हे ईश्वर, मेरे भारत को उस भयानक समय की छाया से भी बचाना

अचानक अफवाहों के पंखों पर बैठकर जब कोई समाचार आपको मिलता है तो आप जल्दी से अपना टेलीविज़न ऑन करते हैं।

यदि टेलीविज़न से दूर हों तो आप अपने मोबाइल पर इंटरनेट पर फेसबुक, ट्वीटर या समाचार देखते हैं।

अब ज़रा उस ज़माने की कल्पना कीजिए जब देशव्यापी टेलीविज़न नेटवर्क नहीं था। इंटरनेट की तो कल्पना भी नहीं थी।

जब केवल दो समूहों के अखबार निकलते थे और वह दोनों अखबार दिल्ली के केंद्रीय मंत्रालय में जांच होने के बाद छापे जाते थे।

थीं, तो केवल दबी घुटी अफवाहें, चर्चाएं और दहशत।

अजीब अजीब खबरें उड़ती थी।

इमरजेंसी के बाद चौधरी चरण सिंह को गिरफ्तार करने के पुलिस पहुंची तो उन्हें कुर्ता भी नहीं पहने दिया गया। फलां नेता शौचालय में था और पुलिस दरवाज़े पर खड़ी हो गई, उसे हाथ भी नहीं मांजने दिए गए।

दूसरे दर्जे के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर शारीरिक अत्याचार किये गए। कई लोगों के नाखून तक प्लास से खींच लिए गए।

किस नेता को किस जेल में भेजा गया और कितने अत्याचार किए गए यह खबर जानने का कोई तरीका नहीं था।

जिन माओं के लाल जेल में बंद थे वे दिन रात रोती थीं कि न जाने हमारा बेटा कभी लौटकर आएगा भी या नहीं।

पूरे देश में एक भयानक सन्नाटा पसरा हुआ था।

गाँव के गाँव को घेरकर नौजवान, बुजुर्ग यहाँ तक कि किशोरों की नसबंदी कर दी गई। अगर आप बिजली का कनेक्शन लेने जाते तो नसबंदी के ‘केस’ मांगे जाते थे।

संजय गाँधी के रास्ते में एक झुग्गी बस्ती पड़ती थी जो उन्हें सुन्दर नहीं लगी। अगले दिन वहां साफ़ मैदान था।

न अपील न वकील न दलील। बस अँधेरा – अँधेरा और अँधेरा।

जी हां, यह चर्चा है आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी की इमरजेंसी की।

आज जिस विपक्षी नेता का मुँह खुलता है मुँह फाड़ देता है “मोदी तानाशाह है जी”, “लोकतंत्र खतरे में है”, “हिटलर शाही हो गई है”।

इसलिए कि आजाद हिन्दुस्तान के उस काले काल की आप कल्पना भी नहीं कर सकते और गर्व करते हैं “इंदिरा जैसी नाक है”।

हे ईश्वर, मेरे भारत को उस भयानक समय की छाया से भी बचाना।

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