समय के साथ स्थापित हुए जाते हैं असली नायक

यह मुलाक़ात साधारण मुलाक़ात न थी, यह मुलाक़ात एक पिता और उसके तेजस्वी पुत्र के बीच मुलाक़ात थी।

पिता को संधि का प्रस्ताव लेकर अपने उस तेजस्वी पुत्र के सामने जाना था जो अब उसके सुलतान के सामने ऐसी स्वतंत्र शक्ति बनकर खड़ा था, जिसे अनदेखा करना किसी के लिए संभव नहीं था।

शाहजी के सामने बीजापुर के दरबार का वह दृश्य बार बार उभर कर आ रहा था, जब उनके तेजस्वी पुत्र ने बीजापुर के सिंहासन के सामने सलाम करने से मना कर दिया था।

एक स्वतंत्र मराठा साम्राज्य का सपना उस बालक की माँ ने उसकी आँखों में इस तरह विस्तारित कर दिया था कि वह बीजापुर के सुलतान या दिल्ली दरबार में सिर झुका ही न सकता था।

बीजापुर के सिंहासन को झुककर सलाम न करने के कारण किस तरह खींचते हुए शाहजी अपने तेजस्वी पुत्र को दरबार से बाहर ले गए थे यह शाहजी ही जानते थे और यह कसम उसी दिन खाई थी कि यह जब तक नहीं सुधरेगा तब तक उसका चेहरा नहीं देखेंगे।

शाहजी के पैर मन मन भर भारी हो रहे थे! आज वह जिसके सामने संधि की बात करने जा रहे हैं, उसने वह शक्ति प्राप्त की है, जिसे प्राप्त करने का वह स्वप्न भी नहीं देख सकते थे।

बीच बीच में उनके सामने उनके पुत्र के दुस्साहस की कहानियां आती रहती थीं। जिस बच्चे के साथ उसका पिता न था, बस माँ थी और एक असंभव स्वप्न था, वह अपने साहस से इतना आगे बढ़ गया था कि पश्चिम तक उसका नाम गूंजने लगा था।

शाहजी बीजापुर की तरफ से अपने पुत्र से नहीं बल्कि ऐसे राजकुमार से संधि करने जा रहे थे जो अब अपने प्रांतवासियों के सामने नया नायक था। एक ऐसा नायक जिसने उनमें आत्मविश्वास जागृत किया था, जिसने उन्हें चेतना बोध दिया था, जिस नायक ने उनमें आत्म गौरव विकसित किया था।

नायक भी अपने पिता से मिलने के उतना ही उत्सुक था, जितना कोई पुत्र हो सकता था। उसकी आँखें अपने पिता की प्रतीक्षा में बरस रही थीं। आज न जाने कितने बरस के बाद वह अपने पिता को देखेगा। नायक शिवा बार बार अपनी माँ से पूछता कि क्या वह अपने पिता की तरह दिखता है! माँ उसे हृदय से लगा लेती!

शाहजी और शिवाजी समय के उस बिंदु पर मिले जहां शिकायतों के लिए कोई स्थान न था, पिता से मुलाक़ात हुई, जन नायक ने अपने पिता के चरण छुए, पिता के रूप में शाहजी के पास शब्द नहीं थे, दूत के रूप में आए पिता ने संधि पर हस्ताक्षर कराए!

पिता की चरण रज को माथे पर लगाते हुए शिवा पिता के सामने खड़े ही रहे! पिता के बारम्बार आग्रह के उपरान्त भी स्थान ग्रहण न किया. “मैं आपके सम्मुख नहीं बैठ सकता! राम दशरथ की बराबरी में नहीं बैठ सकता!”

पिता ने आह्लादित होकर आशीर्वाद दिया “तुम्हारा नाम भी राम की तरह ही अमर रहेगा पुत्र! आज तुम्हारा पिता उस क्षण के प्रति कृतज्ञ है जिसने मुझे तुम्हारा पिता होने का गौरव प्रदान किया।”

और चल दिए वापस, यह सन्तोष लिये कि इतिहास उन्हे उनके पुत्र के कारण ही याद रखेगा। जीजाबाई की ज़िद जीत रही थी, शाहजी को यह हार भली लग रही थी।

गढ़े हुए नायक सत्ता के लिए पिता को कैद करा कर अपने अनुसार इतिहास लिखवाते हैं, असली नायक समय के साथ स्थापित हुए जाते हैं।

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