बलिदान दिवस पर यह याद करना भी बहुत ज़रूरी

भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने साम दाम दण्ड भेद की ब्रिटिश नीति के जरिये 1909 के मार्ले-मिन्टो सुधार को सफलतापूर्वक लागू कर दिया था।

इस सुधार ने देश में धार्मिक आधार पर अलग निर्वाचन मंडल कर देश के विभाजन की नींव डाल दी थी।

उन्हीं दिनों ब्रिटिश हुकूमत की शक्ति, सर्वोच्चता और प्रभाव का प्रदर्शन करने के लिए 23 दिसम्बर 1912 को दिल्ली में एक शोभा-यात्रा निकाली गयी थी।

इस शोभा यात्रा में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग अपनी पत्नी के साथ एक सजे धजे हाथी पर बैठा हुआ था।

चांदनी चौक स्थित हाथी कटरा नाम के इलाके से गुज़रते समय उस शोभा यात्रा पर बमों से हमला कर के लॉर्ड हार्डिंग को मौत के घाट उतार देने की कोशिश की गई थी।

निशाना थोड़ा सा चूक जाने के कारण बम का मुख्य निशाना हाथी पर बैठा महावत बन गया था और उसके चिथड़े उड़ गए थे। लार्ड हार्डिंग और उसकी पत्नी घायल हुए थे लेकिन बच गए थे। किन्तु इस क्रांतिकारी घटना से ब्रिटिश साम्राज्य दहल गया था।

वायसरॉय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने वाले मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकन्द और मास्टर अवध बिहारी को 8 मई 2015 में दिल्ली जेल में तथा उनके साथी बसंत कुमार बिस्वास को 9 मई 1915 को अम्बाला जेल में फांसी दे दी गई थी।

यह वह दौर था जिन दिनों कांग्रेसी नेता ब्रिटिश शासकों की दलाली और चाटुकारिता कर के उनसे इनाम पाने की जुगाड़ में जुटे रहते थे।

(यह मैं नहीं कह रहा बल्कि स्वयं लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक ‘युवा भारत’ में यह सच खुलकर लिखा है।)

उल्लेखनीय है कि जिस दिल्ली जेल में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकन्द और मास्टर अवध बिहारी को फांसी दी गयी थी उसी दिल्ली जेल में अलग अलग समय पर 11 अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी दी गयी थी।

असेम्बली बम काण्ड के बाद गिरफ्तार हुए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को भी उस जेल में बंद किया गया था।

आज़ादी मिलने के कई वर्षों पश्चात बटुकेश्वर दत्त का जब दिल्ली जाना हुआ तो उनकी इच्छा हुई कि पुरानी स्मृतियों को ताज़ा करूं और दिल्ली की जेल की उस बैरक को देखूं जहां असेम्बली बम काण्ड के बाद अमर शहीद साथी भगत सिंह के साथ काफी समय गुज़ारा था।

बटुकेश्वर जी अपनी उस इच्छा के साथ जब बहादुर शाह ज़फर रोड स्थित दिल्ली जेल पहुंचे तो देखा कि जेल गायब हो चुकी थी। वहां एक नयी इमारत बनकर खड़ी हो चुकी थी। खाली सपाट पड़े शेष मैदान में कुछ नौजवान बैडमिंटन खेल रहे थे।

बटुकेश्वर जी ने जब उनसे जानकारी मांगी तो पता चला कि पुरानी जेल तोड़कर मेडिकल कॉलेज बना दिया गया है। मेडिकल कॉलेज का नाम मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मेडिकल कॉलेज रखा गया है।

इस मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में क्रांतिकारियों की स्मृति में एक काले ग्रेनाइट के पत्थर का एक छोटा सा स्तम्भ स्थापित कर के खानापूर्ति कर दी गयी थी। इस स्तम्भ को भी अस्पताल के मुर्दाघर से गर्ल्स हॉस्टल की तरफ जाने वाले मार्ग पर स्थापित किया गया था। अर्थात मेडिकल कॉलेज आने जाने वाले आम नागरिकों की निगाह भी उस स्तम्भ पर पड़ने की कोई संभावना नहीं छोड़ी गई थी।

देश के लिए बलिदान हुए अजर अमर क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान की पूजनीय स्मृतियों से सुसज्जित स्मारक तुल्य उस जेल को तोड़कर यदि मेडिकल कॉलेज बनाया गया था तो मेडिकल कॉलेज का नाम मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज क्यों रखा गया था? भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त या मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकन्द और मास्टर अवध बिहारी सरीखों से क्या आपत्ति थी तत्कालीन नेहरू सरकार को?

ध्यान रहे कि यह कोई रहस्य नहीं है कि देश की आज़ादी के लिए उन क्रांतिकारियों द्वारा किये गए संघर्ष और बलिदान की तुलना में मौलाना आज़ाद का संघर्ष अत्यन्त तुच्छ और निम्नस्तरीय नज़र आता है।

भगत, सुखदेव, राजगुरू की बलिदानी त्रिमूर्ति की आज पुण्यतिथि है। अतः उन अजर अमर बलिदानी क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि देते समय उनकी स्मृतियों को दबाने/ छुपाने/ कुचल देने के लिये किए गए षड्यंत्रों को, उन्हें रचने वाले षड्यंत्रकारियों के चेहरों को भी याद करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि सैम पित्रौदा सरीखी उनकी विषाक्त वैचारिक/ राजनीतिक वंशबेल उनके रक्तवंश की क्यारियों और गमले में आज भी फल फूल रही है।

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