असाधारण विस्तारवादी रणनीति है क़ुरान, ज़रुरत है इसे सीखने की

इस्लाम के प्रभुत्व को स्थापित करने की रणनीति किस तरह से जीवन के हर क्षेत्र में सूक्ष्मता से उतारी जाती है और किस तरह से उस रणनीति के विमर्श तैयार किये जाते हैं इसका बेहतरीन उदाहरण आठवें और नौवें सूरे और उनके संबंध से जाना जा सकता है।

पवित्र क़ुरान को war manual यों ही नहीं कहा गया है। रणनीतिक विमर्श के रूप में क़ुरान अद्भुत है और मनोवैज्ञानिक और सैनिक युद्ध के विमर्शों को ऐसे एकात्म करता है जिसकी और मिसाल मिलना असंभव है लेकिन ऐसा करते हुये सैनिक युद्ध की प्रमुखता को बनाये रखा जाता है।

तो पहले आते हैं आठवें सूरे की ओर। आठवां सूरा जंगे बदर के बाद नाज़िल हुआ था जो होना तो थी मक्का के एक कारवां को रोकने के लिये छोटी सी झड़प, पर मक्का के लोगों के साथ एक भरपूर युद्ध में बदल गई।

यह युद्ध इस्लाम के इतिहास में एक मील का पत्थर है जो नास्तिकों के विरुद्ध पवित्र युद्ध का आदर्श माना जाता है। हालांकि नौवें सूरे सूरा तौबा को परंपरा से ही आठवें सूरे का विस्तार माना जाता है क्योंकि यह उसके कुछ देर बाद नाज़िल हुआ था।

यह एकमात्र सूरा है जो बिस्मिल्लाह ए रहमान ए रहीम से शुरू नहीं होता। ये सूरे नास्तिकों के प्रति इस्लाम के व्यवहार को परिभाषित करते हैं। इनमें सबसे कुख्यात नौवें सूरे सूरा तौबा की पांचवीं आयत आयत ए सैफ यानी तलवार की आयत है जिसमें कहा गया है कि “मुशरिकों को जहां भी देखो क़त्ल कर दो।”

कई लोग कहते हैं कि यह आयत सिर्फ उन मुशरिकों पर आयद होती है जिन्होंने मुसलमानों के साथ समझौते तोड़े क्योंकि चौथी आयत में कहा गया है कि जिन्होंने समझौते नहीं तोड़े उन्हें इज़्जत दी जानी चाहिए परंतु इसी चौथी आयत में स्पष्ट है कि समझौते की अवधि समाप्त हो जाये तो मुसलमान हमला करने के लिये स्वतंत्र हैं।

क़ुरान को ख़ातिमुल नबियीन यानी अंतिम पैगंबर मुहम्मद क़ुरैशी की जीवनी को साथ रखे बिना पढ़ा नहीं जा सकता। यह स्पष्ट है कि मुहम्मद क़ुरैशी के बाद अल्लाह के पास नबी ख़त्म हो गये थे। दिवाला निकला गया था स्वाभाविक है।

मुहम्मद पूरे अरब क्षेत्र को मुसलमान बनाना चाहते थे चाहे वह शांतिपूर्ण तरीके से किया जाए या ख़ून ख़राबे से। उन्होंने अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिये कई समझौते किये और उन समझौतों को आने वाले युद्धों की तैयारी के लिये इस्तेमाल किया, स्थायी सह अस्तित्व के लिये नहीं।

आयत ए सैफ के बाद वाली आयतें इस आयत यानी आयत ए सैफ़ के अर्थ को स्पष्ट करती हैं और इस प्रकार नास्तिकों के प्रति मुहम्मद साहब के व्यवहार को भी : वे यानी कि मुनाफ़िक यानी नास्तिक, ईमान वालों के साथ किसी संबंध या अनुबंध का सम्मान नहीं करते। उन्होंने ही हदें पार की हैं और यदि फिर भी वे पछतावा करें, नियम से प्रार्थनाएं करें, ज़कात यानी दान दें तो वे तुम्हारे भाई हैं यानी धर्म भाई हैं। (9: 10-11)

ये रोज़मर्रा की प्रार्थनाएं हैं जो नमाज़ के अंतर्गत आती हैं। ये रोज़ पांच बार पढ़ी जाती हैं और केवल अल्लाह को संबोधित होती हैं।

समझने की बात है कि ये मुशरिक अब धर्म भाई बन गये हैं, जिन्हें मुसलमान पूरी आत्मीयता से अपना लेंगे, अब वे मुशरिक नहीं रहे।

यही तात्पर्य नौवें सूरा की पांचवीं आयत में स्पष्ट होता है : मुशरिक पछतावा करें, सलात यानी प्रतिदिन की प्रार्थनाएं करें और इस्लामी व्यवहार करें तो उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिये।

तो स्पष्ट है अंतिम उद्देश्य नास्तिकों को मुसलमान बनाना है, चाहे शांति से बनाया जाए या तलवार के ज़ोर पर। यहीं से इस्लामी भाईचारा आरंभ होता है। रणनीति का उद्देश्य भी यही है।

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