नैरेटिव से लड़िए, तथ्‍यों के साथ बात करिए

ब्रिटिश सरकार में सिविल सर्वेंट रहे डेनिस किनकेड ने शिवाजी पर एक पुस्‍तक लिखी ‘Shivaji : The Grand Rebel’। इस पुस्‍तक में शिवाजी और मराठों, या कहें भारतीयों की स्‍वतंत्रता की उत्‍कंठा के बारे में लिखा है। अभी इसे पढ़ रही हूं।

इस पुस्‍तक के प्राक्‍कथन में ही लिखा है कि हिंदुस्‍तान के इतिहास में मुगलों का वर्णन हुआ पर उन सरदारों को उपेक्षित किया गया जिन्‍होंने मुगलों से लगातार युद्ध किया।

डेनिस भारत में 1891 से 1926 तक रहे और उन्‍हें मराठी इतनी अच्‍छी तरह आती थी कि वह अपने फैसले भी उसी भाषा में दिया करते थे। इससे वह मराठों को और अच्‍छी तरह से समझ पाए और जान पाए।

यह पुस्‍तक मराठों, या कहें भारतीयों के उस गौरव के बारे में हैं जिसने भारतीयों में राष्‍ट्रबोध को विकसित किया। इसी में वह आगे कहते हैं कि यह पुस्‍तक उस नायक के बारे में है जिसके समाज ने आगे जाकर अंग्रेज़ों से लोहा लेने वाले नाना साहिब व रानी लक्ष्‍मीबाई को जन्‍म दिया। डेनिस ने भी झांसी की रानी को बेस्‍ट एंड ब्रेवेस्‍ट कहा है।

इसी प्रकार एक और अंग्रेज़ अधिकारी थे एडविन आर्नोल्‍ड, जब उन्होंने भारत को जाना तो गौतम बुद्ध को जानकर वह दंग रह गए और वह भारत की समृद्ध विरासत को अनुभव कर हैरान रह गए थे।

उन्होंने भगवत गीता का अनुवाद अंग्रेजी में किया मगर उनका जो सबसे उल्‍लेखनीय कार्य था वह था गौतम बुद्ध पर एक मौलिक ग्रंथ को लिखना अर्थात ‘लाइट ऑफ एशिया’।

1832 में ससेक्स, इंग्लैण्ड में जन्में एडविन आर्नोल्‍ड। जो चौबीस वर्ष में पुणे में डक्कन कॉलेज में प्रधानाध्यापक के पद पर भारत आए। और भारतीय आत्‍मज्ञान की परंपरा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। एडविन आर्नोल्‍ड यह देखकर चकित थे कि आखिर बौद्ध धर्म मे ऐसा क्‍या विशेष रहा कि वह बिना खून का एक कतरा बहाए पूरे एशिया का मुख्‍य धर्म बन गया।

पहली पुस्‍तक ऐतिहासिक है तो दूसरी ऐतिहासिक व धार्मिक दोनों ही है। दोनों में ऐतिहासिक घटनाओं का पुनर्पाठ है। हालांकि भारत में भारतीय भाषाओं में ही पुनर्पाठ की परंपरा रही है, यही कारण था कि रामायण से लेकर बुद्ध तक के बार बार पुनर्पाठ हुए।

लेखक ने अपने तरीके से विश्‍लेषण किया, प्राचीन ग्रंथों को पढा, उन्‍हें ग्रहण किया और फिर उसका पुनर्पाठ किया पुनर्लेखन किया और यही कारण है कि भारत में विमर्श की एक लंबी परंपरा चली और आज तक चली आ रही है।

राम को कबीर ने एकदम ही भिन्‍न रूप में प्रस्‍तुत कर दिया परंतु भारतीय मानस ने कबीर के निर्गुण राम को भी उतना ही प्रेम दिया जितना कि तुलसी के राम को। क्‍योंकि भारत में अनुवाद की एक लंबी परंपरा रही थी, अनुवाद जो कि संस्‍कृत साहित्‍य के अनुसार ‘प्राप्तस्य पुन: कथनम’ या ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादनम्’ होता था, और ट्रांस्‍लेशन से एकदम भिन्‍न होता था।

पश्‍चिम में बाइबिल के अन्‍य भाषाओं में भाषांतरण के साथ ट्रांस्‍लेशन की शुरूआत हुई, परंतु इसमें यह ध्‍यान रखा गया कि बाइबिल के अनुवाद में भाषांतरकार अपना कुछ भी न जोड़ पाए, जो मूल में है वही भाषांतरण में रहे।

जिसने भी जरा सा भी बदलाव करने का प्रयास किया उसे जिंदा जला दिया गया। यहां तक कि प्‍लेटो का भी फ्री तरीके से अनुवाद करने पर फ्रांस के अनुवादक एटिन डोलेट (1509-46) को जिन्दा जला दिया गया था। उन पर ईशनिंदा का आरोप लगा था। William Tyndale सहित कई भाषांतरकारों को बाइबिल का अनुवाद करने पर जिंदा जला दिया गया था।

और नैरेटिव देखिए क्‍या सेट किया गया कि भारत में अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता नहीं थी। भारत में अपनी बात कहने की स्‍वतंत्रता नहीं थी। भारत जितनी अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता नहीं हो सकती थी जहां पर हर भाषा में उसकी अपनी एक रामायण थी जो एक कथा होते हुए भी एक पृथक रचना थी। भारत में कम से कम अपना एक राम गढ़ने के लिए मारा नहीं गया बल्‍कि जिसने राम को गढ़ा उसे पूजा गया।

अभिव्‍यिक्‍ति की सहिष्‍णुता का एक उदाहरण है क्रिस्‍टीना रोजेटी की एक कविता ‘इन द राउंड टावर ऑफ झांसी’, जिसमें एक अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी और उसकी पत्‍नी क्रांतिकारियों से घिर गए हैं, ऐसा वर्णन किया है, जबकि ऐसे किसी अधिकारी का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता है और क्रिस्‍टीना रोजेटी शायद भारत आई भी नहीं थी।

तो ऐसे में खबरों के आधार पर यह कविता लिखी गई और यह भी हमारी ही सहिष्‍णुता है कि हमने इस प्रकार की झूठी कविता को भी संवेदनशील कविता माना।

और हमें हर प्रकार की दासता में कसने वाले लोग आज भी नैरेटिव फैला रहे हैं, एक तरफ हम हैं जो आज भी खंडन के ही मोड में खड़े हैं। नैरेटिव से लड़िए। तथ्‍यों के साथ बात करिए।

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