विषैला वामपंथ : मिनिमम इनकम स्कीम की नीयत है, आर्थिक अराजकता

कल डिपार्टमेंट में दो नए बन्दे मिले। अंग्रेज़ डॉक्टर।

उनमें से एक ने कहा कि उसे पॉलिटिकली करेक्ट बातें करने वालों से, बात बात पर अन्याय और असमानता का रोना रोने वालों से बहुत कोफ्त होती है।

दूसरे ने इसका समर्थन किया और कहा कि बात हद से बढ़ती जा रही है… बात शुरू हुई थी एक अच्छी नीयत से, पर अब यह बेवकूफी की हद पार करती जा रही है… यह लिबरल शिट बन्द होना चाहिए।

मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने कहा, यह एक अनूठा आश्चर्य है। इंग्लैंड में यह पहली बार देख रहा हूँ कि एक कमरे में तीन लोग मिले जो इस टॉपिक पर बात कर रहे हों और तीनों इससे सहमत हों। क्योंकि मुझे तीन में एक या अक्सर दो तो लिबरल मिल ही जाते हैं।

फिर भी, एक छोटी सी असहमति मेरी तरफ से… तुमने कहा कि यह एक अच्छी नीयत से शुरू हुआ था और अब यह बेवकूफी की हद पार कर गया है… यह कुछ सही नहीं है। यह एक बेहद शातिर और ब्रिलियंट प्लान है और यह बिल्कुल अपनी नीयत के मुताबिक चल रहा है।

इसे ह्यूमैनिटी के कुछ सबसे शार्प ईविल जीनियसों ने शुरू किया और चलाया है। इसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि तुम्हें इसकी नीयत दिखाई नहीं देती। इसकी नीयत बिल्कुल वही है जो रूस, पूर्वी यूरोप, उत्तर कोरिया के कम्युनिस्ट शासनों की थी…

वहाँ भी किसी को इसकी नीयत तब तक दिखाई नहीं दी होगी जब तक यह सत्ता पर काबिज़ नहीं हो गया। यहाँ यह रास्ता बदल कर, राजनीति के बदले समाज के रास्ते सत्ता पर कब्ज़ा कर रहा है… यहाँ भी तुम्हें तबतक इसकी नीयत दिखाई नहीं देगी जब तक यह सबकुछ बर्बाद नहीं कर देगा…

बच्चों को बात का सर-पूँछ कुछ समझ में नहीं आया। उन्हें वामपंथ की नीयत पर शक नहीं था…

वामपंथ की सबसे बड़ी शक्ति यही है… लोगों को वामपंथ दिखाई नहीं देता। और जिन्हें दिखाई भी देता है उन्हें इसकी नीयत दिखाई नहीं देती।

राहुल गाँधी ने मिनिमम यूनिवर्सल इनकम का शगूफा छोड़ दिया है। ज़्यादातर लोग उनके पप्पूपने का मज़ाक बना रहे हैं। कुछ लालच और बेवकूफी में इसे लपक भी लेंगे। पर यह बात पप्पू के पप्पूपने से गहरी है।

आप इसकी इम्प्रक्टिकलिटी पर सवाल कर रहे हैं। आप पूछ रहे हैं इसका पैसा कहाँ से आएगा? आप पूछ रहे हैं कि आप सचमुच के सबसे गरीब लोगों की पहचान कैसे करेंगे और यह उनतक बिना घोटाले के पहुँचे इसे सुनिश्चित कैसे करेंगे?

सम्भल जाइये… ये गलत सवाल हैं।

इन सवालों के पीछे आपकी धारणा है कि यह यूनिवर्सल इनकम स्कीम है तो अच्छी चीज़, और इससे गरीबों का भला होगा… पर यह व्यवहारिक नहीं है।

यहीं आप नीयत को पढ़ने में गलती कर रहे हैं। आप सही समझ रहे हैं… इतने बड़े स्तर पर चलाई गई सोशलिस्ट योजना से आर्थिक अराजकता आ जायेगी। पर यह इसकी विफलता नहीं है… यही इसकी नीयत है।

जिसे आप दवा का साइड इफ़ेक्ट समझ रहे हैं, वही इस दवाई का इफ़ेक्ट है। अपने मूल रूप में यह योजना मूलतः आर्थिक अराजकता खड़ी करने के लिए ही बनाई गई है।

यह संकल्पना अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में 1960 से बेची जा रही है… पर अभी तक इसका खरीददार नहीं मिला है… वे इसका सफल प्रतिरोध कर पा रहे हैं। हमारे यहाँ चुनावी वादे के पिछले दरवाज़े से इसे घुसाने की साज़िश है…

अराजकता, वामपंथ के लिए सत्ता पर कब्ज़ा करने की ज़रूरी शर्त है। सोशलिज़्म की मूल नीयत ही आर्थिक अराजकता है। हर सोशलिस्ट योजना को शक की नज़र से देखिये… चाहे राहुल लाये या मोदी लाएँ, वामियों को अपना एजेंडा पूरा करने के लिए पार्टियों की कोई बंदिश नहीं होती।

अगर कोई सुविधा किसी अक्षम, असमर्थ, अपंग, विकलांग या वृद्ध व्यक्ति को मिल रही हो तो बात समझी जा सकती है। आइडियली तो वह भी सामाजिक स्तर पर होना चाहिए। वृद्ध व्यक्ति का भरण पोषण करना सरकार की नहीं, परिवार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। और हर व्यक्ति की जरूरत होनी चाहिए कि वह परिवार की संरचना में इन्वेस्ट करे। लेकिन लोगों को परिवार से तोड़कर सरकार पर निर्भर बनाने की योजनाओं का ही नाम सोशलिज़्म है।

शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति को बिना श्रम और उद्यम के मुफ्त में कुछ भी देना उसका और पूरे समाज का शोषण है। सरकार का काम सिर्फ वे परिस्थितियाँ पैदा करना है जिसमें हर कोई अपनी समृद्धि के लिए प्रयत्नशील हो। और उस परिस्थिति के बावजूद अगर कोई सर्वाइव नहीं कर पा रहा तो उसे सर्वाइव करने का अधिकार नहीं है।

देश की आबादी बहुत है, यहाँ बहुत भीड़ है। अगर दो-चार करोड़ लोग अपने निकम्मेपन की वजह से कम हो जाते हों तो कोई इतनी बुरी बात नहीं होगी। मेहनती को अवसर और श्रम का पुरस्कार मिले… निकम्मे को कुछ ना मिले। सोशलिज़्म इसकी ठीक विपरीत की व्यवस्था है… जहाँ निकम्मेपन का पुरस्कार मिलता है और श्रम करने वाले को दंड… जिसे टैक्स कहते हैं।

मिनिमम इनकम स्कीम में अव्यवहारिकता मत ढूँढिये, इसमें निहित आर्थिक अराजकता को देखिये. क्योंकि यही इसकी नीयत है… और सात हजार चार सौ सैंतीसवीं बार कह रहा हूँ …. वामपंथ को नीयत से पहचानें…

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