राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के संरक्षण का युद्ध था पिछला चुनाव, अब है उसके स्थायित्व के लिए महायुद्ध

भारत में 11 अप्रैल 2019 से शुरू होने वाला लोकसभा का चुनाव, भारत के इतिहास का सबसे भीषणतम चुनाव होने वाला है।

भारत के लोकतंत्र की छत्रछाया में होने वाला यह चुनाव न सिर्फ कलुषित व अमर्यादित होगा बल्कि यह राजनेताओं से लेकर उनके समर्थकों के चरित्रों की विक्षिप्तता की नई नई परिभाषाओं को भी गढ़ेगा।

यह सब इसलिये होगा क्योंकि इस चुनाव के जो परिणाम 23 मई 2019 को आएंगे वो विहंगम होंगे, जो भविष्य के भारत को सदैव के लिए बदल देंगे।

2019 का चुनाव, 2014 के चुनाव से बिल्कुल अलग है। हमारे लिए 2014 का चुनाव भारत के केंद्र में सत्ता परिवर्तन के लिए संघर्ष था लेकिन 2019 का चुनाव, भारतवासियों के एक वर्ग की पुरातन व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की उत्कंठा का नाश करने का है। 2014 का चुनाव यदि समर था तो 2019 का चुनाव महासमर है।

हमारे लिए, भारत में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के संरक्षण के लिए 2014 का चुनाव सिर्फ एक रण था लेकिन इसको स्थायित्व प्रदान करने के लिए 2019 का चुनाव, युद्ध है। 2019 का चुनाव, भारत का कुरुक्षेत्र है। यह हर भारतीय का कुरुक्षेत्र है। आधुनिक भारत का यह एक ऐसा चुनाव है जहां युद्ध की घोषणा से पहले ही लोगों ने अपने अपने पक्ष चुन, रणक्षेत्र में अपनी उपस्थिति की घोषणा कर दी है।

मैंने भी शस्त्रों से सुसज्जित अपना रथ, राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के पक्ष में खड़ा किया हुआ है। मेरे लिए तो भारत के 2019 के चुनाव में राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के पक्ष में खड़े होकर युद्ध करना साधु, पुनीत व धर्म है और साथ में करोड़ों संगी साथी युद्धातुर खड़े दिख रहे है।

लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या युद्ध के शुरू होने पर हमारे व्यक्तिगत स्वार्थ की अंधता, बौद्धिकता का अभिमान व जातिगत दम्भ की कलुषता, ‘किंतु-परन्तु’ के चक्रवात में फंसा कर धर्म का युद्ध लड़ने देगी? क्या युद्ध मैदान में, अपनो को विपक्ष में खड़ा देख, अर्जुन की भांति गांडीव उठाने में हमारे हाथ कांपेंगे?

मैं देख रहा हूँ कि जैसे जैसे संसदीय क्षेत्रों के टिकट पर लोगों के नाम आने लगे हैं वैसे वैसे कुछ लोगों का राष्ट्रवाद व हिंदुत्व, कपूर बन हवा होने लगा है। अपनी पसंद के प्रत्याशी को सामने न देख, उनके गले की आवाज़ रुँधने लगी है। इसमें भी संदेह नहीं है कि ऐसे लोग जब मत डालने जाएंगे तब ईवीएम मशीन पर कमल का बटन दबाने में उनके हाथ कांपेंगे।

मुझे अपने ऐसे ही मित्रों से कहना है कि यह द्वापर युग नहीं है जहां, श्रीकृष्ण सारथी बन हमारे अंदर के अर्जुन को गीता का ज्ञान देंगे। यह कलयुग है, यहां हम ही कृष्ण हैं और हम ही अर्जुन भी हैं। हम 2019 के इस धर्मयुद्ध में सिर्फ अपने पुराने इतिहास की शरण व उससे आत्मबल ले सकते हैं। यह हमारी लड़ाई है, जिसे हमें ही लड़ना व जीतना है। हम को यह नहीं देखना है कि वर्तमान में हमारी व्यक्तिगत संतुष्टि किसमें है, हमें यह देखना है कि भविष्य हमारी पीढ़ियों को क्या संतुष्टि देगा।

आपको कुरुक्षेत्र की रणभूमि के बीच खड़े अर्जुन को भूलना होगा और उस अर्जुन पर केंद्रित होना होगा जो गुरु द्रोणाचार्य से धनुष चलाने के गुर सीख रहा था। महाभारत में एक बहुत सुंदर प्रसंग है कि गुरु द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों की परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने आश्रम के पास के एक पेड़़ की डाली पर एक मिट्टी से बनी हुई चिड़िया को बांध दिया और सभी को उस चिड़़िया की आंख पर निशाना लगाना था। सभी शिष्यों के मन मे प्रश्न था कि गुरुवर की इतनी सरल परीक्षा क्यों ले रहे हैं? यह तो बिल्कुल सहज काम हैं!

जब परीक्षा का समय आया तो सभी शिष्यों से पूछा गया कि तुम्हे क्या क्या दिखाई दे रहा है? युधिष्ठिर ने कहा कि मुझे चिड़िया और उसके आस पास की टहनियों के अलावा आकाश आदि दिखाई दे रहे हैं। गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को निशान लगाने से रोक दिया।

फिर दुर्योधन की बारी आई। दुर्योधन से भी यही सवाल पूछा गया तो उसने कहा कि मुझे पास में बैठे हुए पक्षी, उनके पंख, आकाश, पेड़ की डालियां आदि दिखाई दे रही हैं।

इसी तरह सभी से यही सवाल पूछे गए और सब ने लगभग इसी तरह के जवाब दिए। गुरु द्रोणाचार्य ने इन सभी को निशाना लगाने से रोक दिया। अंत में जब अर्जुन की बारी आई तो वही प्रश्न दोहराया गया कि तुमको क्या दिखाई दे रहा है?

अर्जुन ने कहा कि गुरुवर मुझे उस चिड़िया की आंख जिस पर निशाना लगाना है वही दिखाई दे रही है। इसके अलावा मुझे और कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है।

अर्जुन का उत्तर सुनकर गुरु द्रोणाचार्य अत्यंत प्रसन्न हुए और अर्जुन को निशाना लगाने की आज्ञा दी। अर्जुन ने अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई और बाण से सीधे चिड़िया की आंख को भेद दिया। अर्जुन के परीक्षा में सफल होने पर गुरु द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों से कहा कि अगर तुम्हारा ध्यान अपने लक्ष्य के अलावा दूसरी जगह भटकेगा तो तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे।

हमको भी न युधिष्ठर बनना है और न ही दुर्योधन, हमें अर्जुन बनना है। हमें हमारे संसदीय क्षेत्र में बीजेपी या एनडीए के प्रत्याशी में अवगुण, जाति या अपनी व्यक्तिगत हानि नहीं देखनी है। युधिष्ठिर, दुर्योधन इत्यादि को यही सब पेड़, पत्ते, आकाश के रूप में दिखे थे और वे धनुष उठाने के योग्य भी नहीं रहे थे। हमें अर्जुन की तरह चिड़िया की आंख देखनी है, हमें अपने प्रत्याशी में सिर्फ नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रित्व देखना है। हमें ईवीएम मशीन के बटन में प्रत्याशी का नाम या कमल नहीं देखना है, हमें उनमें नरेंद्र मोदी को देखना है।

हमारा लक्ष्य अपने क्षेत्र के बीजेपी या एनडीए के प्रत्याशी को सिर्फ जिताना नहीं है बल्कि राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के विरोधियों का सर्वनाश करना है। हमें हर सीट जीतनी है, इतनी जीतनी है जिससे 2019 की जीत के बाद भारत, अपने संविधान में निहित मूलभूत अवगुणों को तिलांजलि दे सके।

हमें 2019 का महासंग्राम जीत कर, भारत के कपाल से शताब्दियों के अभिशापों को मिटा देना है।

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