16 साल के पत्थरबाज़ नहीं, होली पर गुब्बारे फेंकने वाले आतंकी नज़र आते हैं उन्हें

Quint आज के प्रचलित वेब पोर्टलों में से एक वेब पोर्टल है, जिसपर समाचार व विचार प्रकाशित होते हैं। यह प्रिंट माध्यम नहीं है, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है; इसलिए इनके पाठक भी केवल वही हैं जो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर सजग हैं।

अभी देश में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर सजग रहने वाले लोग कम हैं और मुद्रण माध्यम पर ध्यान देने वाले लोग अधिक हैं, इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाली बातें अभी देश के कोने कोने तक नहीं पहुंच पा रही है, मगर जिस प्रकार रेडियो और समाचार पत्र को पछाड़कर देश की नब्ज़ तय समाचार चैनलों ने करनी शुरू कर दी, आने वाले समय मे यह नब्ज़ पकड़ने का काम सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ही करने वाले हैं। इसलिए इन पर जो चल रहा है, वह निकट भविष्य में समाज की दशा दिशा तय करेगा।

क्विंट ने आज एक ट्वीट किया उस ट्वीट में क्विंट ने एक लेख लिखा और सवाल किया कि क्या अपने बच्चों को होली के नाम पर गली मोहल्लों में आतंक फैलाने का काम कराना ज़रूरी है? (Should we allow kids to unleash terror on the streets in the name of holi?)
अब मोटा मोटा यह आर्टिकल बच्चों के बैलून फेंकने के ऊपर लिखा गया है जिसके कारण कुछ हादसे हो जाते हैं, कई बार ये हादसे इतने बड़े होते हैं कि मौत तक हो जाती है।

मगर ऐसे में इसे आतंक का नाम कैसे दे सकते हैं? ये माना जा सकता है कि डर लगता है मगर आतंक का नाम देने का मतलब है कि उस क्षेत्र में माहौल ही पूरा डर का है, कोई व्यक्ति चैन से नहीं रह सकता। ये तो फ़िर भी मासूम बच्चे हैं मगर जो आतंकी 15-16 साल की आयु में पत्थरबाज़ी शुरू करते हैं और बाद में आतंकी बनते हैं, उन्हें तो आप आतंकी कहने से भी डरते हैं और भटके हुए नौजवान कह देते हैं।

ऐसे में यह कह देना कि बच्चों से ‘आतंक का माहौल तैयार कराया जा रहा है’ कहाँ तक जायज़ है। उन मासूम बच्चों ने आतंक नहीं देखा, उन्होंने तो केवल ख़ुशी देखी है; उन्होंने वो देखा है जो आपने उन्हें दिखाया है।

होली पर होने वाली दिक्कतों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है और होली पर यह तरीका नाजायज़ माना जा सकता है, मगर बच्चों को आतंकवादी कहने का प्रयास करने का अर्थ है कि आपकी बुद्धि पर धूल जम गयी है।

आप बता सकते हैं कि बालकनी से बैलून फेंकने पर होली में अपनापन नहीं बढ़ाया जा सकता है, अपनापन घर घर जाकर होली खेलने में है; अपनापन घरों से निकालकर गली मोहल्लों में होली खेलने से है। अगर आप होली के रंगों से बचना चाहते हैं और बैलून से बचना चाहते हैं तो आप मत निकलिये घरों से। आपकी अगर होली न खेलने की स्वतंत्रता है तो किसी अन्य की होली खेलने की स्वतंत्रता है; कोई आपके चक्कर में अपनी होली क्यों न खेले?

कोई क्यों बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न न मनाए?

आप कह सकते हैं कि होली पर ग़लत परंपराएँ चल रही हैं, होली में कीचड़, गोबर, पक्के रंग, ग्रीस और अंडों का प्रयोग होने लगा है। आप इसमें सुधार की बात कर सकते हैं; मगर जैसे ही आप होली के त्योहार को आतंकी घोषित करने का प्रयास करेंगे; आप समाज के बहुत बड़े हिस्से की खुशी छीनने की कोशिश करेंगे। सुधार के लिए वह समाज हमेशा तैयार रहा है, मगर उसपर जिसने भी अपना एजेंडा थोपने की कोशिश की है, उनका उसने डटकर मुक़ाबला किया है।

अगर आप समाज के लिए सकारात्मक सोचेंगे समाज आपको स्वीकारेगा, अगर आप समाज के लिए नकारात्मक सोचेंगे तो समाज आपका भी वही हाल करेगा जो आपके अन्य क्रांतिकारी पत्रकारों का हो रहा है। इसलिए आतंकी घोषित कीजिये पत्थरबाजों को, मासूम बच्चों के कोमल गालों पर रंग लगाइए और उनके कोमल हाथों के स्पर्श से ख़ुद को रंगिये।

होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

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