ये बांके पाकी एडमिरल

क्रूसेडर जब मस्जिद में लोगों को भून रहा था तो बांग्लादेशी क्रिकेट टीम वहां नमाज पढ़ने जा रही थी। बाल-बाल बचे, अब वो वापस लौटेंगे और दौरा रद्द हुआ।

न्यू ज़ीलैंड क्रिकेट को किसी ज्योतिषी की आवश्यकता है।

कीवी जब भी कहीं का दौरा करते हैं, इन पर आफत आ जाती है।

सिलसिला 1987 में शुरू हुआ जब ये तीन टैस्ट मैचों के दौरे पर श्रीलंका गए थे। लिट्टे ने कोलंबो में हमला करके 100 लोगों को मार दिया और एक टेस्ट के बाद ही दौरा रद्द।

फिर 1992 के श्रीलंका दौरे में भी यही हुआ। तब न्यू ज़ीलैंड की टीम जिस होटल में रुकी थी, वहां हमला हुआ और चार मारे गए। उस घटना के बाद कोच और पांच खिलाड़ी स्वदेश लौट आए।

दस साल बाद 2002 में पाकिस्तान दौरे पर थे। कराची में जिस होटल में ये ठहरे थे, उसे अल कायदा ने ठोक दिया। कीवी बच गए लेकिन 11 लोग मारे गए। दौरा रद्द।

असली किस्सा यहां से।

पाकियों ने कहा, अल्ला का फज़ल है न्यू ज़ीलैंड के मेहमानों को कुछ नहीं हुआ, वर्ना क्या मुंह दिखाते।

यों बाद में पता चला कि कहानी कुछ और है। बताता हूं।

हमले में जो 11 मरे वो कोई पर्यटक नहीं थे बल्कि अगोस्ता पनडुब्बी बनाने वाली फ्रेंच कंपनी डीसीएनएस के वरिष्ठतम इंजीनियर थे। ये वो थे जिनके जाने की भरपाई मुश्किल थी। डीसीएनएस कई साल पीछे हो गई। फ्रांस की खुफिया एजेंसिया तुरंत खोजबीन में जुट गईं।

तो मामला ये पाया गया कि पनडुब्बियों के सौदे में पाकिस्तानी नेवी के एडमिरल इतना कमीशन मांग रहे थे कि डीसीएनएस के लिए उसे दे पाना बहुत घाटे का सौदा लग रहा था। लेकिन सौदा हथियाने के लिए उन्होंने हां कर दी।

उसके बाद क्या किया?

सौदे पर दस्तखत हो जाने के बाद ठेंगा दिखा दिया। पाक नेवी के जांबाज़ अफसरों के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा।

इतना बड़ा धोखा! वक्त आने पर बताएंगे।

वक्त आ गया।

पाकी दौरे पर आई न्यू ज़ीलैंड की टीम कराची के एक होटल में ठहरी थी। उसी होटल में स्कोरपीन के ये सारे इंजीनियर भी ठहरे थे।

धंधे में धोखा खाए इन जांबाज़ अफसरों ने तत्काल अल कायदा से संपर्क किया। सुपारी दी कि इस होटल को उड़ाना पर उसी विंग को जिसमें डीसीएनएस के इंजीनियर ठहरे हैं। हम कहेंगे- खुदा का शुक्र है कि न्यू ज़ीलैंड के मेहमानों को कुछ नहीं हुआ। हुआ भी ऐसा ही।

लेकिन फ्रेंच आगबबूला थे। तुरंत समझ गए कि हमला क्रिकेट पर नहीं बल्कि उनकी पनडुब्बी पर हुआ है। उनके जासूसों ने सब पता लगा लिया कि घूस नहीं मिलने की वजह से पाकी नेवी ने स्कोरपीन के फ्रेंच इंजीनियरों की हत्या के लिए अल कायदा को सुपारी दी।

फ्रांस ने खास तौर से पाकी नौसेना के दो एडमिरल की पहचान की और तत्काल बदला लिया।

एक नामी एडमिरल को कराची के व्यस्ततम चौराहे पर भीख देने से मना करने पर भिखमंगों ने उन्हें कार से घसीट लिया और दे लाठी – दे लाठी। एडमिरल हाथ-पांव गंवा बैठा।

दूसरा जांबाज़ एडमिरल लापता हो गया। खोजबीन शुरू हुई तो उसे नशे में धुत्त और एकदम नंगधड़ंग कराची में हिजड़ों के एक मुहल्ले में सीवर में औंधे मुंह लटका पाया गया। सेना पहुंची तो देखा कि हिजड़े इस नंगे पुंगे (एडमिरल) को छेड़ रहे थे।

कराची वाला किस्सा पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शहजाह ने फ्रांस के प्रसिद्ध अखबार ‘ले मोंदे’ के अंग्रेज़ी संस्करण में लिखा। मूल आलेख मिल नहीं पा रहा पर जो ढूंढ के ला दे, उसका स्वागत है।

कहते हैं कि पाकिस्तान के लिए शहीद कर दिए जाने में उनकी इस रिपोर्ट ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। मेरे पास उनका ई-मेल आईडी भी था। उनके अपहरण की खबर मिलते ही मैंने उनके सकुशल लौट आने की कामना करते हुए ई-मेल भेजा जिसका जवाब आज तक नहीं आया। कोई नाराज़गी नहीं।

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