मोअ पक्षी के इतिहास की पुनरावृत्ति है न्यू ज़ीलैंड का भविष्य

क्राइस्टचर्च, न्यू ज़ीलैंड की 2 मस्जिदों में घुस कर एक श्वेत ईसाई ने गोली चला कर, 49 मुसलमानों को क्या मार दिया कि पूरा न्यूज़ीलैंड तो क्या, पूरा ईसाई पाश्चात्य जगत दहल सा गया है।

वैसे तो इस तरह की कोई भी पाशविक घटना दिल को हिला देती है लेकिन घटना के बाद, जिस तरह से न्यू ज़ीलैंड की प्रधानमंत्री ने अपने आचार व विचार से प्रतिक्रिया दी है, उससे तो यही स्पष्ट हो रहा है कि इस घटना ने न्यू ज़ीलैंड वासियों की मानसिकता व मनोदशा वास्तविकता का सामना करने की स्थिति में नही है।

उन्होंने पलायनवाद की राह पकड़ ली है। वहां के श्वेत ईसाइयों ने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संघर्ष की जगह बौद्धिकता व मानवतावाद के सामने समर्पण कर दिया है।

यह कितनी विचित्र बात है कि जिस देश न्यू ज़ीलैंड के इतिहास में 12 फीट ऊंचा विशाल पक्षी मोअ (Moa) मनुष्यों के पदार्पण करने के 200 वर्षो में विलुप्त होते देखा है, उसने इतिहास से कुछ नही सीखा है।

लोगो को मॉरीशस के डोडो पक्षी के बारे में पता है जो मॉरिशस के मूल निवासी थे लेकिन यूरोपियन के वहां पहुंचने के बाद एक ही शताब्दी में मार दिए गए थे लेकिन उससे पहले न्यू ज़ीलैंड अपने मूल निवासी पक्षी मोअ को खो चुका था।

सन 1300 में माओरी, मनुष्य प्रजाति के पहले लोग थे जिन्होंने न्यू ज़ीलैंड पर पैर रखे थे। उस वक्त 12 फिट ऊंचे विशालकाय पक्षी मोअ वहां विचरण करते थे। धरती पर इनका कोई नैसर्गिक शत्रु नहीं था इसलिए, उसके पंख होते हुए भी उड़ने की क्षमता समाप्त हो चुकी थी। इस कारण मोअ, माओरी लोगों का सबसे आसान शिकार व भोजन बन गये और देखते ही देखते 150 वर्षो में, 1445 तक, मोअ न्यू ज़ीलैंड से सदा के लिए विलुप्त हो गये।

मुझे क्राइस्टचर्च में हुई घटना ने उतना विस्मित नही किया है जितना इस घटना की प्रतिक्रिया में न्यू ज़ीलैंड की प्रधानमंत्री द्वारा हिजाब पहनना व उसका अनुसरण करते हुए टीवी पर समाचार पढ़ती स्त्रियों द्वारा पहनने ने किया है।

यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि जिस हिजाब का बहिष्कार मुस्लिम औरतें कर रही हैं, उसी को इन लोगों ने सोलोडेरिटी का प्रतीक बना डाला है। यह मानसिक दिवालियापन है और इसी लिए मुझे घटना के वास्तविक कारणों की विवेचना करने की जगह पाश्चात्य ईसाई जगत की मीडिया द्वारा, अपराधबोध को अपनी प्राथमिकता बनाने से कोई आश्चर्य नही हुआ है।

मेरे लिए यह सब संकेत है कि पाश्चात्य जगत का श्वेत ईसाई वर्ग अपनी बनाई हुई मानवतावाद और बौद्धिकता की चक्की में इतना फंस चुका है कि इस्लामी अतिवाद से निपटने के लिए उसके पास विकल्पों की ही कमी हो गयी है।

यह घनघोर आश्चर्य है कि क्राइस्टचर्च की घटना के 2 दिन पहले इथोपिया में मुस्लिमों द्वारा 32 ईसाइयों को मारा जाता है लेकिन उस पर मौन है। पाकिस्तान से लेकर मध्यपूर्व एशिया में हर माह, मुसलमानों का एक वर्ग दूसरे मुसलमानों के वर्ग को मारता है, उस पर भी मौन है।

आज चर्चजनित बौद्धिकता व मानवता, इस्लाम के अतिवाद का प्रतिवाद करने में अक्षम है। इसका कारण यही है कि योरप से लेकर हर वह राष्ट्र जो श्वेत ईसाई समाजिक व्यवस्था पर चल रहा है, उसी ने इस अतिवाद को अपने समाज में आमंत्रित किया है। अब जब आप विक्षिप्तता को आवास देंगे तो फिर आपको भी अपने अपने आवास से विस्थापित होने के लिए तैयार रहना चाहिए।

यदि यही घटना भारत में हो तो मैं समझता हूँ कि आज का भारत, इसको झेलने में ज्यादा समर्थ है क्योंकि आज बौद्धिकता व मानवतावाद के सामने समर्पण करने की जगह, हमने स्वयं मुसलमानों से ही प्रश्न करने का सशक्त विकल्प चुन रखा है। मैं न्यू ज़ीलैंड को मोअ की परिणीति की अग्रिम शुभकामनाएं तो नही दूंगा लेकिन मोअ की कहानी हमको नही भूलनी है।

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