सैटेलाइट नष्ट करने का सफल परीक्षण और उसका आंतरिक व वैश्विक प्रभाव

बीती 27 मार्च 2019 को जब यह समाचार आग सी फैली थी कि 11:45 पर भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करेंगे तो भारत समेत विश्व की सारी शक्तियों और भारत के शत्रुओं के कान खड़े हो गए थे।

यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जब तक मोदी जी ने राष्ट्र को संबोधित नहीं किया था, तब तक वैश्विक जगत के सभी महत्वपूर्ण काम थम से गये थे।

जब मोदी जी ने राष्ट्र को यह बताया कि कुछ ही समय पूर्व हमारे वैज्ञानिकों ने स्पेस में 300 किलोमीटर दूर, लो अर्थ ऑरबिट (LEO) में एक लाइव सैटेलाइट को एंटी सैटेलाइट मिसाइल द्वारा मार गिराया गया है और यह आपरेशन सिर्फ 3 मिनट में सफलता पूर्वक पूरा किया गया है तो भारत का एक बड़ा वर्ग सकते में चला गया।

उनमें एक तो प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों के साथ वे थे, जिन्हें इस तरह की घोषणा की अपेक्षा नहीं थी और दूसरी वे लोग थे जिन को समझ मे ही नहीं आया कि सैटेलाइट को नष्ट किया गया है या फिर उनके ही अस्तित्व को दरका दिया गया है।

इन लोगों में सबसे हास्यास्पद व दारुण स्थिति भारत के विपक्ष के नेताओं की दिखी है। मोदी जी द्वारा घोषणा किये जाने पर, उनकी प्रतिक्रियाओं से यही समझ आ रहा था कि या तो उन्हें कुछ समझ मे नहीं आया है या फिर जो समझ गए थे वे वाकई डर गए थे।

अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया यही बता रही थी कि उन्हें सैटेलाइट का ‘स’ भी नहीं मालूम है लेकिन उनको इतना समझ में आ गया था कि वे और नेपथ्य में धकेले जा चुके हैं।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया सबसे विचित्र थी क्योंकि उनको सब समझ भी आ रहा था, लेकिन उनको विरोध भी करना था। राहुल गांधी की तरफ से जो कटाक्ष किया हुआ ट्वीट आया था वह यही बता रहा था कि उनकी नीति सर्जिकल स्ट्राइक व बालाकोट हवाई हमले की तरह इसको महत्वहीन सिद्ध करना है।

उसके बाद कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और उनके मीडिया में बैठे समर्थकों की मुहिम शुरू हो गयी जिसमें भारत को बताया गया कि सैटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता तो यूपीए की सरकार के कार्यकाल में ही प्राप्त कर ली गयी थी और जो आज परीक्षण हुआ है उसमें प्रधानमंत्री का कोई योगदान नहीं है बल्कि इसका श्रेय डीआरडीओ के वैज्ञानिकों को जाता है।

इन लोगों की विक्षिप्तता तो यहां तक बढ़ गयी कि वे इसका श्रेय नेहरू को देने लगे क्योंकि उनके अनुसार भारत में विज्ञान नेहरू ही लाये थे।

आज जब सैटेलाइट को नष्ट करने का परीक्षण किए हुए लगभग 48 घण्टे से ऊपर हो चुके हैं, तो भारत का पूरा विपक्ष पूरी तरह से विक्षिप्त अवस्था को प्राप्त सर्वत्र नग्न घूम रहा है।

कांग्रेस तो मोदी जी की घोषणा से ज्यादा डीआरडीओ के भूतपूर्व प्रमुख वी के सारस्वत के इस खुलासे से खिसियाया मुंह छुपाए हुये है कि 2012-13 में डीआरडीओ, मिशन शक्ति को बढ़ाना चाहता था लेकिन तत्कालीन यूपीए की सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी थी और पूरी योजना पर रोक लगा दी थी।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक तरफ कांग्रेस के शीर्ष नेता यह बता रहे हैं कि सैटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता उनके कार्यकाल में प्राप्त हुई थी, वही उस वक्त के रक्षा मंत्री एके एंटनी भारत की जनता को बता रहे हैं कि उनको मिशन शक्ति का कोई ज्ञान नहीं था और न ही भारत की इस क्षमता पता था।

आज तो सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि भारत की रक्षा संबधी निर्णय लेता कौन था और मिशन शक्ति को रोकने का असली कारण क्या था?

यदि हम आज भारत की सैटेलाइट नष्ट करने की क्षमता प्राप्त करने पर विश्व से आई प्रतिक्रियाओं की विवेचना करें तो यह अच्छी तरह समझा जा सकता है कि 2012 में कांग्रेस की यूपीए ने क्यों मिशन शक्ति को बन्द करा दिया था।

मैं अपनी बात को बढ़ाते हुए कांग्रेस के नेता मनीष तिवारी द्वारा दिए गए वक्तव्य पर प्रकाश डालना चाहता हूँ जिसमें उन्होंने अपना डर प्रत्यक्ष किया है। उन्होंने कहा है कि एक बार जब इस प्रशिक्षण का उन्माद ठहर जाएगा तब भारत को विश्व की शक्तियों के कठोर प्रश्नों का सामना करना पड़ेगा और वो आशा करते हैं कि भारत एक राष्ट्र के रूप में इसका सामना करने को तैयार है।

मनीष तिवारी का बयान एक डरी हुई मानसिकता की स्वीकारोक्ति है और यह कांग्रेस के दशकों के शासन की उपलब्धि है। गांधी परिवार ने इसी हीनता को आगे बढ़ाया है जिसने भारत को जीतने वाला नहीं बल्कि समझौतावादी व भीरू बना कर छोड़ दिया है।

यह सब गांधी परिवार के लिए अनुकूल था, क्योंकि एक तो यह उनके समर्थकों में दासत्व को प्रगाढ़ करता रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके इस डर के आवरण में उन्हें यानी गांधी परिवार को, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए भारत के शत्रुओं से स्थायी प्रगाढ़ता रखने का अवसर प्रदान करता रहा है।

क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि भारत द्वारा स्वयंभू ‘स्टार वॉर’ में शामिल होने की दावेदारी को लेकर मनीष तिवारी का डर निर्मूल सिद्ध हो रहा है? इस सैटेलाइट को नष्ट करने की तकनीकी हासिल किए तीन राष्ट्रों अमेरिका, रूस व चीन कोई भी विरोध तो छोड़िए, तत्कालीन प्रतिक्रिया भी नहीं दे पाए थे।

सबसे पहली प्रतिक्रिया भारत के शत्रु पाकिस्तान की आयी थी जिसमें डरे पाकिस्तान ने, जो मानवता का बलात्कार करना अपने मूल में समाहित किये है, ज्ञान दे रहा है कि वो अंतरिक्ष को मानवता की साझा विरासत के तौर पर देखता है और सलाह देता है कि हर देश को इस तरह की गतिविधियों से दूर रहना चाहिए जिससे अंतरिक्ष का सैन्यीकरण होता हो।

पाकिस्तान की भाषा व भारतीय विपक्ष की भाषा में अंतर था लेकिन मूल एक ही था कि इससे भारत को दूर रहना चाहिए।

दूसरी प्रतिक्रिया एक दूसरे शत्रु राष्ट्र चीन की आयी थी जिसमें शब्दों को बड़े तोल मोल कर गढा गया था। उसने सिर्फ इतना कहा कि चीन को उम्मीद है कि सभी देश (भारत) बाहरी अंतरिक्ष में शांति बनाये रखेंगे।

फिर प्रतिक्रिया अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट से आई जिसमें कोई बधाई या विरोध न होकर कई शब्दों को घुमाते हुए इतना ही कहा कि भारत अमेरिका का सामरिक भागीदार है और वे अंतरिक्ष, विज्ञान व तकनीकी सहयोग करते रहेंगे। यह वही अमेरिका है जिसने जब चीन ने 2007 में यही परीक्षण किया था तो विरोध किया था।

अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट से ज्यादा बढ़िया प्रतिक्रिया अमेरिका के कार्यवाहक रक्षा मंत्री पैट्रिक शैनहन की आयी है जिसमें उन्होंने विश्व के ऐसे किसी भी देश को चेतावनी दी है जो भारत जैसे एंटी-सैटेलाइट परीक्षण के लिए विचार कर रहा है। उन्होंने गम्भीरता से कहा है कि हम अंतरिक्ष में मलबा छोड़कर नहीं आ सकते हैं।

अब यहां यह महत्वपूर्ण है कि भारत ने पहले से ही सैटेलाइट नष्ट होने के बाद कचरे के खतरे से इनकार रखा है क्योंकि परीक्षण लो ऑर्बिट में किया गया था, इसलिये कचरा खुद ब खुद खत्म हो जाएगा और धरती पर गिर जाएगा।

अब आते हैं कि भारत की उपलब्धि पर अंतराष्ट्रीय मीडिया में मोदी जी के आलोचक क्या कह रहे हैं।

‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ (भारतीय लिबरल वामपंथी मीडिया, संक्षेप में कांग्रेस पोषित मीडिया का सबसे बड़ा सहयोगी) ने लिखा है भारत ने इस परीक्षण से चीन-पाकिस्तान से प्रतिद्वंद्विता को और बढ़ाया है।

इंग्लैंड के ‘द गार्डियन’ ने लिखा है कि चुनाव के वक्त मोदी की टीवी पर की गई इस घोषणा की बड़ी आलोचना हो रही है।

वही पर रूस की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बिना, ‘रशिया टुडे’ ने लिखा है कि भारत की तकनीकी उन्नति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यह देश (भारत) सैटेलाइट की सुरक्षा के लिए स्पेसक्राफ्ट पर भी विचार कर सकता है।

अब इन तमाम अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया से क्या समझ में आता है? मुझे वही समझ में आया है जो मोदी जी पहले से समझे हुये थे। दुनिया झुकती है बस झुकाने वाला चाहिए। कांग्रेस व गांधी परिवार की संस्कृति झुकने वाली है। वे कभी विश्व की प्रतिकूल प्रतिक्रिया होने की संभावना मात्र से ही डर कर झुकते रहे या फिर भारत के शत्रु राष्ट्रों से इसी डर को बनाये रखने की कीमत वसूलने के लिए झुकते रहे हैं।

मेरे लिए भारत द्वारा 27 मॉर्च 2019 को सिर्फ एक सैटेलाइट को ही नहीं नष्ट किया है बल्कि भारत ने नरेंद्र मोदी के माध्यम से भारतीय राजनैतिक चरित्र व तंत्र में जड़ें जमा चुके व्यक्तिगत स्वार्थ व डर को नष्ट कर दिया है।

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