अधिकतर सरकारी उपक्रमों के दिन लद गए, इनसे शीघ्र छुटकारा पा लेना ही अच्छा

सार्वजनिक सेवाओं की डिलीवरी की जिम्मेदारी सरकार की है। ऐसी सेवाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, फायर ब्रिगेड, कूड़ा-कचरा प्रबंधन, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, संचार, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण इत्यादि सम्मिलित है।

लेकिन क्या सरकार को होटल चलाने, उर्वरक उत्पादन, ट्रेवल एजेंसी, घड़ी, एयरलाइन्स, मोबाइल फ़ोन सेवा, मेडिसिन, बिजली का वितरण इत्यादि के क्षेत्र में भी घुसना चाहिए?

और अगर सरकार को इन कंज़्यूमर गुड्स या उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण और वितरण करना चाहिए, तो इन क्षेत्रों में कौन क्या जोखिम उठाता है, कौन किसके लिए ज़िम्मेदार है, किसके प्रति जवाबदेह है, इन सवालों के कोई स्पष्ट उत्तर नहीं हैं।

उदहारण के लिए, एयरलाइन्स इंडस्ट्री के लिए विश्व के व्यस्तम एयरपोर्ट्स (जैसे कि हीथ्रो, फ़्रंकफ़र्ट, JFK इत्यादि) पर प्लेन के लिए लैंडिंग का अधिकार और एक अच्छे टर्मिनल पर प्लेन लगाने की सुविधा महत्वपूर्ण होती है।

इसके लिए एयरलाइन्स वाले एयरपोर्ट के अधिकारियों को महंगे लंच और डिनर खिलाकर, गिफ्ट देकर प्रसन्न रखते है। इसे आप घूस नहीं कह सकते; यह पब्लिक रिलेशन्स है।

इसी प्रकार से वे कॉर्पोरेट अकाउंट (कि कंपनी के अधिकारी भारत के लिए केवल एयर इंडिया से सफर करेंगे) अपनी तरफ खींचते हैं। क्या एयर इंडिया के अधिकारियों को आप ऐसी सुविधा दे सकते हैं जिसमें ऐसे लंच/ डिनर/ उपहार की प्रति माह कीमत उनके वेतन से अधिक होगी?

क्या भारत में प्राइवेट सेक्टर के पूँजी निवेश के बिना हवाई यात्रा का चहुंमुखी विकास हो सकता था? क्या बिना प्रतिस्पर्धा के हवाई यात्रा इतनी सस्ती हो सकती थी?

जब संचार व्यवस्था में पब्लिक सेक्टर का एकाधिकार चला गया और प्राइवेट प्लेयर बाज़ार में आ गए, तब क्या बीएसएनएल उन प्राइवेट प्लेयर्स से मुकाबला करने के लिए रातों-रात स्कीम बदल सकता है? क्या वह 4G स्पेक्ट्रम नीलामी में खरीदने के लिए बाज़ार से कम समय में पैसा उठा सकता है?

क्या बीएसएनएल के लोग गाँव वालों को अनुचित पैसा देकर अपने विरोधियों के ट्रांसमिटर्स को नुकसान पहुंचाने के लिए बोल सकता है? क्या बीएसएनएल यह स्कीम चला सकता है कि उनकी दो वर्ष की सेवा लेने पर फलाना सेल फ़ोन फ्री दिया जाएगा?

प्रश्न यह उठेगा कि फलाना फ़ोन क्यों; ढिकाना क्यों नहीं? और, क्या बीएसएनएल एक्ज़ीक्यूटिव्स को हम उन फोन बनाने वाली कंपनी के द्वारा फ्री का खाना, पीना, सैर कराने की अनुमति देंगे?

फिर, एक्सेक्यूटिव्स ही क्यों? क्यों नहीं मंत्री, संत्री और उनके निजी सचिव और जनपथ में बैठी विदेशी महिला को भोजन, गिफ्ट और सैर कराई जाए?

मेडिसिन को ही लीजिये। एक नयी दवा की खोज में लगभग 20000 करोड़ रुपये लग जाते हैं। नयी दवा के लिए वे अपने साइंटिस्ट्स और डॉक्टर्स को 2-3 करोड़ रुपये का वेतन-भत्ता प्रति वर्ष देते हैं।

उसके बाद दवा कंपनी कुछ वर्षो में मेडिसिन को अत्यधिक मंहगा बेचकर (एक गोली या डोज़ की कीमत असानी से 50 हज़ार रुपये पार कर सकती है) अपने निवेश की लागत वसूल करने का प्रयास करती है क्योकि फिर पेटेंट समाप्त हो जाएगा और कोई भी कंपनी दवा बना सकती है।

क्या भारत का पब्लिक सेक्टर इस का एक-तिहाई निवेश और वेतन एक दवा की खोज में खर्च कर सकता है? और खोज के बाद उस दवा का अंधाधुंध दाम चार्ज कर सकता है?

आईटी सेक्टर को लीजिये। आज एक 20 वर्ष के नौजवान को – जो अभी भी पढ़ाई कर रहा है और जिसके पास कोई डिग्री नहीं है – कम्पनियां बहुत ही मोटी सैलरी दे रही हैं जो भारत के किसी भी ब्यूरोक्रेट को नहीं मिल सकती। क्या भारत सरकार का कोई भी पब्लिक सेक्टर आईटी क्षेत्र में टॉप टैलेंट को मुंह-माँगा दाम देकर हायर कर सकता है?

माना कि जिम्मेदारी और जवाबदेही में यह अस्पष्टता भारत के राष्ट्रीयकृत उद्योगों के खराब प्रदर्शन का प्रमुख कारण है, लेकिन क्या सरकारी उपक्रम प्रतिस्पर्धी निजी बाज़ार का मुकाबला कर सकते हैं?

रेलवे का उदहारण दिया जाता है। लेकिन रेलवे ने कभी प्रतिस्पर्धा का सामना ही नहीं किया। आज भारत में AC ट्रेन या क्लास में सफर करने वालों से अधिक लोग हवाई यात्रा कर रहे हैं। 7-8 घंटे की ट्रेन यात्रा को कई लोग सड़क मार्ग से कर रहे हैं।

सोवियत यूनियन में सभी उत्पादन सरकारी क्षेत्र में होता था। फिर कैसे वह अन्य देशों – भारत से भी – पिछड़ गया?

क्यों हमारे पब्लिक सेक्टर विश्वस्तरीय होटल ब्रांड, घड़ी, टेलीफोन सेवा, एयरलाइन्स, ट्रेन, कार, नयी मेडिसिन नहीं बना पाए?

क्या कोई भी सरकारी उपक्रम किसी भी योग्य व्यक्ति को बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा के जॉब ऑफर दे सकता है? प्राइवेट सेक्टर में आप ऐसा कर सकते हैं और किसी भी प्रतिभा को अपने प्रतिद्वंदी से चुरा सकते हैं।

यह समझ लीजिये कि अधिकतर सरकारी उपक्रमों के दिन लद गए हैं। इनसे जितनी शीघ्र छुटकारा पा लिया जाए, उतना ही अच्छा है। नहीं तो भारतीयों के टैक्स से इनके न बिकने वाले घटिया उत्पाद का नुकसान भरते रहेंगे।

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