इस वृद्ध योद्धा का अधिकार है राजनीति से संन्यास…

92 वर्ष की आयु में लालकृष्ण आडवाणी राजनीति से सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

भारत की राजनीति में लालकृष्ण आडवाणी मात्र एक व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीति की दशा-दिशा तय करने वाली ऊर्जा का नाम है।

भाजपा को ‘अटल की भाजपा’ से ‘मोदी की भाजपा’ बनाने वाले निर्देशक का नाम है लालकृष्ण आडवाणी।

वर्षों पूर्व आडवाणी जी ने भाजपा की जो छवि बनानी चाही थी, मोदी और शाह की जोड़ी ने भाजपा की जैसी ही छवि स्थापित की है। इसमें कोई संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी, आडवाणी जी द्वारा बनाई गई सड़क पर चल कर ही यहाँ तक पहुँचे हैं।

वस्तुतः अटल-आडवाणी युग में अटल जी जितने सौम्य थे, आडवाणी जी उतने ही प्रखर, या स्पष्ट कहें तो कट्टर। आडवाणी जी की कट्टरता को समझने का प्रयास करें तो उनकी कट्टरता अखड़ेगी नहीं, बल्कि उचित और मानवीय लगेगी।

दरअसल भारत के अन्य राजनेता जिस अत्याचार के नाम पर वोट बटोर कर अपने परिवार के लिए महल तैयार करते रहे हैं न, आडवाणी जी ने उस अत्याचार को देखा है, भोगा है।

स्वतन्त्रता और राष्ट्र के विभाजन के समय मचे लूट और कत्लेआम के गवाह रहे हैं आडवाणी जी, और पलायन के दंश को भोगा है उन्होंने… अपना घर, अपना गाँव, अपनी मिट्टी छोड़ने की पीड़ा क्या होती है, यह आडवाणी जी ने भोग कर समझा है। और यही कारण है कि आडवाणी जी कुछ मामलों में अटल जी से अलग कट्टर प्रतीत होते हैं।

कराची में जन्मे आडवाणी जी को अपनी मिट्टी अपने हिन्दू होने के कारण छोड़नी पड़ी थी, फिर कैसे न वे अपने हिंदुत्व के प्रति कट्टर होते? उन्हें कराची से भगाते समय बताया गया था कि कराची से दूर भारत ही उनका राष्ट्र है, फिर कैसे न वे अपने राष्ट्र को लेकर कट्टर होते? आडवाणी जी की कट्टरता स्वाभाविक है…

अपने धर्म और राष्ट्र को लेकर कट्टर होने के कारण ही पण्डित श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना के समय आडवाणी जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। जनसंघ अन्य दलों की तरह मात्र एक दल नहीं था, बल्कि स्वतन्त्र भारत में राष्ट्र और धर्म को केंद्र में रखने वाली नई और एकमात्र विचारधारा का प्रतिनिधि दल था। और कांग्रेस की चुकी हुई समन्वयवादी विचारधारा के बीच इस नई और तार्किक विचारधारा की स्थापना के लिए आडवाणी से अच्छा प्रचारक कोई अन्य नहीं हो सकता था।

आज देश में करोड़ों राष्ट्रवादी युवाओं की जो फौज खड़ी है, आडवाणी जी उस फौज के प्रथम ध्वजवाहक थे। कांग्रेस और वामपन्थ ने तो ‘राष्ट्रवाद’ को कभी स्वीकार ही नहीं किया, उसे स्वीकार्यता दिलाने वालों में लालकृष्ण आडवाणी सबसे बड़ा नाम है।

आडवाणी जी ने राजनीति में एक प्रतिष्ठित और शानदार पारी खेली है। अपने सबसे प्रिय मित्र के साथ सरकार बनाई और देश के उप प्रधानमंत्री रहे। यदि यह भी कहा जाय कि अटल जी के प्रधानमंत्री बनने में आडवाणी जी का योगदान अटल जी से भी अधिक था, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

दो सीटों वाली भाजपा को दो सौ सीटों वाली भाजपा बनाने में आडवाणी जी का क्या योगदान है, यह किसी से छिपा नहीं है। मोदी और राजनाथ जैसे अपने शिष्यों के साथ मन्त्रिमण्डल में रहना न उनके लिए उचित था, न ही उन्होंने रहना चाहा।

आडवाणी जी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने खूब प्रयत्न किया पर शायद यह पद उनके हिस्से में नहीं था। 2009 में जब भाजपा हारी तब मेरा व्यक्तिगत आकलन यही था कि आडवाणी जी को कोई आडवाणी न मिला जो उन्हें प्रधानमंत्री बना दे… अटल जी को आडवाणी मिले थे, आडवाणी जो उतना योग्य कोई नहीं मिला। कुल मिला कर बस इतनी सी बात है…

आडवाणी जी के माथे पर एकमात्र दाग है जिन्ना को सेक्युलर कहने का, पर एक सामान्य व्यक्ति भी यह जानता है कि किसी के घर जाकर उसकी वस्तु की बड़ाई करना राजनीति का ही नहीं बल्कि समाज का भी प्रोटोकॉल है।

आडवाणी पाकिस्तान में थे तो जिन्ना के लिए सम्मानजनक शब्द का प्रयोग करना उनकी मजबूरी थी, नहीं तो जिन्ना का सत्य उनसे अधिक कौन जानता है? पर आडवाणी जी का यह सामान्य शिष्टाचार उन्हें बड़ा भारी पड़ा। पर जीवन शायद इसी का नाम है…

92 वर्ष के इस वृद्ध योद्धा के लिए भारतीय राजनीति में अब कुछ भी पाना शेष नहीं, उनके हिस्से में जो कुछ भी था उसे वे पा चुके हैं। अब राजनीति से सन्यास उनका अधिकार है…

भारतीय राजनीति के इस लौह पुरुष को प्रणाम।

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