इनके पास लगा हुआ है कौन सा कल्पवृक्ष

बात सत्तर के दशक की है। उम्र छोटी थी मगर इतना याद है कि कोलकाता (tab कलकत्ता) में एक दूर के रिश्तेदार के घर हमेशा की तरह गए थे।

घर क्या पूरी कोठी थी। अंग्रेजों की शब्दावली में बंगला। और फिर क्यों ना हो डनलप ब्रिज पर एक कारखाने के मालिक जो थे।

हम सब बच्चे घर के बाहर बगीचे में खेल रहे थे मगर घर के अंदर इस बार गहमागहमी थी।

स्ट्राइक, धरना, प्रदर्शन, लॉकआउट जैसे नए शब्द सुनने में आये थे।

बाद में उम्र बढ़ी तो इतना समझ आया था कि यूनियनबाज़ी के कारण कलकत्ता की अनेक मिले बंद हुई थीं, जो फिर कभी खुली ही नहीं।

वामपंथ ने कोलकता के अर्थतंत्र को किस तरह कुचला था इसका साक्षी रहा हूँ। अधिकांश मिल मालिक शिफ्ट-आउट कर गए थे। मगर फिर नई जगह में फिर से धंधा वैसे ही चल पड़े जरूरी तो नहीं। व्यापार में वैसे भी उतार-चढ़ाव चलता रहता है।

और कइयों का हाल बुरा हुआ। सुना है अपने ही उपरोक्त रिश्तेदार की तीसरी पीढ़ी अब कहीं नौकरी कर रही है और जहां तक बात समझ आती है किराये के मकान में रहती है।

कहने का तात्पर्य यहां इतना मात्र है कि व्यापार में पैसा जितना तेज़ी से आता है उतना ही तेज़ी से चला भी जाता है। कारण कई हो सकते हैं। अगर यह सत्य नहीं होता तो अनिल अम्बानी मात्र पांच सौ करोड़ के लिए अपने बड़े भाई का मुँह नहीं देखते।

हिंदुस्तान में ऐसे अनेक नामी व्यापारी मिल जायेंगे जो दूसरी तीसरी पीढ़ी तक गुमनाम हो गए। कई तो ऐसे भी है जो अपने जीवनकाल में ही दिवालिया हो गए।

व्यापारी ही क्यों, राजा महाराजाओं को भी सड़क पर आते हम सब ने देखा है। सुना है कि मुग़ल वंश के लोग कोलकता और हैदराबाद में भीख मांगने की हद तक गरीब हो गए हैं। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, 1857 अर्थात मात्र 150 साल पहले ही तो बहादुरशाह ज़फर हुआ था।

चलो मान लिया कि मुग़ल वंश की हालत पहले से ही खराब थी, मगर अन्य अनेक राजवंश भी महल से मिट्टी में आ मिले हैं। सिर्फ वही बच पाए जिन्होंने समय रहते नए व्यापार में पैसा लगाया।

लेख के अपने बिंदु पर आऊं तो कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि हिंदुस्तान में एक आम कहावत है कि लक्ष्मी एक घर में नहीं टिकती।

सवाल यहां मन में यह आता है कि जब राजे-महाराजे और बड़े बड़े व्यापारी बर्बाद हो जाते हैं तो फिर राजनीति में ऐसा कौन सा पैसे का पेड़ लगा हुआ मिलता है कि यहां कभी कोई पतझड़ नहीं आता।

ऐसा क्या है कि अनेक सेठों के सड़क पर आने के उदाहरण मिल जायेंगे मगर कोई बड़ा राजनेता कटोरा लेकर खड़े होने की स्थिति में पहुंच गया हो, ना तो देखा ना ही सुना।

कुछ एक ईमानदार राजनेता ज़रूर हुए जो आम जीवन काट गए मगर यहां exception does not make the rule.

चलिए छोटे-मोटे राजनेताओं की क्या बात करना, मगर हिंदुस्तान में कुछ एक राजपरिवार ऐसे हैं जो ना जाने कब से राजमहलों में रह रहे हैं। आजतक यह समझ नहीं आया कि इनके पास कौन सा कल्पवृक्ष लगा हुआ है जो हर मौसम में तीन-चार से पांच पीढ़ियों तक बिना किसी खाद पानी के पैसे दे रहा है?

क्या यह किसी विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के आर्थिक प्रबंधन के लिए शोध का विषय नहीं होना चाहिए?

यकीनन यह शोधपत्र विस्मयकारी तथ्यों से भरा हुआ मिलेगा!

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