जाइए, अमेठी और रायबरेली बचाइए

एक समय मुझे लगा था कि प्रियंका उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए संजीवनी बन कर आई हैं। एक संभावना बन कर आई हैं। कुछ न कुछ करिश्मा ज़रूर करेंगी। लेकिन यह मेरा पूरी तरह ग़लत आकलन था।

अब स्पष्ट हो गया है कि वह मृत कांग्रेस में प्राण फूंकने में निरंतर असफल होती दिख रही हैं। पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि वह सिर्फ़ अपने पति को बचाने के लिए कांग्रेस में आई हैं, कांग्रेस को बचाने के लिए नहीं।

यह उन का दुर्भाग्य ही था कि कांग्रेस का महामंत्री बनते ही पति रॉबर्ट वाड्रा को ई डी ने बुलाना शुरू कर दिया। सम्मन पहले ही से था। तो पहला, दूसरा हफ्ता उन का पति सेवा में, उन की सुरक्षा में गुज़रा।

बड़े ताम-झाम से तीन दिन के लिए लखनऊ आईं और रोड शो के बाद शाम को जयपुर निकल गईं। पति की सुरक्षा में। जहां वह फिर ई डी की जांच का सामना कर रहे थे। सुबह लखनऊ लौटीं। यात्रा की समाप्ति पर शाम को प्रेस कांफ्रेंस करनी थी। लेकिन उसी सुबह पुलवामा जैसा भयानक हादसा हो गया। प्रेस कांफ्रेंस रद्द करनी पड़ी।

अभी उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा गठबंधन में तमाम मुश्किलों के बावजूद कांग्रेस के शामिल हो पाने की जो थोड़ी-बहुत राह निकल सकने की संभावना शेष थी, उसे भी मेरठ जा कर भीम आर्मी के चंद्रशेखर से मुलाकात कर प्रियंका ने एक लीड भले लेने की कोशिश की पर मायावती सिरे से उखड़ गईं।

गठबंधन का दरवाज़ा पूरी तरह बंद हो गया कांग्रेस के लिए। बेंगलूर में सोनिया ने मायावती के साथ जो फ़ोटो केमेस्ट्री बनाई थी, छन्न से टूट गई। पता चल गया कि प्रियंका को राजनीति का ककहरा भी नहीं आता।

साबित हो गया कि प्रियंका ने उत्तर प्रदेश की चुनावी शतरंज पर ग़लत चाल चल दी। प्रियंका की यह बहुत बड़ी राजनीतिक भूल है चंद्रशेखर से धधा कर मिलना।

नरेंद्र मोदी को काटने के लिए प्रयागराज से काशी तक का उन का स्टीमर विहार भी आज पानी में मिल गया। चर्चा चुनाव के बजाय, लोगों से संपर्क के बजाय उन के मंदिर और दरगाह यात्रा की हो रही है। तिस पर एक मंदिर में प्रियंका के सामने एक पूरा हुजूम ही मोदी-मोदी करने लगा। प्रियंका ठिठक कर रह गईं।

कांग्रेस की तरफ से सफाई दी गई कि यह मोदी-मोदी करने वाली जनता नहीं, भाजपा के कार्यकर्ता थे।

एक तो वह भाजपा कार्यकर्ता नहीं थे। और चलिए एक बार मान ही लेते हैं कि वह भाजपा कार्यकर्ता ही थे। तो क्या यह पूछना मुनासिब नहीं होगा कि फिर कांग्रेस के कार्यकर्ता वहां क्यों नहीं थे?

दिक्कत बड़ी यही है प्रियंका की कि उन की कांग्रेस के पास कार्यकर्ता नहीं हैं। स्टीमर यात्रा में उन के साथ भाजपा की वर्तमान बाग़ी सांसद सावित्री फूले ही आगे-पीछे लगातार दिखीं। तो क्या कांग्रेस में कोई और महिला कार्यकर्ता नहीं है। नेताओं में प्रयाग घाट पर प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और स्टीमर पर बेहद बदतमीज़ प्रवक्ता अखिलेश सिंह ही दिखे।

प्रियंका को जब नदी किनारे लोग नहीं मिले तो वह सड़क मार्ग से चलने लगीं। कांग्रेस में क्या सारे के सारे बुद्धिहीन लोग ही प्रियंका के सलाहकार हैं। माना कि प्रियंका को ज़मीनी अनुभव नहीं है लेकिन क्या कांग्रेसी लोग यह बात नहीं जानते कि स्टीमर कभी भी नदी का किनारा नहीं छू सकता। बिना गहराई के वह हिल भी नहीं सकता। नाव पर चढ़ कर ही स्टीमर तक पहुंचा जा सकता है। तो लोग उन से मिलेंगे भी कैसे भला।

इस तरह प्रियंका का स्टीमर विहार फ़िलहाल तो फ्लॉप साबित हो गया है। महज़ पिकनिक बन कर रह गया है। यह ठीक है कि प्रियंका बहुत मीठा बोलती हैं, राहुल गांधी की तरह चीखती-चिल्लाती नहीं, सुलझी हुई दिखती हैं। लेकिन यह सब चिकनी-चुपड़ी बातें, साफ़-सुथरा अंदाज़ अमेठी और रायबरेली तक के लिए ही शूट करता है। आगे की धरती बहुत कड़ी है प्रियंका।

रायबरेली और अमेठी का अधिकांश ऊसर इलाका है। प्रयाग से काशी की धरती बहुत बीहड़ और बहुत उपजाऊ है। यहां गंगा बहती है। फिर नरेंद्र मोदी जैसे घाघ, तिकड़मी और मेहनती से उन का सीधा पाला पड़ने वाला है। वह नरेंद्र मोदी जो आप के भाई के साल भर की मेहनत से कमाया मशहूर और निगेटिव नारा ‘चौकीदार चोर है’ को पॉज़िटिव एंगिल दे कर, ‘मैं हूं चौकीदार’ के नारे में पूरे देश को परोसने का हुनर जानता है। ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ का हाई जोश भर कर वोट को अपने पक्ष में बटोरने का कमाल कर कमल को खिलाना जानता है।

ऐसे नरेंद्र मोदी से आप का पाला पड़ा है प्रियंका। ध्यान से देखिए तो आप के भाई राहुल गांधी की अमेठी में भी भाजपा सेंध लगाने में जी जान लगाए है। जाइए, अमेठी और रायबरेली बचाइए। नहीं आधी छोड़, पूरी को धावे, पूरी पावे, न आधी पावे वाली स्थिति आ जाएगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश संभालने से पहले अगले चुनाव के लिए पहले अपने लिए कार्यकर्ता तैयार कीजिए। ताकि दुबारा किसी मंदिर में मोदी-मोदी सुनने का अपमान न भुगतना पड़े।

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