झूठी खबरों से नुकसान होता है तो क्यों उनपर एक्शन नहीं लेती सरकार?

उपरोक्त सवाल काफी लोग उठाते हैं, उसको एक कॉमन सेन्स का उत्तर देता हूँ, क्योंकि मैं भाजपा का कोई अधिकृत प्रवक्ता नहीं हूँ।

प्रश्न यह है कि एक्शन का अर्थ क्या समझते हैं लोग?

लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जाएँ तो कानूनों के आधार पर आरोप तय करने होंगे। उसके लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति तय करना होगा, उसपर चार्ज शीट फ़ाइल करनी होगी और उसके बाद उसके नाम कोर्ट का समन निकलेगा।

अब यहाँ एक मज़ेदार बात देखिये, सब से अधिक वायरल वे नाम होते हैं जो बहुत छोटे होते हैं। उनको आप जानते नहीं, वे आपके सामने लाये जाते हैं। ज़रा और कुरेदेंगे तो पता चलेगा कि आप के परिचित किसी ने बिना सोचे समझे या बिना पूछे परखे वह बात फॉरवर्ड कर दी थी।

कई लोगों का यह स्वभाव होता है, अपने स्क्रीन पर आते ही वह चीज़ अधिकाधिक ग्रुप्स में डाल देते हैं। फोन कर के पूछिए, जो आप ने फॉरवर्ड किया है, क्या आप ने पढ़ा भी है – तो आप को उत्तर मिलेगा कि उतना मेरे पास टाइम नहीं होता, मेरे पास जो आता है मैं तुरंत सब को फॉरवर्ड कर देता हूँ। अपन कोई चीज़ पेंडिंग नहीं रखते।

और पीछे चले जाइए तो एक सुगठित सेना मिलेगी जो ऐसी खबरें फैलाने का इरादतन काम करती है। अधिकतर लोग समुदाय विशेष के होंगे जो हर ग्रुप में स्वयं को उत्साह से जोड़ लेते हैं। इसका एक उद्देश्य यह भी होता है कि अगर उनकी विचारधारा पर कोई चर्चा करे तो हल्ला कर के उसपर माहौल खराब करने का आरोप लगायें और उसे बाकियों द्वारा ग्रुप बाहर करवा दें।

यह सेना ऐसी खबरें डालती रहती है। लेकिन फिर भी, ये सभी प्लग and प्ले module होते हैं, अपने नियत काम के आगे कुछ नहीं जानते और न ही जानना चाहते हैं। क्योंकि वे इतना जानते हैं कि जितनी जानकारी होगी उतना पकड़े जाने पर उनके संगठन का नुकसान होगा, इसलिए तय काम से अधिक न जानें, बात आगे बढ़ेगी ही नहीं, एक प्लग नाकाम हो गया, दूसरा लग जाएगा दूसरी जगह से।

वैसे देखें तो ये जो साइट्स से खबरें फैलाते हैं वे साइट्स भी डिस्पोज़ेबल होती हैं, उनको चलाने वाले लोग भी डिस्पोज़ेबल प्लग ही मिलेंगे। वे किसी और के हवाले से डालते होंगे और अंतिम जिसका हवाला मिलेगा वह व्यक्ति और उसका सर्वर विदेश में होगा। कुल मिलाकर हाथ कुछ नहीं आयेगा बल्कि कार्रवाई कर के आप बड़े मीडिया को एक वैध हथियार पकड़वा देंगे कि आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला दबाते हैं। छोटे से छोटे मीडिया वाले पर हुई कार्रवाई को इसी तरह फैलाया जाएगा।

चलिए, एक उदाहरण ही लेते हैं। आज से लगभग दो साल पहले CRPF का एक जवान पाम्पोर में वीरगति को प्राप्त हुआ था। उसके गाँव में उसके शव को उसकी जाति के कारण वीरोचित सम्मान नहीं मिला ऐसी खबर सर्वत्र फैलाई गयी थी। हेडलाइंस सभी यही कहती थीं। लेकिन कहानी बिलकुल अलग थी।

मज़े की बात यह थी कि पूरी सच्चाई उसी खबर में लिखी भी थी। जिसकी भी खबर देखें, सब की हेडलाइन भड़काऊ थी और पूरे खबर में सच्चाई दो लाइनों में बीच में कहीं गाड़ दी थी।

लेकिन चूँकि सच्चाई लिखी तो थी इसलिए सामाजिक सद्भावना बिगाड़ने का कोई गुनाह नहीं बनता था। नुकसान तो हेडलाइंस ही कर गई, लेकिन कोई गुनाह नहीं था।

क्या उखाड़ लेता कानून?

हाल में सर्फ़ एक्सेल की एड पर पूरा सोशल मीडिया बौराया हुआ था। किसी ने एक मैसेज डाल दिया कि इस पर केस भी बनता है, और दो तीन धाराओं के क्रमांक लिख दिए। बस लोग एक-दूसरे को उकसाने लगे और फिर घूम फिर के बात इसी पर आई कि यह काम भाजपा क्यों नहीं कर रही।

जिस दिन एड देखी, मैंने तीन अधिवक्ता मित्रों से मशवरा कर लिया था। एक बात तो है कि करियर एडवरटाइज़िंग में ही गुज़ारने के कारण संवेदनशील मुद्दों का पता रहता ही है, ऊपर से लीवर जैसी कंपनी और लिंटास जैसी करोड़ों की एजेंसी, ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो – इतना तो अनुभव है। कुल निचोड़ यही था कि कोई केस नहीं बन रहा।

तो उस मैसेज का प्रयोजन क्या था? मैसेज का कोई बाप नहीं था जिसे पकड़कर पूछा जाए कि बता कैसे केस बनता है। वही टिपिकल हिन्दू शेर वाला मामला था झंडों की माला वगैरह के साथ। बिना नाम का मैसेज जो केवल एक काम कर गया – एक ही भावना जगाई गयी – भाजपा – मोदी ने – सर्फ़ एक्सेल को धोया नहीं, यूनिलीवर दाग लगाकर चली गयी।

इसलिए फ़िलहाल ठण्ड रखें, ऐसी बहुत खबरें आयेंगी। जो कर सकते हैं उसका ही खयाल रखें और उतना ही ईमानदारी से करें। वोटिंग के समय लॉन्ग वीकेंड न मनाएं, बल्कि वोट करना कर्तव्य जानें। वैसे चुनाव आयोग ने अपनी ड्यूटी निभाई है जिसके डिटेल्स की अन्यत्र चर्चा करेंगे।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY