अगवा हिन्दू लड़कियों के मामले में इतनी असहिष्णु क्यों हो गयीं मलाला?

कोई विषय यदि समाज के हित के लिए तभी आवश्यक होता है, जब उस विषय पर सारा समाज चर्चा करे। किसी दार्शनिक व समाज सुधारक के मन में समाज के हित बात आये तो ही वह समाज का हित हो ऐसा संभव नहीं है। इसके लिए समाज का उस विषय पर चर्चा करना आवश्यक है, और एकमत बनाना आवश्यक है।

इसी विधि के साथ सरकार देश में अनेकों अभियान चलाती है, जन जन तक समाज की आवश्यकताएं जैसे बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाना, मतदाताओं को मत के लिए जागरूक करना इत्यादि। जब ये विषय समाज में फैलते हैं, तो समाज इनपर चर्चा करता है और ये समाज के हित के विषय बन जाते हैं।

इसी विधि में एक और आवश्यक बात ध्यान देने वाली है कि इनकी चर्चा प्रभावशाली लोग करते हैं। जैसे अमिताभ बच्चन पोलियो ड्रॉप्स का प्रचार करते हैं और अभी हाल ही में अन्यान्य प्रभावशाली व्यक्ति चुनावों के लिए मत देने की मांग करने लगे हैं। प्रभावशाली व्यक्ति जब किसी विषय पर अपने विचार रखते हैं, तो समाज उनका अनुसरण करता है; समाज उन बातों पर ध्यान देता है।

इस वर्ष की होली में अपराध का एक ताज़ा मामला पाकिस्तान से सामने आया था, जिसमें 13 और 15 वर्ष की दो हिन्दू लड़कियों को जबरन बंदूक की नोक पर डरा के पहले तो अगवा किया गया उसके बाद उनका धर्म परिवर्तन कर उनसे इस्लाम कबूल करवाया गया। इसके बाद एक वीडियो सामने आया जिसमें उन लड़कियों का निकाह कराया जा रहा था। जानकारी यह भी है कि यह घटना पाकिस्तान के किसी प्रभावित व्यक्ति के द्वारा कराई गयी है। इन लड़कियों के नाम धर्म परिवर्तन से पूर्व रीना व रवीना थे।

ख़ैर यह तो हुई ख़बर, लेकिन इसकी प्रतिक्रिया काफ़ी तीखी रही, पाकिस्तान के हिन्दू समुदाय ने इस मुद्दे को काफी ज़ोर शोर से उठाया, और सीधे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के ऊपर सवाल उठाये।

किसी भी समाज में अपहरण, ज़बरन धर्म परिवर्तन, ज़बरन विवाह, अल्पायु में विवाह और महिलाओं के साथ ज़बरदस्ती इत्यादि स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। ये महिलाओं के लिये भी घातक है व एक प्रगतिशील समाज के लिए भी घातक है। ऐसे में समाज में यह बताना कि हमारे समाज में दुष्कर्म व अपराध हो रहे हैं और इनके विरुद्ध हमें आवाज़ उठानी चाहिए, बहुत आवश्यक हो जाता है।

पाकिस्तान में जो घटना घटी, ऐसी घटनाएं जब हमारे देश में घटती हैं तो हमारे देश के प्रभावशाली व्यक्तित्व उस विषय पर मुखर रूप से विरोध प्रकट करते हैं। दुनिया के किसी अन्य कोने में भी कोई दुर्घटना हो या अपराध हो तो भी प्रभावशाली व्यक्ति उन विषयों पर बोलते ही हैं। सीरिया में फ़ैलता आतंक, न्यूज़ीलैंड में आतंक की ताज़ा घटना इसके बहुत अच्छे उदाहरण हैं। मगर हमारे देश के ये प्रभावशाली व्यक्ति जो फ़िल्म बैन होने पर बोल सकते हैं, विदेशों में होने वाली घटनाओं पर बोल सकते हैं; वे इस विषय पर क्यों नहीं बोल सकते?

यही नहीं विश्व के सबसे प्रसिद्ध पुरस्कारों में से एक नोबेल शांति पुरस्कार से पुरस्कृत हस्ती मलाला युसुफ़ज़ई जब इस विषय पर चुप्पी साध लेती हैं, तो लगता है कि वे समाज के हित में नहीं अपने हित में सोच रही हैं। वह केवल पब्लिसिटी के लिए बयान देती हैं और उसी के लिए जीती हैं। इस विषय पर ट्विटर पर जब उनसे एक व्यक्ति ने समर्थन मांगा तो उन्होंने उस व्यक्ति को ब्लॉक कर दिया।

उस व्यक्ति के समर्थन मांगने पर इतनी असहिष्णु क्यों हो गयीं मलाला?

ब्रिटिश संसद में जब उन्होंने कहा था कि एक बालक, एक शिक्षक, एक कलम और एक पुस्तक ही सारी दुनिया बदल सकती है, तो अब वह पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों की इस स्थिति के संदर्भ में ऐसा क्यों नहीं कहती? किसी नोबेल पुरस्कार विजेता से क्या यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने के बाद वह अपने कामों को बन्द कर दे और अपने कहे से मुकर जाए?

मलाला की यह हरकत दुनिया भर में उन सब लड़कियों के लिए निराशा का प्रतीक है जो मलाला को अपना आदर्श मानती थीं। यह सोचना कि नोबेल पुरस्कार विजेता बच्चों के हक़ की लड़ाई लड़ेंगे, व्यर्थ हो जाएगा अगर यही स्थिति रही।

यहां उम्मीद सिर्फ मलाला ने ही नहीं, बल्कि देश के उन प्रभावशाली व्यक्तियों ने भी तोड़ा है जो न्यूज़ीलैंड की घटना पर न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री की तारीफ़ तो कर रहे थे, मगर अपने ही पड़ोसी देश पाकिस्तान में हो रहे इस कुकृत्य पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से सवाल नहीं कर रहे।
मलाला और ऐसे छद्म बुद्धिजीवियों ने यह साबित कर दिया कि समाज में जागरण के नाम पर वह षड्यंत्र रच रहे हैं और केवल चयनित विषय पर ही बोलते हैं, जिससे कि समाज सही दिशा में न जा सके।

संदर्भ:

https://www.google.co.in/amp/s/www.news18.com/amp/news/world/two-hindu-girls-kidnapped-forcefully-married-after-being-converted-to-islam-in-pakistan-on-holi-eve-2075969.html

https://www.goodreads.com/quotes/914955-one-child-one-teacher-one-book-one-pen-can-change

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