खेल क्या है? 6000 रूपए मुफ्त देंगे? या ग़रीबों से छीनेंगे सारी सब्सिडी?

भारत सरकार पेट्रोल, डीज़ल, केरोसीन, एलपीजी सिलेंडर, चावल, गेहूँ, चीनी, यूरिया, खाद, बीज जैसी कई चीजों पर सब्सिडी देती है। इसके अलावा सरकार कई तरह की छात्रवृत्ति आदि भी देती है।

सब्सिडी के कारण लोगों को वह वस्तु बाज़ार भाव से कम कीमत में मिलती है और कीमत के इस अंतर की भरपाई सरकार करती है। लेकिन इसमें सरकार को हज़ारों करोड़ का खर्च होता है।

इसके बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह राशि केवल पात्र व्यक्तियों को ही मिल रही है। बहुत लंबे समय से यह बात उठ रही थी कि इसमें बहुत भ्रष्टाचार होता है।

कई बार अपात्र लोग भी गलत जानकारी देकर योजनाओं का लाभ उठा लेते हैं, कई बार एक ही व्यक्ति एक ही योजना का दो-दो बार लाभ उठा लेता है। इस तरह की कई समस्याएं इसमें हैं।

इसे सुधारने के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसी संस्थाओं की राय थी कि भारत सरकार को सब्सिडी देने की बजाय योजना के लाभार्थियों को नकद भुगतान करना चाहिए और सब्सिडी बंद कर देनी चाहिए। इसे डायरेक्ट कैश ट्रांसफर या डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर कहा गया।

1 जनवरी 2013 को उस समय के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री पी. चिंदबरम ने देश के 20 जिलों के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की। इसके अंतर्गत 2 लाख 45 हज़ार लोगों को उनकी छात्रवृत्ति और पेंशन की राशि पोस्ट ऑफिस या बैंक अधिकारियों के माध्यम से मिलने की बजाय सीधे उनके बैंक खातों में मिलने वाली थी। इसके लिए यह भी अनिवार्य किया गया कि हर व्यक्ति का आधार कार्ड हो और उसे बैंक खाते से जोड़ा जाए।

यह भी याद रखिये कि उस समय मनमोहन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन ही थे।

सरकार ने इस योजना का उद्देश्य तो भ्रष्टाचार को रोकना ही बताया था, लेकिन वास्तव में इसका अंतिम लक्ष्य यह था कि हर तरह की सब्सिडी खत्म करके वह राशि सीधे लोगों के बैंक खातों में ट्रांसफर की जाए।

6 महीने के भीतर ही इसके स्पष्ट संकेत भी मिल गए। 1 जून 2013 को मनमोहन सरकार के पेट्रालियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने एलपीजी सिलेंडर की सब्सिडी की राशि सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर करने की योजना शुरू की। शुरू में इसे भी प्रायोगिक तौर पर कुछ ही जिलों में लागू किया गया था।

यह योजना लागू होते ही सिलेंडर के लिए सरकार द्वारा कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी बंद हो गई और उसके बजाय लोगों से कहा गया कि वे रसोई गैस का सिलेंडर बाज़ार भाव पर खरीदें और उसकी कीमत के अंतर की राशि सरकार उनके बैंक खाते में सीधे ट्रांसफर करेगी।

लेकिन इसके अलावा एक बात और हुई। सरकार ने सब्सिडी वाले सिलेंडर के लिए अधिकतम सीमा लागू कर दी। एक साल में आपको अधिकतम १२ सिलेंडरों पर ही सब्सिडी मिल सकती थी, उसके आगे नहीं।

इस योजना के लिए भी यही शर्त थी कि लोगों के पास आधार कार्ड हो और वह बैंक खाते से लिंक किया हुआ हो।

सरकार की योजना धीरे-धीरे हर तरह की सब्सिडी को इस तरह खत्म करने और हर महीने उतनी राशि सीधे लोगों के बैंक खाते में ट्रांसफर करने की थी।

इसके कुछ ही समय बाद सितंबर 2013 में मनमोहन सरकार ने अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन को ही रिज़र्व बैंक का गवर्नर बना दिया।

भारत में उस समय एक बड़ी समस्या यह थी कि अधिकतर लोगों के पास बैंक खाते नहीं थे, विशेषतः गरीबों के पास। उनके लिए बैंक में खाता खुलवाना बहुत आसान भी नहीं था। दूसरी समस्या आधार कार्ड की भी थी। इन दोनों को लिंक करवाना भी एक बड़ा झंझट था। आपमें से कई लोगों को भी शायद उस परेशानी का सामना करना पड़ा होगा।

इन कमियों के कारण उन योजनाओं में कुछ न कुछ गड़बड़ियां होती ही रहीं और भ्रष्टाचारियों का फर्जीवाड़ा बहुत हद तक जारी रहा।

याद रखिये कि यह 2014 के चुनाव से कुछ ही महीनों पहले की बातें हैं। सोनिया जी की सरकार को उम्मीद थी कि इस तरह लोगों को सीधे उनके बैंक खाते में पैसे मिलेंगे, तो बदले में कांग्रेस को भी चुनाव में वोट मिलेंगे।

हालांकि कांग्रेस के भ्रष्टाचार और विफलताओं की लिस्ट इतनी लंबी थी कि चुनाव में उसकी करारी हार हुई।

2014 में जीतने के बाद मोदी सरकार ने इसे सुधारने की दिशा में तेज़ी से काम किया। जनधन के नाम से एक नई योजना आई, जिसके अंतर्गत बैंक में खाता खुलवाना सुलभ हो गया और देश के करोड़ों लोगों के लिए आज़ादी के बाद पहली बार बैंकों के दरवाज़े खुले।

मनमोहन सरकार के राज में डीबीटी की योजना आई, और उसमें भ्रष्टाचार की शुरुआत भी हो गई। मोदी सरकार ने वह लीकेज बंद करने की तैयारी की। चूँकि अब सबके पास बैंक खाता था और लगभग हर किसी का आधार कार्ड बनाने का काम भी पूरा हो चुका था, तो सरकार ने इसे अनिवार्य बनाना शुरू किया।

इससे कांग्रेस घबराई और आपको याद होगा कि उसी दौरान देश में अचानक यह हल्ला मचना शुरू हुआ था कि लोगों का आधार कार्ड और बायोमेट्रिक डेटा सुरक्षित नहीं है, और मोदी सरकार आधार के बहाने देश के हर नागरिक की निगरानी करने वाली है। आधार कार्ड के विरोध में शायद किसी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी लगाई थी।

2016 में जब रघुराम राजन का रिज़र्व बैंक का कार्यकाल पूरा हुआ और सरकार ने उन्हें दूसरा मौका नहीं दिया, तो उन्हीं रघुराम राजन को भी अचानक याद आ गया था कि मोदी-राज में देश की अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही है।

इसके बावजूद मोदी जी ने अपना काम जारी रखा। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की कमियों को दूर किया गया, उसमें चोरी और भ्रष्टाचार के दरवाजे बंद किए गए और लाखों फ़र्ज़ी लाभार्थियों और काल्पनिक लोगों के नाम हटाए गए।

मोदी सरकार ने ये सारे सुधार किए, लेकिन इस बात का पूरा ध्यान रखा कि गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी इससे प्रभावित न हो। उन्हें मिलने वाली सब्सिडी कम न हो, सब्सिडी बंद न हो। इसके उलट सरकार ने इस बजट में किसानों के लिए 2000 रुपये की अतिरिक्त राशि देने की घोषणा की है और पहली किश्त दे भी दी है।

मनमोहन सरकार और मोदी सरकार में एक बड़ा अंतर यह है कि मनमोहन सरकार सब्सिडी खत्म करने की कोशिश में थी और मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि सब्सिडी सही लाभार्थियों तक सही तरीके से पहुँचे। आपको याद होगा कि मनमोहन सिंह ने कहा भी था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते, इसलिए लोगों को मुफ़्तख़ोरी की आदत छोड़नी चाहिए।

मेरी समझ यह कहती है कि राहुल गांधी ने गरीबों को 6000 मासिक देने की जो घोषणा जोर-शोर से की है, उसका असली मतलब ये है कि आज गरीबों को जितनी भी चीजों के लिए सब्सिडी मिलती है, कांग्रेस की सरकार वह सारी सब्सिडी खत्म कर देगी और उसके बदले में केवल 6000 की नकद राशि हर महीने लोगों को देगी।

याद रखिये कि वस्तुओं की कीमतें तो बढ़ती ही जाती हैं, इसलिए जिन चीज़ों पर सब्सिडी मिलती है, उनके दाम भी लगातार बढ़ते ही रहेंगे, लेकिन सब्सिडी की रकम 6000 ही रहेगी। इस तरह धीरे-धीरे यह रकम अप्रभावी हो जाएगी और वास्तव में उससे गरीबों का जीवन दूभर ही होगा।

मुझे पूरी आशंका है कि इस चुनाव के पहले की गई यह 6000 की घोषणा पिछले चुनाव से पहले शुरू की गई डीबीटी स्कीम का ही अगला चरण है। यही कारण है कि रघुराम राजन जैसे लोग इतने महीनों बाद अब अचानक साइलेंट मोड से बाहर निकल आए हैं और जोर-शोर से चिल्ला रहे हैं।

यह बात कितनी सही है या गलत, इसे देखने का काम आर्थिक विशेषज्ञों का है, लेकिन अगर यह सही है, तो भाजपा के मित्रों को मेरी राय है कि वे लोगों को बस इतना बता दें कि राहुल जी की कांग्रेस आपकी सारी सब्सिडी खत्म करने वाली है।

आप अगर बताएंगे कि हर महीने हर परिवार को 6000 रुपये देने के कारण देश के खजाने में कितने लाख करोड़ की ज़रूरत पड़ेगी या उतनी राशि जमा करने के लिए कितने करदाताओं पर बोझ पड़ेगा, तो ऐसी बातों से गरीब आदमी की समझ में कुछ नहीं आने वाला है।

उसको इस बात से फर्क भी नहीं पड़ता कि कौन-से खजाने से कितनी राशि निकलनी चाहिए और किस पर टैक्स का कितना बोझ पड़ने वाला है। गरीब को न वित्त मंत्रालय चलाना पड़ता है और न टैक्स देना पड़ता है, इसलिए ये सब बातें उसके लिए बेकार हैं।

अगर वाकई राहुल गांधी की यह योजना सब्सिडी खत्म करने के लिए है, तो गरीब को बस इतनी ही बात समझा दीजिए, वरना निश्चित मानिए कि लोग 6000 रुपये के लिए कांग्रेस को वोट दे देंगे और राहुल का यह एक झूठ आपका भारी नुकसान कर देगा।

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