उप्र में पिछले प्रदर्शन पर ही कायम रहे भाजपा तो उड़ जाएगा गठबंधन

उत्तरप्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर की जीत को आधार बनाकर बने सपा-बसपा गठबंधन के लोग आज इस जीत के आंकड़ों के आधार पर हर लोकसभा सीट के आंकड़ों में पिछले चुनावों में मिले सपा और बसपा को जोड़कर अपनी जीत सुनिश्चित मान ले रहे हैं।

वास्तव में फूलपुर और गोरखपुर में गठबंधन की जीत नहीं हुई थी बल्कि भाजपा की हार हुई थी।

बात की शुरुआत आंकड़ों के साथ करते हैं। पांच साल पहले हुये लोकसभा के चुनावों में फूलपुर और गोरखपुर में क्रमश: 50% और 51% मतदाताओं ने वोट दिये थे। जोकि उपचुनाव में फूलपुर में 13% घटकर 37%, तो गोरखपुर में 4% की गिरावट के साथ 47% रह गया।

आमतौर पर चुनाव प्रतिशत में कमी भाजपा के लिये नुकसानदायक होती है और यही हुआ भी। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री अपनी सीटें गंवाने के बाद बयान दे रहे थे कि वह गठबंधन के कारण हारे। लेकिन सच्चाई यह नहीं है। गठबंधन का इस हार से कोई मतलब ही नहीं था। आंकड़े बता रहे हैं कि भाजपा गबठंधन के कारण नहीं हारी थी।

चूंकि बात गठबंधन की हो रही है तो पिछले लोकसभा चुनावों से तुलना करते समय मैं सपा, बसपा और काँग्रेस के भी वोट एकसाथ करके जोड़कर देख रहा हूं। इस तरह से देखने पर फूलपुर में पिछले लोकसभा में कुल (2,26,216 + 1,76,277 + 45,693) 4,48,186 वोट मिले थे। जबकि वर्तमान उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या अकेले 5,38,604 वोट पाकर इन तीनों को मिलाकर हुये वोटों से भी आगे थे।

इस सीट पर हुए उपचुनाव में जब गठबंधन था तब भी सपा उम्मीदवार को 4,56,513 वोट मिले जोकि लगभग पिछले सभी के योग के बराबर ही थे। जबकि भाजपा के वोटों में सीधे एक लाख से अधिक की कमी आयी।

दूसरी ओर गोरखपुर में भी पिछली बार सबका योग (1,95,082 + 1,63,578 + 58,090) 4,16,750 वोट था। जबकि मुख्यमंत्री योगी को उस समय 5,03,011 वोट मिले थे। जबकि उपचुनाव में गठबंधन करके भी सपा को पिछले योग से भी कम 3,42,796 वोट मिले जबकि भाजपा सीधे दो लाख बीस हजार वोट कम होकर मात्र 2,83,183 पर रुक गयी।

मतलब साफ है कि अगर भाजपा अपने पुराने मतदाताओं को भी साधने में कामयाब हो गयी होती तो न सिर्फ गठबंधन से पार पा सकती थी बल्कि बुरी तरह से धूल चटाते हुये उन्हें हरा सकती थी। लेकिन भाजपा को फूलपुर में एक लाख से अधिक तो गोरखपुर में दो लाख बीस हजार वोटों का नुकसान हुआ।

एक तथ्य यह भी है कि चुनावी गणित सामान्य अंकगणित कभी नहीं होता। यहां दो और दो का योग चार कभी नहीं हो सकता। यह पांच या तीन ही होता है। ऐसे में भाजपा अगर अपने कार्यकर्ताओं को साधकर अपने पिछले रिकॉर्ड पर भी कायम रहती है तो गठबंधन को धूल चटाने के लिये काफी होगा।

ऊपर से अब तो स्थिति और भी आसान रहने वाली है क्योंकि गठबंधन की एक साथी काँग्रेस अब अलग चुनाव लड़ रही है तो शिवपाल यादव एक नयी पार्टी बना चुके हैं जो पूरे सूबे में अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे।

मतलब ये दोनों फैक्टर गठबंधन के गणित को पांच नहीं होने देंगे। फिर अगर भाजपा कार्यकर्ता थोड़े सकारात्मक तरीके से जुटे रहें तो यह गणित तीन से भी नीचे गिरकर दो या एक पर धराशायी हो सकता है।

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