अपने जीते-जी ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का स्वप्न अगली पीढ़ी को सौंप सकें, यही विजय है

2019 के चुनाव के जवाबी हमले के लिए काँग्रेस ने क्या तैयारियाँ की और कब शुरू की?

यह तैयारी बड़े ही वामपंथी स्टाइल में शुरू हुई। असंतोष और आक्रोश वामपंथियों का हथियार है। वे आपके असंतोष को हथियार बना कर आपके बीच घुसते हैं।

और असंतोष पैदा करने के लिए उनका तरीका होता है कि वे आपकी एक्सपेक्टेशन बढ़ाते हैं, उसे उस स्तर पर ले जाते हैं जहाँ वह पूरा ना हो सके।

मोदी हिन्दू नहीं है, मोदी हिंदुओं की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर रहा… यह एक ऐसा ट्रैप है जिसमें फँसना आसान है। यह कुछ वैसा है जैसे कि एक फैक्टरी की हड़ताल।

यह तरीका ट्रेड यूनियनों का है… अगर कंपनी 5% बोनस दे सकती हो तो उससे 7% मत माँगो, उससे 20% माँगो… जो वह दे ना सके और आपको असंतुष्ट होने का कारण मिले। यह वामपंथी ट्रेड यूनियन तरीका हमारे ऊपर अपनाया गया।

हमें बताया गया कि 2014 के बाद हमारे देश में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो जानी चाहिए थी, नहीं हुई। अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं, असंतोष का कारण मिला। और अगर आप असंतुष्ट हैं तो आप वामियों के कस्टमर हो सकते हैं।

2014 हिंदुओं की विजय थी, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह हिन्दू-द्रोहियों की पराजय थी। पर इससे देश के मानस के हिंदुत्व बोध की जागृति का काम पूरा हुआ, यह भी सही नहीं है।

देश की जनता आज भी हिंदुत्व के आग्रह से संचालित नहीं होती, पर हिंदुत्व एक कैटेलिस्ट का काम जरूर करता है। भाजपा का जो सबसे समर्पित समर्थक और कार्यकर्ता वर्ग है, उसकी प्रेरणा हिंदुत्व ही है। वही उसे घर से निकालता है, वही उसे प्रचार में उतारता है जब वह अपना रोज़गार, नौकरी और व्यापार स्थगित करके अपने खर्चे से भाजपा का प्रचार करता है।

पर जब वह भाजपा का प्रचार करने उतरता है, जनता के बीच जाता है तो हिंदुत्व का संदेश मूल संदेश नहीं होता। जनता के बीच बात रोजमर्रा के मुद्दों की ही होती है। जनता के बीच हिंदुत्व की भावना के खरीददार उतने नहीं होते। उसे सड़क, बिजली, विकास और भ्रष्टाचार के विषयों पर ज्यादा श्रोता मिलते हैं।

2014 में मैंने प्रचार किया था, दर्जनों मीटिंग्स में भाषण दिए थे। सैकड़ों को सुना था। हिन्दू अस्मिता का मुद्दा कितनी बार उठा हो, याद नहीं आता। यह विषय मेरे लिए मूल विषय था, पर मेरे श्रोता के लिए भी आकर्षक हो इसका भरोसा नहीं था।

दुर्भाग्य से यह सच है कि हिन्दू अस्मिता और सम्मान का विषय जिन्हें उद्वेलित करता है उनकी संख्या आज भी हाशिये पर ही है। और जहाँ तक भाजपा की शक्ति की बात है, ऐसे व्यक्ति भाजपा के प्राण हैं, पर अकेले उनकी संख्या काफी नहीं है। लोकतंत्र आपका समर्पण नहीं देखता, आपकी संख्या गिनता है।

2014, 16 मई की शाम… जिस दिन रिज़ल्ट आये थे तब मेरी अपनी पत्नी से बात हो रही थी तो मैंने कहा था – एक दिन आएगा जब मैं मोदी के विरुद्ध खड़ा होऊँगा। जब मोदी की उपयोगिता समाप्त हो चुकी होगी। देश की राजनीति की सेन्टर ऑफ ग्रेविटी को हिंदुत्व की ओर खींच कर लाने में उनका जितना योगदान संभव है, वह खर्च हो चुका होगा। मेरा आंकलन है कि वह समय 2024 में आएगा।

2014 की विजय हिंदुत्व की विजय थी, यह एक ‘लेज़ी स्टेटमेंट’ है। इसके मूल में यह आलस्य है कि काम पूरा हुआ… घर बैठो…

विक्ट्री डिक्लेअर करने की अधीरता या अपरिपक्वता हमारी वह कमज़ोरी है जिसका फायदा हमारे शत्रु उठा रहे हैं।

भारत की राजनीति 2014 के पहले ‘फार लेफ्ट’ में थी। मोदी ने उसे खींच कर सेन्टर में लाने का प्रयास किया है। आज भी यह ‘लेफ्ट ऑफ सेन्टर’ में ही है।

मेरा मानना है कि मोदी की क्षमता इसे अधिक से अधिक सेन्टर से थोड़ा सा राइट की तक ले जाने की है। अभी मोदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। उनकी क्षमताओं का पूरा प्रयोग नहीं हो पाया है। अभी उतना ही अचीव करने में हमारी पीढ़ी खर्च हो जाएगी।

जो हिन्दू राष्ट्र का स्वप्न है, वह हमारी पीढ़ी पूरा होते नहीं देखेगी। अगर अपने जीते-जी हम अपना यह स्वप्न अगली पीढ़ी को दिखा सकें, उनके हाथों में यह ध्वजा पकड़ा सकें तो यही विजय है।

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