56″ का कितना भी मज़ाक बना लें, पर कभी न देखा ऐसा साहसी प्रधानमंत्री

मिशन शक्ति कल पूरा हुआ और देश सुपर पावर के समूह में शामिल हुआ। हम सबको और देश को बहुत बहुत बधाई!

ऐसे गहन रिसर्च के काम सालों चलते हैं और उन वैज्ञानिको को ये तक होश नहीं रहता कि दिन है या रात, सुबह है या शाम, सनडे है या मंडे, यहाँ तक कि उनको ये भी होश नहीं रहता कि वो घर पर हैं या लैब में… हाँ, ऐसे ही होते हैं वैज्ञानिक।

27 मार्च देश के लिए बहुत बड़ा दिन था जिसे पूरे देश ने उत्सव की तरह मनाया पर कुछ राजनीतिबाजों ने इस अवसर पर भी राजनीति करने का मौका नहीं चूका।

कोई बोला कि एक ही उपग्रह गिराया, इसमें क्या बड़ी बात है! कोई बोला इसमें कौन सी बड़ी बात है, चीन हमसे पहले ये कारनामा कार चुका है! कोई बोला अगर इससे पाकिस्तान में अंधेरा हो सकता है तो किया क्यों नहीं!

और देश की सबसे पुरानी पार्टी के युवराज ने तो हद ही कर दी। बोले ये रंगमंच दिवस है! जैसे ये उपलब्धि कोई खास नहीं, या रंगमंच दिवस इस उपलब्धि से ज्यादा खास है। इसकी टाइमिंग को लेकर ऑब्जेक्शन उठाने लगे, किसने संबोधित किया इस पर सवाल।

ये सब देखकर हंसी कम ग़ुस्सा ज्यादा आता है। इन सबने सरेआम पूरे देश के आगे इनकी देशप्रेम और समझदारी को नंगा कर दिया। सबको पता चल गया कि इनको विज्ञान की जानकारी नगण्य है और ये सच में शायद पाँचवी पास भी नहीं है। सत्ता के लालच में और उसको ना पाने की छटपटाहट में इतने गिर गये कि शर्म आती है कि ये हमारे नेता हैं।

सबसे पहले तो जैसा मैने कहा हर अनुसंधान जब पूरा हो जाए तभी तुरंत उसका परीक्षण करने की उत्सुकता हर उस वैज्ञानिक को होती है जिसने उस पर कठिन परिश्रम किया हो और हर तीन महीने में चुनाव के लिए अनुसंधान रोके नहीं जा सकते।

आप सभी ने सुना होगा कि अर्जुन ने द्रौपदी को कैसे जीता था स्वयंवर में। एक खंभे के उपर चक्र पर मछली बांध दी गयी थी और वो चक्र लगातार घूम रहा था और अर्जुन को उसका प्रतिबिंब नीचे पानी में देख कर ऊपर बाण चलाना था।

यह अत्यंत ही कठिन कार्य था, फिर भी अर्जुन ने ठीक निशाना मछली की आँख पर लगा कर स्वयंवर की शर्त पूरी की और द्रोपदी से विवाह के अधिकारी बने।

इसी तरह से उपग्रह भी स्थिर नहीं होता, पृथ्वी का चक्कर लगाता है। कल हमारे सैकड़ों अर्जुनों ने मिल कर वैसे ही मछली की आँख, मतलब घूमते हुए उपग्रह पर निशाना लगाया।

बस फर्क इतना था कि अगर ये निशाना अचूक नहीं लगता तो क्या होता? किसी और देश के उपग्रह पर लग जाता, अमरीका, रशिया या चीन या फ्रान्स के, तो क्या होता? बस बवाल हो जाता और हमें किस किस का कोपभाजन बनना पड़ता, उसके क्या दुष्परिणाम होते इसका अंदाज़ भी हम नहीं लगा सकते।

इसलिये कहने की ज़रूरत नहीं है कि क्यों पहले की सरकारों ने इस अनुसंधान के लिए अनुमति नहीं दी होगी और क्यों इस सरकार ने ये अनुंमति दी। DRDO के पूर्व प्रमुख सारस्वत ने ख़ुलासा किया किया कि यूपीए ने इस परीक्षण के लिये अनुमति ही नहीं दी थी, वरना देश अंतरिक्ष का सुपर पावर पहले ही बन चुका होता। 56″ का कितना भी मज़ाक बना लो पर वास्तव में इतना साहसी प्रधानमंत्री तो मैने आजतक तो नहीं देखा, ना भूतो ना भविष्यति!

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