सनातन का वामपंथ

वाम शब्द का शब्दिक अर्थ अलग है, व्यवहारिक अभिप्राय अलग।

सनातन समाज में किसी भी धार्मिक क्रिया कलाप यज्ञ पूजन आदि में एक पत्नी अपने पति के बाईं और वामः अंग ही बैठती है। विवाह के समय ही सात फेरो में जब वर कन्या को अपने वामः अंग आने के लिए कहता है तब कन्या आने के लिए वचन भरवाती है कि यदि तुम ऐसा ऐसा आचरण करोगे तो मैं तुम्हारे वामः अंग में आ जाऊंगी।

इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि, हम अधिकतर काम दाएं हाथ से करते है। इस लिए दाएं भाग को पुरुष माना गया है जिसे अर्जन (कमाने) का कार्यभार मिला है। इसलिए एक पुरुष स्त्री को अपने बाएँ अंग (विश्राम अंग) में स्थान देता है। अर्थात उसका भार वहन करने का सूचक है। अर्धनारीश्वर रूप में भी शिव का वामः अंग स्त्रैण है।

जीव विज्ञान की दृष्टि से हमारे शरीर के सब से महत्वपूर्ण अंग भी बाईं ओर हैं जैसे हृदय लिवर गॉलब्लेडर। और सबसे रोचक बात ये कि मस्तिष्क का वामः भाग (बायाँ ) भाग ही दाएं शरीर को नियंत्रित करता है।

इसी सनातन में वाम मार्ग का एक अर्थ है प्रतिरोध या कहे हठ योग। तंत्र में इसे वाममार्गी साधना कहा गया है। ये भयावह होती है किंतु तुरंत फलदायी मानी गई है।

वैसे सनातन की विशेषता यही है की ये समावेश के नियम पर काम करता है। ये दो सत्यों को भी मानता ही और एक सत्य को भी। सनातन की दृष्टि में परस्पर दो विमुख विचार भी सही हो सकते है।

खैर तो वामः शब्द का अर्थ केवल बायाँ भाग नहीं, इसका अर्थ है विरोध, प्रतिरोध, संघर्ष, हठ।

सनातन में वाममार्ग हमेशा आदरणीय रहा है।
हमारे यहां भगवान शिव स्वभाव से वाममार्गी है।
क्या प्रजा के प्रति उदासीन राजाओं के विनाश के लिए फरसा उठा लेने वाले परशुराम वाममार्गी नहीं हुए। या लोक हित के लिए राजा दशरथ से उसके पुत्र मांगने वाले विश्वामित्र वामः मार्गी नहीं है। दशरथ अपनी चतुरंगिणी सेना देना का प्रस्ताव रखता है किंतु विश्वामित्र नहीं मानते। क्या सत्ता के शिखर पर बैठे पिता को झुकाने वाले विश्वामित्र वामः मार्गी नहीं हुए। एक अघोरी संन्यासी क्या वामः मार्गी नहीं है। क्या सत्ता के शिखर कंस को ललकारने वाला कृष्ण ग्वाला वाममार्गी नहीं हुआ।

राजपत्रित साधुवेषी कभी वाम नहीं हो सकते। जिन्हें सत्ता से भय हो या शक्ति का लोभ वो वाममार्गी नहीं हो सकता। सत्ता से मिलती भिक्षा से पेट भरने वाला साधु कैसे विद्रोही होगा।

आज आधुनिक वामपंथीयो ने वामः शब्द की जो खिल्ली उड़वाई है वो हास्यास्पद है।

आज के राजनीतिक परिपेक्ष्य में अगर मैं कहूँ तो असल में वामपंथी वो नहीं जिनकी पार्टियों के नाम लेनिन और मार्क्स की उधारी की विचारधारा पर चलते हैं। आज असली वामपंथी वो हैं जो 65 वर्षों से चली आ रही व्यवस्था के विरोध में मोर्चा थाम रहे हैं। जिन्हें आप किसी नेता या पार्टी का भक्त कह रहे हैं, भगवाधारी कह रहे हैं।

असल में ये लोग हैं जो उस राजनीति और व्यवस्थाओं के विरुद्ध खड़े हुए हैं, जो मुफ्तखोरी भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, तुष्टिकरण और परिवारवाद से बोझिल हो चली है।

यदि वामः का अर्थ है हठ, ज़िद और अल्पकाल में क्रांतिकारी परिवर्तन और सत्ता और व्यवस्थाओं को चुनौती है, तो बताइए असल वाममार्गी कौन हुए?

वो जो उन नेताओं के पीछे चल रहे हैं, जो नेता उस सत्ता के अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं, जिसे वो अपने परिवार की बपौती समझते हैं। या वो जो उस नेता के पीछे हैं जो प्रधानमंत्री पद को प्रधान सेवक का पद बनाना चाहता है, जो जनता के प्रति उत्तरदायी है।

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