केसरी : अगर राष्ट्रवाद ज़हर है तो इसे हवाओं में थोड़ा और घोला जाये

कल दोपहर में समय खाली था, सोचा बहुत दिन से कोई फिल्म नहीं देखी है तो आज चला जाये। केसरी लगी हुई थी, कोई और ऑप्शन था नहीं। बाजीराव, पद्मावत और मणिकर्णिका देखने के बाद से एक बात मेरे मन में घर कर गयी है कि ऐतिहासिक घटनाओं और खासकर युद्धों पर फिल्म बनाने में बॉलीवुड आज भी उतना सक्षम नहीं हुआ है।

साथ ही केसरी फिल्म की कहानी पहले से जानता था, 21 सिक्खों ने 10 हजार अफगानों से लड़ मरने का फैसला किया था। इसलिये बॉलीवुड की ऐसे फिल्मों के बनाने की औकात जानते हुय बड़े बेमन से मैंने केसरी देखने का फैसला किया।

अक्षय कुमार हमेशा से मुझे पसंद रहे हैं, कद काठी से लेकर एक्टिंग तक में वह निपुण हैं। और उनकी फिल्में हमेशा पैसा वसूल होती हैं।

इंटरवल तक फिल्म में कुछ खास नहीं था, लेकिन बोर भी नहीं होने देता। वही अंग्रेजों द्वारा भारतीयों और भारतीय सैनिक जो सेना में थे, उनको जलील करना, नीचा दिखाना, वगैरह वगैरह। जो हम हर आज़ादी से पहले वाली दौर की कहानी वाली फिल्मों में देखते आये हैं।

लेकिन इंटरवल के बाद जो फिल्म बन पड़ी है मित्रों, कसम से यह हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन युद्ध वाली फिल्म बनी है। 21 सिक्खों को जिस प्रकार से 10 हजार से भी ज़्यादा अफगानों से लड़ता हुआ दिखाया गया है वह देख आपका कलेजा मुंह को आ जायेगा। आप सोच में पड़ जाओगे कि कैसे सिर्फ इन इक्कीस ने असल में यह लड़ाई लड़ी होगी। आप कितने ही पत्थर दिल क्यूँ ना हो, आपकी आँखे डबडबा जाएँगी। सेकंड हाफ का एक एक दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला है, एक एक कैरेक्टर की एक्टींग देखने लायक है।

और जब सारे सिक्ख मारे जाते हैं, तो अक्षय कुमार के साथ सिर्फ दो और सिक्ख बचे होते हैं। उसके बाद के दृश्य के लिये तो इस फिल्म के डायरेक्टर को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार देना चाहिये। अक्षय कुमार का सैंकड़ों के साथ लड़ मरना, केसरी रंग के प्रति मारा गया उनका एक एक डायलोग रोमांचित कर देगा।

अक्षय के मरने के बाद एक सिक्ख को तलवारों के बल पर जमीन पर लेटा देना, और सबसे अंत में एक 19 साल के सबसे छोटे सिक्ख का स्वयं को अग्नि में सौंप देना देख आप सुन्न पड़ जाओगे। हर समय लगता कि यहाँ फिल्म खत्म हो गयी, लेकिन अगले ही पल रोमांचित करने वाला एक और दृश्य सामने आ जाता।

भारत देश ऐसे बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है। यह इक्कीस सिक्ख अंग्रेजों के लिये नहीं लड़े थे, यह लड़े थे “सिक्ख रेजीमेंट” में लगे शब्द “सिक्ख” के लिये। हमारे राजपूत तथा अन्य क्षत्रिय योद्धा भी सिर्फ इसी आन के लिये अपने से कई गुणा ज्यादा बड़ी फौजों से लड़ भिड़ते थे। फिल्म ने बड़े ही समझदारी से शांतिदूतों की जहालत को भी दिखाया है, साथ में बैलेंस करने के लिये सेक्युलेरिज्म का तड़का भी लगाया है।

डायरेक्टर की निडरता को भी सलाम, जो दिखाता है कि हम दुश्मन के ज़ख़्मी होने पर पानी पिलाते हैं, और वह हमारे मरते ही हमारे शरीर से एक एक कपड़ा, जूते, अंगूठी तक नोच ले जाते हैं। हम सामने वाले को कम उम्र का सोच, बच्चा समझ छोड़ देते हैं लेकिन वही बच्चा मौका मिलते ही आपको मार देता है, आपकी तरफ के छोटे बच्चे तक को वह जलाने से नहीं हिचकते।

फिल्म ख़त्म होने के बाद सारी पब्लिक ने खड़े हो कर तालियाँ बजायी। सबके भीतर एक संतुष्टि का भाव था। हाँ एक वामपंथी रुझान वाली वेबसाइट को फिर से इसमें ‘ज़हरीला राष्ट्रवाद’ नज़र आया है।

तो मेरा आप सभी से निवेदन है कि सपरिवार केसरी देखने अवश्य जायें। अगर राष्ट्रवाद ज़हर है तो इसे हवाओं में थोड़ा और घोला जाये। यह फिल्म ज़रूर देखी जाये ताकि हमारे ऐसे ही सैंकड़ों अनगिनत वीर योद्धाओं पर फिल्म बनाने का मनोबल फिल्म जगत को प्राप्त हो।

  • अभिनव पाण्डेय

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