वही करप्शन फिर चाहिए या लाभार्थियों के चेहरे पर मुस्कान

मोदी सरकार की तमाम फ्लैगशिप योजनाएं UPA सरकार की योजनाओं की नयी पैकेजिंग हैं। UPA सरकार के समय भी यही योजनाएं दूसरे नामों से हुआ करती थीं।

मोदी जी का स्वच्छता अभियान UPA के समय, निर्मल भारत अभियान था जिसमें शौचालय बनाने के लिए सब्सिडी मिलती थी। स्मार्ट सिटी या अमृत मिशन, JNURM के नाम से थी। जनधन योजना बेसिक सेविंग बैंक डिपॉजिट अकाउंट के नाम से थी। प्रधानमंत्री आवास योजना इंदिरा आवास योजना के नाम से थी।

कहते हैं मोदी जी ने करीब 20 UPA के समय की योजनाओं को नए नाम से दुबारा लांच किया है।

फिर दोनों सरकारों में अंतर क्या है?

मूलभूत दो अंतर

आधार और प्रचार

मोदी जी ने लगभग हर योजना आधार नंबर से लिंक कर के लांच की है।

और हर योजना का जबरदस्त प्रचार किया है। फिर चाहे स्वच्छता अभियान के लिए झाड़ू खुद लगाई हो। शौचालय निर्माण के लिए ढेरो विज्ञापन रिलीज किये गए हों। उज्ज्वला योजना हो या घर बनवाने में सब्सिडी देने की योजना हो। सबके खूब विज्ञापन किये गए।

अब तो प्राइवेट बिल्डर स्वयं लोगों को विज्ञापन के जरिये लोगों को सरकारी सब्सिडी से अवगत कराते हैं।

इस महीने किसानों को उनके अकाउंट में 2000 रूपये पहुंचे, जिसका लगभग हर किसी ने जिक्र सुना। लाखों लोग उज्ज्वला और उजाला से लाभान्वित हुए। गरीबों को मिले घर भी बहुतों ने देखे।

प्रचार की वजह से असल आम आदमी तक सरकारी मदद और योजना का लाभ पहुंचा।

क्या कभी UPA सरकार ने इन योजनाओं का ऐसा प्रचार किया था। आयुष्मान योजना कांग्रेस के समय भी थी। फसल बीमा योजना कांग्रेस के समय भी थी।

फिर?

कांग्रेस इन योजनाओं को आधार से जोड़े जाने का विरोध करती है। सुप्रीम कोर्ट में तमाम काबिल वकील आधार के खिलाफ पैरवी कर रहे थे।

क्यों?

मोदी जी कहते हैं कि आधार अनिवार्य करने से सरकार को 90,000 करोड़ की बचत हुई।

UPA की फ्लैगशिप योजना थी मनरेगा। तमाम ग्रामीण लोगों को वैकल्पिक रोजगार मिला। लेकिन उसमें करप्शन के भी खूब आरोप लगे। कहते हैं पूरा का पूरा मस्टर रोल जिसमें लाभार्थियों के नाम होते थे वो फर्जी होता था।

राजीव गाँधी कहते थे रूपये में से 15 पैसे असल जनता तक पहुँचते हैं।

जब UPA सरकार ये तमाम योजनाएँ चला रही थी तब उनके लिए बजट भी निर्धारित होता था।

कुछ सौ करोड़ निर्मल भारत, कुछ हजार करोड़ JUNRM, कुछ हजार करोड़ स्किल डेवलपमेंट और इसी तरह।

बजट में प्रावधान था खर्चा भी हुआ।

लाभार्थी तक पहुंचा या नहीं?

क्या प्रतिशत रहा?

आधार लिंक होने के बाद ये प्रतिशत कितना बढ़ा।

प्रचार से हर व्यक्ति ने जाना सरकारी योजना क्या है किसके लिए है।

इसीलिए आधार का इतना विरोध है, डिजिटल इंडिया का मजाक बनाया जाता है।

इस बार चुनाव पार्टियों में से नहीं, उम्मीदवारों का नहीं, चुनाव यही करना है कि वही करप्शन फिर चाहिए या लाभार्थियों के चेहरे पर मुस्कान चाहिए।

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