‘उन’ का संदेश साफ़ था, ‘हमसे टकराने की सोचना भी मत’

असीमानन्द कोई सेलिब्रिटी तो थे नहीं।

वे यूनिवर्सिटियों में कृमियों की तरह चिपके कोई लुच्चे प्रोफेसर भी नहीं थे, जो अस्मत के बदले डिग्री बाँटते हैं।

उनके पास तो सत्ता की कोई चमक भी नहीं पहुंची थी।

विरक्त सन्यासी थे।

बहुत कम भोजन करते। उससे भी कम बोलते थे।

कौन कह सकता था कि एमएससी डिग्री धारी यह बंगाली, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के आदिवासी समुदाय में इतना लोकप्रिय और सर्वस्वीकार्य बन जाएगा?

एक झोला, गमछा और कौपीन ही उनकी पूँजी थी।

गुजरात के डांग जिले में, वनवासी समुदाय के साथ घुल मिलकर रहते और वहाँ चल रही ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरण की साज़िश के बीच दीवार बनकर खड़े थे।

चर्च की नज़र में यह गुनाह था।

चारित्रिक दुर्बलता से तो फँस नहीं सकते, अतः कथानक को बम विस्फोटों से जोड़ा गया।

उन्हें साध्वी प्रज्ञा से भी भयंकर यातनाएं दी गईं।

बेहोशी की हालत में, उनसे इकबालिया बयान पर अंगूठे लगवाए गये।

अब वे निर्दोष सिद्ध हुए भी, मगर पीछे वनवासी क्षेत्रों में जो तबाही हुई होगी उसका अनुमान है किसी को?

असीमानंद और प्रज्ञा ठाकुर को दी गई अमानवीय यातनाओं को जानबूझकर बीच बीच में इसलिए लीक किया गया, ताकि और किसी की हिम्मत न पड़े।

और आप देखेंगे कि इस अवधि में सारे साधु सन्यासी लगभग दुबक गये थे या सेक्युलर दिखने की होड़ मची थी।

2005 से 2013 तक एक मैसेज दिया गया था।

हमसे टकराने की सोचना भी मत।

यही मैसेज देश की टॉप ब्यूरोक्रेसी को भी दिया गया था… डी जी वणजारा याद ही होंगे।

देश को हतोत्साहित करने के इस षड्यंत्र के परिणाम अभी लंबे समय तक दिखेंगे।

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