सीता को सबसे दुर्बल स्त्री बनाकर प्रस्तुत करना, एक आयातित विचार

युद्ध किसी भी युग की सबसे बड़ी त्रासदी है और यह हमने महाभारत काल से लेकर हीरोशिमा और नागासाकी की विभीषिका से देखा है।

मैंने कविता की संवेदना के अनुवाद में बार बार यह कहा है कि एक स्त्री कभी भी वीरता वाली या युद्ध को प्रेरित करने वाली कविता नहीं लिखेगी। क्योंकि यह सत्य है कि स्त्री सहज रूप से युद्ध नहीं चाहती।

और जब से कबीलाई लोग युद्ध करने आने लगे थे तब से युद्ध स्त्रियों के लिए एक ऐसी यातना बन गया था जिसके कारण जौहर जैसी कुप्रथा भारत में जन्मी। भारत में जौहर का आगमन इस्लामी आक्रान्ताओं के कारण ही हुआ था, इस बात से शायद ही कोई अनभिज्ञता दिखाए।

उससे पूर्व भी युद्ध होते रहे हैं और तमाम शक, हूण आदि आए और भारत की संस्कृति में बस गए। क्योंकि उनके द्वारा युद्ध का उद्देश्य महज़ सीमा विस्तार ही रहा होगा, अपने धर्म को बलात थोपना और ऐसा न करने पर लाशों के ढेर लगाना उनका उद्देश्य नहीं हुआ करता था। जैसा मैंने भी पढ़ा है।

शायद तभी भारतीय स्त्रियों में स्वभाव से शस्त्रों के प्रति कोई अरुचि नहीं दिखती है। सीता भी इतनी शक्तिशाली थीं कि उन्होंने शिव का धनुष उठा लिया था। मैंने हाल ही में पढ़ा कि वैदिक काल में व्यवसाय के कौशल की शिक्षा स्त्रियों को भी दी जाती थी ताकि वह किसी भी परिस्थिति से निबटने के लिए कार्य कर सकें।

जहां तक युद्ध न चाहने की बात है तो सीता भी युद्ध नहीं चाहती थीं, वह भी बार बार रावण से कहती थीं कि वह राम के पास उन्हें छोड़कर आए, और युद्ध तो शायद कृष्ण भी नहीं चाहते थे। परन्तु रामायण और महाभारत के युद्ध स्त्री के अपमान के कारण लड़े गए थे, उनके कारण किसी स्त्री का अपमान हुआ हो, या कहा जाए कि युद्ध में स्त्रियों को किसी प्रकार अपमानित किया गया हो, ऐसा कबीलाई संस्कृति के भारत आने से पहले दिखता नहीं है।

फिर भी स्त्री सम्पूर्ण मानव जाति का विकास चाहती है और युद्ध से हर संभव बचने का प्रयास करेगी, परन्तु जब युद्ध सामने आएगा तो वह काली भी बनेगी, लक्ष्मी बाई भी बनेगी और वह जीजाबाई भी बनेगी। वह मीरा बनकर भी जड़ परम्पराओं पर प्रहार करेगी।

जब से इस्लामी आक्रान्ताओं ने भारत में कदम रखा उन्होंने युद्ध में जीती गयी स्त्रियों को बाज़ार में नंगा बेचना शुरू कर दिया, और यहीं से देह के आधार पर स्त्री को पराजित होने का भाव बार बार जागृत हुआ। यह भी कई स्थानों पर है कि जीती गयी स्त्रियों को और युद्ध जीतने के लिए रिश्वत के रूप में भी देने का चलन यह सभ्यता लाई।

सांस्कृतिक भारत में युद्ध बहुधा आत्मरक्षा में ही लड़े जाते थे, और धर्म जो कि रिलिजन नहीं है, की स्थापना के लिए लड़े जाते थे, और सबसे बड़ी बात मूल्यों पर लड़े जाते थे। बिना मूल्य के धर्म शास्त्र सम्मत है ही नहीं।

जो सैनिक सुदूर अरब से आए उनके लिए लालच ही भारत की सम्पदा और स्त्रियाँ थीं। पश्चिम में भी स्त्रियों की आरम्भिक स्थिति बहुत भिन्न नहीं थी। उन्हें कई वर्षों तक तो इंसान ही नहीं समझा गया था।

समस्या यह है कि जब अनुवाद की परम्परा आई तब हमने हर चीज़ का स्थानीयकरण कर दिया, पश्चिम की स्त्रियों और पूरब की स्त्रियों की स्थिति में जो मूल अंतर था उसे भूल कर पश्चिम की स्त्रियों की पीड़ा को ही पूरे विश्व की स्त्रियों की पीड़ा मान लिया। और अनुवाद करते करते अपनी संस्कृति को भी अनूदित चश्मे से देखने लगे।

युद्ध नहीं चाहिए, यह मैं मानती हूँ, परन्तु भारतीय संस्कृति में यह भी है कि अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए शस्त्र उठाने पड़े तो उठाने में कोई हर्ज नहीं, तभी हमें आरम्भ से ही तमाम भारतीय स्त्रियाँ योद्धा के रूप में दिखती हैं।

एक तरफ भारत की भूमि पर अधिकाँश युद्ध जहां अपनी संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए लड़े गए उन्हें भी हम उसी चश्मे से देखने लगे, जिस चश्मे से हम वर्चस्ववादी विचारधारा द्वारा अपनी ही विचारधारा को पूरी दुनिया पर थोपे जाने की ज़िद को देखते थे।

बार बार हमें ज़रूरत है विचारों को समझने की, हमारी और उनकी अवधारणाओं में जो अंतर है उसे समझने की और अवधारणा को समझकर ही कुछ लिखने की। सीता को दुर्बल किसी ने नहीं दिखाया तो आखिर एक आयातित विचार के अंतर्गत लिखी गयी कविताओं में सीता को सबसे दुर्बल स्त्री बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया, जो कि आज तक की पूरे विश्व की सबसे शक्तिशाली स्त्री हैं।

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