इस मामले में कांग्रेस आज भी उस्ताद है…

अपने मध्यप्रदेश में भाजपा राज में नामदेव त्यागी उर्फ़ कंप्यूटर बाबा को राज्य मंत्री का दर्ज़ा दिया गया और लगा जैसे सोनिया नामक तूफ़ान ने राजनीतिक पटल को घेर लिया है। हर तरफ गरमा-गरम लपटें। हर सूं तुन्द हवाएं। हर जानिब अलफ़ाज़ के शोले।

तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह पर ऐसे-ऐसे वाक शस्त्रास्त्र का प्रयोग हुआ, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था।

वजह थी, इस तथाकथित बाबा ने कुछ समय पहले ही नर्मदा के किनारे वन आरोपण में घोटाले का आरोप लगाया था।

कहा गया कि इससे घबरा कर ही शिवराज सिंह ने बाबा का मुंह बंद करने के लिए उसे यह रिश्वत दी है। बाबा ने भी संघर्ष जारी रखने और घोटाला सामने लाने का संकल्प दोहराया।

अब भाजपा राज नहीं है। शिवराज सिंह चौहान पूर्व सीएम हैं। अर्थात बाबा को तमाम सहूलियात मुहैया हैं कि वे अपने आरोपों को अंजाम तक पहुंचाए।

लेकिन यह क्या? वे तो नए सीएम कमल नाथ की आंखों के तारे हो गए हैं। उन्हें नई नवेली कांग्रेसी सरकार ने नदी न्यास का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है।

सवाल उठता है कि बाबा के आरोपों का क्या हुआ? कोई जांच शुरू हुई? अगर शिवराज सिंह उनसे डर गए थे और इसी वजह से उन्हें नियुक्त किया था, तो कमल नाथ उनसे किस कारण डरे हैं? डरे हैं या चुनाव पूर्व सुनियोजित षड्यंत्र का इनाम दिया है?

पिछले पांच साल पर नज़र करें। मोदी ने कांग्रेस को उसी के कई हथियारों का इस्तेमाल कर अनेक मामलों में पटखनी दी, लेकिन इस एक मामले में कांग्रेस आज भी उस्ताद है कि वह बीजेपी से लड़ने के लिए कई नए अचीन्हे फ्रंट खोलती है।

जैसे, रोहित वेमुला, जेएनयू आदि यूनिवर्सिटीज़, गुजरात में तीन तिलंगे, देशभर में जींस और एडिडास के शू पहन कर आंदोलन करने वाले किसानों का विमानों में सवार होकर दिल्ली आगमन, हरियाणा में भीषण रक्तपात वाला आंदोलन आदि। साफ़ समझ लें कि इन सबके पीछे एक ही हाथ था, बल्कि कहें कि पंजा था।

राजस्थान को लें। हार्दिक पटेल गुजरात से तड़ीपार किया गया, तो उसे शरण मिली यहां के एक कांग्रेसी एमएलए के घर। यह भी पूरे दो महीने।

अचानक ऐसे अनूठे किसान पैदा हो गए, जो अपने-आप को गर्दन तक ज़मीन में गाड़ कर आंदोलन करने की एकदम नई चकाचक तकनीक खोज कर लाए थे।

एक मोहतरमा अपने श्वसुर का नाम उचारते हुए समूचे राज्य में ‘पूर्ण शराबबंदी’ का बिगुल फूंकते घूम रही थीं।

जाट, राजपूत आदि कई जातियां आंदोलन की धमकियां देने लगीं और ब्राह्मण ‘नोटा-नोटा’ चिल्लाने लगे।

याद करेंगे, तो और भी बहुत कुछ याद आएगा। और लगभग सारे देश की कमोबेश यही स्थिति थी।

आज देखें, सभी सिरे से ग़ायब हैं। क्या कांग्रेस सरकार आते ही, सभी समस्याएं सुलझ गईं? नहीं, सभी जस की तस हैं। अर्थात ये सभी कांग्रेस के एजेंट और उसकी उपज थे। और कांग्रेस सरकार का लक्ष्य हासिल होते ही अपने खोल में जा छुपे।

ताज़ा उदाहरण यूपी के रावण भैया से दादी जैसी नाक वाली दीदी के मधुर मिलन का है।

सार यह कि बीजेपी जिस दिन कांग्रेस के इन हथियारों का इस्तेमाल भी सीख लेगी देश कांग्रेस मुक्त हो जाएगा।

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