दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है और आप खेल रहे हैं माचिस से!

न्यू ज़ीलैंड की घटना दिल दहलाने वाली है। बेहद निंदनीय व निकृष्ट।

किन्तु ये एक न एक दिन तो होना ही था।

जिस तरह से इस्लामिक टेररिज़्म बढ़ता जा रहा है और उसका समर्थन मुस्लिम उम्मतें करती जा रही हैं। बाकी समाजों में भी गुस्सा पल ही रहा है। जिसकी परिणति न्यू ज़ीलैंड की घटना के रूप में सामने आई है।

ऐन यही मुद्दा ईसाइयों के साथ है। विश्व के इतिहास में जितने लोग अभी तक इस्लामिक टेररिज़्म से नहीं मरे होंगे जितने इन वहशियों ने मार दिये।

कॉलोनाइज़ेशन के दौरान भारत, अमेरिका, चीन आदि दसियों देशों में इनके अत्याचारों ने पूरी कौम की कौम सफाया कर दी। अभी भी भारतवर्ष के पूर्वोत्तर में इनका आतंक है।

कौन भूल सकता है कि स्वामी लक्ष्मणानंदजी को बेहरमी के साथ गोलियों से भून दिया गया था। क्योंकि वो वहां शुद्धिकरण कार्यक्रम चलाते थे।

हालांकि ये सब मोहरे मात्र हैं। मारने वाले लोग केवल एक हथियार हैं। ट्रिगर तो वो ज़हरीली विचारधारा है जो इन दोनों विचारों को पोषित करती है।

इस्लाम के अनुयायियों को पूरी दुनिया को दारुल इस्लाम में कन्वर्ट करने का आदेश है तो ईसाइयों को पूरी दुनिया को पाप मुक्त करने के लिए यीशु की शरण मे लाने का आदेश है।

इस आदेश को पूरा करने के लिये जो रास्ते अपनाये जा रहे हैं वो बेहद खतरनाक हैं। हत्या, बलात्कार और लूटमार आदि सब जायज़ है इस पाक(?) काम के लिये। अब आप इन राहों पर चलेंगे तो कोई न कोई तो आपको रोकेगा ही न।

केवल और केवल एक भारतीय संस्कृति की विचारधारा ही ऐसी है जो विश्वबंधुत्व की घोषणा करती है। जो कहती है कृण्वन्तोविश्वमार्यम। सारे विश्व को श्रेष्ठ बनाना है। और श्रेष्ठ तलवार के बल पर नहीं बनाना। बल्कि ज्ञान के बल पर बनाना है। इसीलिए हजारों साल के ज्ञात इतिहास में धर्म के नाम पर भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया।

अभी भी समय है। हम इस विनाश को रोक सकते हैं। आप अपने अपने मज़हबों की बेसिरपैर की बातों से निजात पाइये। आतंक की जगह ज्ञान का सहारा लीजिये। वरना याद रखिये दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है और आप माचिस से खेल रहे हैं। और किसी शायर ने कहा भी था –

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

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