैं , मगर उन छोटे – छोटे गाँव के लोगों तक कैसे पहुँचेगा जो अपनी चमड़ी पर लगे घाव दिखाने शहर आते हैं और दवाएँ उनकी चमड़ी और दमड़ी दोनों उधेड़ कर रख देती हैं।
एक बार जरूर सोचियेगा………………

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