फ़िलहाल खुलता नहीं दिख रहा मायावती का खाता

मायावती ने ऐलान किया है कि वह लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी।

अपना जनाधार पूरी तरह गंवा चुकी मायावती और चाहे जो कुछ भी हों, राजनीतिक बुद्धि तो रखती ही हैं और इस का गुणा-भाग भी खूब जानती हैं।

अपनी ज़मीनी स्थिति से भी ख़ूब वाकिफ हैं। चुनाव लड़ीं और हार गईं तो भारी फज़ीहत होगी।

तो भी अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए मायावती ने कहा है कि हंग पार्लियामेंट होगी और वह प्रधान मंत्री बनेंगी। और जो ऐसा हुआ तो कोई भी सीट ख़ाली करवा कर वह चुनाव लड़ लेंगी।

गुड है यह भी। सच यह है कि इस चुनाव में मायावती की स्थिति अखिलेश से भी ज़्यादा ख़राब है।

लेकिन हारे, घबराए और बौखलाए हुए अखिलेश मायावती के भौकाल में फंस कर मायावती के सामने पूरी तरह समर्पण कर गए हैं। लेकिन इस समर्पण का उन्हें एक भी पैसे का लाभ मिलता नहीं दिख रहा है।

इस से बेहतर तो यह रहा होता कि अखिलेश अपने पिता मुलायम और चाचा शिवपाल के सामने समर्पण कर गए होते तो शायद ज़्यादा लाभ में रहते।

वैसे भी अखिलेश के पास अगर राजनीतिक समझ होती तो इस बार कांग्रेस से ही गठबंधन करते, मायावती से नहीं। बीते विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के बजाय मायावती से करना था पर लोकसभा में कर लिया।

सुई का काम तलवार से और तलवार का काम सुई से करने का यह शौक ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुम को भी ले डूबेंगे’ वाला शौक है।

मायावती उपचुनाव अमूमन नहीं लड़तीं, न इस बार लड़ीं। अखिलेश को भाव दे दिया और अखिलेश सफल रहे। इस घबराई हुई सफलता में अखिलेश मायावती के बबुआ बन कर फंस गए हैं।

रामगोपाल के दुर्योधनी कुचक्र में फंसे अखिलेश अब मायावती की शकुनी चाल में फंस कर अपना राजनीतिक जीवन दांव पर लगा बैठे हैं। इस चुनाव में अखिलेश बीते चुनाव से ज़्यादा खोने जा रहे हैं। लेकिन गठबंधन के नशे में अपने पांव पर मारी गई कुल्हाड़ी को वह देख नहीं पा रहे हैं।

मायावती अपने साथ अखिलेश की राजनीति को बदरंग करने में पूरी ताक़त से लग गई हैं। सपा-बसपा ने अगर अपने गठबंधन में कांग्रेस को भी शामिल कर लिया होता तो शायद कुछ सांस मिलती। पर कांग्रेस की तरह मायावती ने भी अपने अहंकार और सनक में कांग्रेस से दूरी बना ली।

बाकी वोट तो मिसिंग थे ही इस गठबंधन से, अब मुस्लिम वोट के बंटवारे ने भी इन दोनों की फज़ीहत और हार की कहानी अभी से लिख दी है।

आलम यह है कि दोनों मिल कर भी डबल डिजिट नहीं छूने वाले हैं। बड़े-बड़े अक्षरों में यह कहीं लिख कर रख लीजिए।

बहुत संभव है, मायावती बीते चुनाव का रिकार्ड मेनटेन करते हुए शून्य पर ही उपस्थित रहें। खाता खुलता फ़िलहाल नहीं दिख रहा मायावती का।

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