मच्छर-मुक्त शहर मिल सकता है, ‘म्लेच्छर’-मुक्त गली मिलनी लगभग असंभव

स्कूल में फिज़िक्स में यह पढाया जाता है कि द्रव पदार्थ दबाये नहीं जा सकते।

इसमें यह पास्कल का नियम आता है कि किसी लिक्विड पर एक जगह से दबाव दिया तो उसका परिणाम दूसरी जगह पर दिखाई देता है।

यहाँ सब से आसान उदाहरण इस छेदों से भरे गेंद का होता है जिसमें अगर पानी भर कर उसे दबाये तो सभी जगहों से पानी की धाराएं उतने ही प्रेशर से निकलती हैं जितने जोर से दबाया गया हो।

वैसे यह नियम है तो फिज़िक्स का लेकिन इसका सब से अधिक उपयोग ‘शांतिप्रिय’ करते हैं।

आज उन्होंने यह परिस्थिति ला दी है कि मच्छर-मुक्त शहर मिल सकता है, म्लेच्छर-मुक्त गली मिलनी लगभग असंभव है।

सन्देश वहन का भी प्रयोग बेहतरी से करते हैं, कभी मकड़ी के जाल में कहीं भी मूवमेंट हो तो मकड़ी जितनी तत्परता से लपकती है, वैसे ही। यूँ भी मकडी प्रिय है, अवध्य भी है, तो जाहिर है उसके निरीक्षण से नसीहतें भी हैं।

पास्कल के नियम पर लौटते हैं तो हमें समझ में आता है कि यह जो क्षमता है ऐसे जगह हिंसा करने की जहाँ हिंसा का कोई कारण ही नहीं, उसका बड़े सफाई से उपयोग किया जाता है।

स्मरण शक्ति पर अधिक ज़ोर देने की जरुरत नहीं, 2012 में मुंबई के आज़ाद मैदान के दंगों को याद करें। कारण ही क्या था दंगे करने का? झूठी अफवाह थी कि म्यानमार में रोहिंग्याओं पर अत्याचार हुए।

हुए तो थे नहीं लेकिन अगर हुए भी होते तो यहाँ भारत के पश्चिम कोने में उसको लेकर दंगे करने का कोई सार्थक कारण कोई बता सकता है? किसी हिन्दू नेता को तो ऐसा सूझेगा भी नहीं। क्या कश्मीर के अत्याचारों को लेकर कभी महाराष्ट्र में हिन्दुओं ने दंगे किये?

वैसे इसमें सबक भी है। हिन्दुओं ने कभी ऐसे हमले नहीं किये क्योंकि उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं पर होते अत्याचारों से कभी खुद को जोड़ा ही नहीं। लेकिन आप ने देखा होगा कि गैर कश्मीरी ‘शांति धूर्त’ भी कश्मीरी की तरफ से लगभग हिंसा के स्तर पर उतरकर बहस से परहेज़ नहीं करता।

एक बात समझ लीजिये। पास्कल का नियम कोई उसका नियम नहीं बल्कि उसका निरीक्षण है निसर्ग के नियम का। निसर्ग के नियम सब के लिए होते हैं, कोई भी उनसे सीखकर लाभ प्राप्त कर सकता है।

हमें भी पास्कल का नियम सीखना चाहिए। ज्ञान सब के लिये होता है।

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