न्यू ज़ीलैंड हमले के ख़िलाफ़ क्यों नहीं सुनाई दे रही एक भी आवाज़

सिर पर बाल कम होने लगें और बचे-खुचे बालों में सफ़ेदी झाँकने लगे तो अतीत सुहावना लगने और याद आने लगता है।

मैं तब तरुण ही था। अपने गृह नगर काशीपुर से दिल्ली आने-जाने में विशेष ललक इस बात की रहती थी कि गजरौला के ढाबे पर खाना खाने का अवसर मिलेगा।

तब काशीपुर में तो रेस्टोरेंट संस्कृति प्रारम्भ नहीं हुई थी और गजरौला के ढाबों की दाल मखनी, बैंगन के भरते की ख़ुशबू राह चलती गाड़ियों के ब्रेक लगवा देती थी।

ऐसी ही किसी यात्रा में गजरौला के ढाबे पर पंजाब पुलिस की रक्षा में चलते IPS के चमकते हुए पीतल के बिल्ले लगाए एक सिक्ख पुलिस अधिकारी से भेंट हुई। बातचीत में अपेक्षित शालीनता की जगह पँजाब की ठेठ गँवार शैली पा कर आश्चर्य हुआ।

पूछने पर उसने बताया कि वो समर्पण कर चुका आतंकी है और पंजाब पुलिस में सीधी भर्ती पा कर आतंकियों को नष्ट करने की रिबेरो या गिल की योजना का हिस्सा है। उसके बच्चे नैनीताल के किसी बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे। जिनसे मिलने वो जा रहा था।

पंजाब की राजनीति में अकाली दल और जनसंघ/भाजपा से बढ़त हासिल करने की ज्ञानी ज़ैल सिंह, बूटा सिंह और इंदिरा गाँधी की कांग्रेस की योजना के चलते राष्ट्र का गौरवशाली हिस्सा घोर अंधकार की सुरंग में फँसाया चुका था। समाज टक्करें मार रहा था और बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा था।

जज आतंकियों की ज़मानत की सुनवाई के दिन छुट्टी पर चले जाते थे। शाम होते ही सड़कें सुनसान पड़ जाती थीं। CRP, BSF, ITBP जैसे बलों के लोगों की उपस्थिति के बावजूद क़त्ल, आगज़नी रोज़मर्रा का काम बन चुके थे। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अटवाल को स्वर्ण मंदिर के द्वार पर मार डाला गया था।

ऐसे समय शठे शाठ्यम समाचरेत के प्राचीन चिंतन को पंजाब पुलिस ने नीति बनाया। देश से आतंकवाद की समाप्ति ऐसी ही नहीं हुई थी। आतंकवादियों, उनके परिवारों, उनके समर्थकों को घरों से खींच-खींच कर वही वारुणी पिलाई गयी जिसकी डिस्टलरी की स्थापना उन्हीं ने की थी।

आइये इसी संदर्भ में पुरानी के बाद कुछ ताज़ा बात भी हो जाये।

दो दिन पहले न्यूज़ीलैंड में 29 वर्षीय जिहादी लड़के ने प्रार्थना स्थल पर स्वचालित शस्त्रों से हमला कर 49 लोगों को मार डाला। 50 लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया।

इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त रूप से वायरल हो रहे हैं। मुझे भी बंगलौर प्रवास के समय कई स्रोतों से इस घटना के whatsapp पर कई वीडियो प्राप्त हुए।

अख़बार पढ़ने को था नहीं और टी वी देख नहीं पाया तो लगा कि सभ्य समाज पर फिर किसी इस्लामी आक्रमण के वीडियो वायरल किये जा रहे हैं। एक में लाशों और घायलों के बीच सुरक्षित औरतें और घायल आदमी चीख़ पुकार मचाते दिखाई दिखे।

मुझे उस वक़्त बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसे वीडियो में सदैव सुनाई देने वाले अल्लाहो-अकबर के नारे नदारद थे। मैं समझ नहीं पाया कि ऐसा वीडियो किसने और क्यों बनाया?

वर्षों से दाइश, तालिबान, आईसिस, जैशे-मुहम्मद आदि संगठनों के काफ़िरों के क़त्ल के वीडियो मिलते रहे हैं। जिनमें वो पीछे हाथ बंधे हुए लोगों का तलवार, कटर, आरों से क़त्ल करते, उन्हें आग में ज़िंदा भूनते दिखाई देते दिखते हैं। सब में एक बात सदैव रहती है कि काफ़िरों का क़त्ल अल्लाहो-अकबर के नारों की छाया में होता है।

बाद में पता चला कि ब्रेंटन हैरिसन टेरेंट नाम का यह लड़का ईसाई है। उसने अपनी समझ से स्टॉकहोम में एक उज़्बेक़ मुसलमान के एक मूक-बधिर लड़की सहित निर्दोष लोगों पर वैन चढ़ा कर मार देने, फ़्रांस सहित योरोप, न्यू ज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया आदि पर इस्लामियों द्वारा जनसांख्यकीय आक्रमण कर वहां के स्थानीय संतुलन को बदलने के ख़िलाफ़ यह अतिवादी कार्यवाही की है।

वापसी के समय एयरपोर्ट पर दो समूहों में इस घटना के लिए ज़िम्मेदार लड़के के पक्ष में बातें सुनीं। फ़्लाइट में भी अनेक सज्जनों को इसके वीडियो प्रशंसा सहित देखते हुए पाया।

इस्लामी नेतृत्व के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिये कि लोग मस्जिद पर होने वाली आतंकी कार्यवाही को आतंकी कार्यवाही क्यों नहीं मान रहे हैं? ऐसा क्या हो गया है कि इस घटना की रिपोर्टिंग तो जगह-जगह दिख रही है मगर इसके ख़िलाफ़ एक भी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही?

इस घटना पर तटस्थ दृष्टि डाली जाये तो लगता है कि इंटरनैट के कारण अब लोग जागरूक, चौकन्ने हो गए हैं। लोगों को मालूम है कि ऐसी आतंकी घटनाएँ सदियों से हो रही हैं।

भारत में ही इस्लामी शासन काल में इस्लामी नेतृत्व द्वारा काफ़िर हिन्दुओं के नरसंहार होते रहे हैं। नवीं पादशाही गुरु तेग़ बहादुर जी महाराज के आरे से चिरवाये, खौलते तेल में तलवाये जाते साथी, स्वयं गुरु तेग़ बहादुर जी महाराज की मुसलमान न बनने पर क्रूर हत्या, दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के मुसलमान न बनने पर दीवार में ज़िंदा चुन दिए गए छोटे-छोटे बच्चे, बंदा वीर बैरागी की नृशंस हत्या, हर इस्लामी बादशाह के अपने इतिहासकारों की किताबों में वर्णित काफ़िर हिन्दुओं के सिरों के मीनार बनाने की असंख्य घटनाओं के वर्णन अब सामने आ चुके हैं।

किन्हीं को संदेह हो तो पूज्य सीताराम गोयल जी की पुस्तक Hindu Temples What Happened To Them : The Islamic Evidences पढ़ लें। इस्लामी स्रोतों के आधार पर ही यह दोनों पुस्तकें लिखीं गयी हैं और नैट पर उपलब्ध भी हैं।

स्वयं क़ुरआन और हदीसों में काफ़िरों की हत्या के इस्लामी आदेश प्रत्यक्ष हैं। क़ुरआन और हदीसों के यह अनुवाद स्वयं मुसलमानों ने ही किये हैं। मौलाना पार्टी इन्हें कभी छिपाती तो है नहीं जो किसी ओट का आश्रय ले कर कुछ कहा-सुना जा सके।

फ़्रांस में शार्ली अब्दो पत्रिका पर हमला कर इस्लामियों ने हत्यायें कीं, लंदन में निर्दोष काफ़िरों पर वैन चढ़ा कर फिर छुरों से उन्हें मारा, नाइज़ीरिया में छात्रावास में आग लगा कर, फिर आग से बच कर भागते बच्चों को छुरों-कुल्हाड़ों से मारा जैसी असंख्य घटनाओं के ख़िलाफ़ कभी किसी मुसलमान का कोई स्वर सुनाई नहीं दिया बल्कि अमरीका में ट्विन टॉवर पर 9-11 को हवाई जहाज़ दे मरने वाले हत्यारों की प्रशंसा से भरी, उनके फ़ोटो वाली टी शर्ट सारे इस्लामी संसार में पहने मुसलमान दिखाई दिये।

आख़िर इस बात को अब कैसे छिपाया जा सकता है कि मुसलमान दिन में पांच बार काफ़िरों पर नमाज़ में लानत भेजते हैं। यह आयतें अब सारा सभ्य संसार देख-समझ रहा है।

ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो। तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये (9-123)

और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो (2-191)

काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये (8-39)

ऐ नबी! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो। उनका ठिकाना जहन्नुम है (9-73 और 66-9)

अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है (9-68)

उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है। उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें (9-29)

मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं (9-28)

जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है। उसका ठिकाना जहन्नुम है (5-72)

उर्दू व्यंग्य के सर्वकालिक महान लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब के अनुसार मुसलमानों का आख़िरी अविष्कार चारपाई है। तो इस्लाम जो न संख्या बल में, न शस्त्रास्त्र में, न योजना में, न ज्ञान में यानी किसी भी तरह सभ्य समाज पर भारी नहीं पड़ता, सारे संसार को जहन्नुम में कैसे झोंकेगा?

मगर हो ये रहा है कि ये अपनी करनी से बाज़ नहीं आ रहा। आप निष्पक्ष न्याय की जगह गुंडागर्दी को, तलवार को तुला बनाते हैं तो तलवार कोई आपके पास ही नहीं है। दूसरे भी तलवार चमकाने पर आ रहे हैं। राम राम जी राम राम…

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