अब अछूत नहीं रह गया नॉर्थ-ईस्ट

जहां तक इंटरनल सिक्योरिटी की बात है तो ये बात तो माननी ही पड़ेगी कि 2014 के बाद से भारतीय शहरों में बम ब्लास्ट की खबरें आना लगभग खत्म सी हो चुकी हैं।

किसी भी देश के अंदर रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा वहां की चुनी हुई सरकार का होता है। फिलहाल अभी तक मोदी सरकार इसमें सफल है।

अगर नॉर्थ-ईस्ट की बात करें तो पिछले पांच सालों में जो सबसे बड़ा बवाल हुआ वो सिटिज़नशिप बिल में संशोधन को लेकर था।

मैं यहां इंसरजेन्सी का एक लंबा दौर देख चुकी हूँ। एक समय ऐसा था कि असम में किसी बवाल के होने पर सामान्य स्थिति कायम होने में महीनों लग जाते थे। इससे पहले कि सामान्य माहौल स्थापित हो, कोई नया बखेड़ा फिर खड़ा हो जाता था।

व्यावहारिक रूप से हमारे लिए दिन 24 घण्टे की बजाय 12 घण्टो से कुछ कम का ही होता था। शाम होने से पहले ही घर में आ जाना बेहद ज़रूरी था। दिन डूबने के बाद से सड़कें और बाज़ार वीरान हो जाया करते थे। जिसकी वजह से लोग इस क्षेत्र के भौगोलिक और प्राकृतिक रूप से सुंदर होने के बावजूद यहां आना पसंद नहीं करते थे।

पर अब ऐसा नहीं है…

सिटीज़नशिप बिल मुद्दे पर फैले विरोध के बाद एक बार तो पुराने दिनों की वापसी के नाम से ही मन सशंकित हो गया था, लेकिन बिल के लैप्स होने के साथ ही जिस तेज़ी से यहां सब कुछ सामान्य हुआ उसकी उम्मीद तो मुझे सच में नहीं थी। लेकिन ऐसा हुआ.. और इसके लिए यहां की जनता और सरकार दोनों को बधाई।

लोकतंत्र में जनता का सरकार में विश्वास होना बहुत ज़रूरी है। जब अपनी चुनी हुई सरकार जनहित में काम करती है, जब सरकार जनता की बेसिक समस्याओं को मुद्दा बनाकर एक एक कर सॉल्व करती नज़र आती है तो जनता का विश्वास न सिर्फ लोकतंत्र में मज़बूत होता है बल्कि इससे आंतरिक सुरक्षा को बल मिलता है… क्यों कि आम जनमानस जब सरकार और देश के साथ खड़ा नजर आता है तो किसी असामाजिक तत्व का साहस नहीं होता कि वह व्यवधान उत्पन्न करे।

पिछले चार पांच सालों में नॉर्थ-ईस्ट ने रोड बनते देखे, ब्रह्मोपुत्रो पर असम्भव से नज़र आते पुल बनते देखे। डोनर मिनिस्ट्री ने यहां के युवाओं का स्किल डेवलपमेंट करके उनके प्लेसमेंट द्वारा उन्हें रोज़गार के अवसर प्रदान किये।

पिछले पांच सालों में नॉर्थ ईस्ट के वोटिंग पैटर्न पर नज़र डालने से ये बात सुनिश्चित हो जाती है। लगभग हर चुनाव में 90 प्रतिशत से ज़्यादा के मतदान प्रतिशत दर्ज किए गए।

नॉर्थ-ईस्ट में घुसपैठ की बड़ी समस्या रही है। चूंकि भारत में इस्लामिक समुदाय के वोटों को खींचने की कवायद चलती रहती है, ऐसे में यहां की कई पूर्ववर्ती सरकारों ने बांग्लादेशी घुसपैठ के मामले को न छूना ही मुनासिब समझा था।

लेकिन पिछले दो सालों में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़ंस पर काम करने का श्रेय इस मौजूदा सरकार को ही दिया जाएगा।

जिन 40 लाख अवैध घुसपैठियों की पहचान हुई है बेशक उनके बांग्लादेश प्रत्यर्पण में समय लगे, लेकिन इस काम से मौजूदा सरकार ने यहां की जनता का भरोसा तो जीत ही लिया।

सिटीज़नशिप बिल को लेकर विरोध ज़रूर था लेकिन उसका कारण सरकार विरोधी नहीं बल्कि इसलिए था कि वो बिल भले ही पूरे भारत के लिए बेहतर हो लेकिन असम की वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए अनुचित था।

दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है। नॉर्थ-ईस्ट सत्तर सालों से इतना उपेक्षित महसूस करता रहा कि अब कोई भी कदम उठाने से पहले उसे परिस्थितियों की कसौटी पर ज़रूर कसता है। विरोध प्रदर्शन उसी को परिलक्षित करता है। हालांकि इससे यहां की मौजूदा सरकार को कोई राजनैतिक नुकसान नहीं होगा। इसे भी सरकार की कूटनीतिक सफलता माना जा सकता है।

कुल मिलाकर चीन, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होने के कारण नॉर्थ-ईस्ट का सुरक्षित और मज़बूत होना देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए बहुत ज़रूरी है। और इसमें कोई दो राय नहीं कि नॉर्थ-ईस्ट प्रथम दिन से ही प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। उन्होंने नॉर्थ-ईस्ट को अष्टलष्मी नाम दिया।

इसमे कोई शक नहीं कि नॉर्थ-ईस्ट में इस बदले माहौल का फायदा मौजूदा सरकार को मिलेगा… मिलना भी चाहिए। लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ज़रूरी काम जो हुआ है वो ये कि नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को अब धीरे-धीरे ये लगने लगा है कि हम भारतवर्ष के अंदर द्वितीयक स्तर के नागरिक नही हैं। हम भारत की मुख्य धारा से जुड़ चले हैं। लोग यहां आने लगे हैं। पूर्वोत्तर की चर्चा होने लगी है पूरे भारत में… कई मिथक टूट गए हैं। नॉर्थ-ईस्ट अब अछूत नहीं रह गया है।

ये जो परिपाटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू कर दी है न… मोदी जी रहें न रहें, इसे अगले कई दशकों तक आने वाली सरकारों को मजबूरी में ही सही, निभाना ही पड़ेगा… शोत्ति बोलछि…

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