मीडिया का मूर्खोत्सव, धूर्तों का निर्लज्ज नाच

पिछले दिनों एक पाकिस्तानी वीडियो क्लिप भारत की सोशल मीडिया में भी बहुत लोकप्रिय हुई थी।

उस वीडियो क्लिप में मौलाना फजलुर्रहमान नाम का सांसद पाकिस्तानी संसद में बेखौफ होकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को गुंडा, ऐय्याश, दहशतगर्द कहते हुए जमकर कोस रहा था।

आसिफ अली जरदारी की पीपुल्स पार्टी की सरकार में 2008-13 के दौरान यह मौलाना केंद्रीय मंत्री भी रह चुका है।

तालिबानी आतंकियों के प्रबल समर्थक सहयोगी पैरोकार के रूप में कुख्यात इस मौलाना फजलुर्रहमान पर 1997 में ही अमेरिका प्रतिबन्ध लगा चुका है। लेकिन उपरोक्त घटनाक्रम बता रहे हैं कि पाकिस्तान में पिछले 22 वर्षों से वो अमेरिकी प्रतिबन्ध किस तरह एड़ियां रगड़ रहा है।

इसी तरह दूसरा उदाहरण हाफिज़ सईद का है। उस पर वर्षों पहले अमेरिका 5 करोड़ डॉलर का ईनाम घोषित कर चुका है। 10 दिसम्बर 2008 को UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) का वह प्रतिबन्ध भी उस पर लग चुका है जिस प्रतिबन्ध को मसूद अज़हर पर लगाने में चीन ने कल चौथी बार अड़ंगा लगाया है।

इस प्रतिबन्ध का क्या असर पड़ा है हाफिज सईद पर? अतः मसूद अज़हर पर यह प्रतिबन्ध यदि लग भी जाता तो क्या फर्क पड़ता?

आज उपरोक्त उदाहरण इसलिए क्योंकि कल से वह मीडियाई हुड़दंग देख सुन रहा हूं जिसे देखकर ऐसा लग रहा है मानो मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध नहीं लग पाने के कारण आसमान टूट गया हो।

जबकि सच यह है कि उस पर यदि यह प्रतिबन्ध लग भी गया होता तो उसका कोई अर्थ नहीं होता। यही समझाने के लिए लेख की शुरुआत में 3 आतंकियों के उदाहरण दिए हैं।

लेकिन भारतीय न्यूज़ चैनलों पर पिछले 2 दिनों से ऐसा हुड़दंग हो रहा है मानो कल भारत को कोई बहुत बड़ा झटका लग गया हो। जबकि कल का घटनाक्रम भारतीय कूटनीतिक लैंडमाइन का सफलतापूर्वक किया गया एक और वो विस्तार है जिसमें चीन लगातार फंसता जा रहा है।

कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और NSA अजित डोवल को यह गलतफहमी रही होगी कि मसूद पर प्रतिबन्ध का चीन समर्थन करेगा।

अगर इस तिकड़ी को ऐसी कोई गलतफहमी होती तो UNSC की मीटिंग से 20 दिन पहले ही भरतीय वायुसेना पाकिस्तान में घुसकर मसूद के अड्डे पर बम नहीं बरसाती। इसके बजाय भारत UNSC की इस मीटिंग की प्रतीक्षा करता।

दरअसल UNSC से मसूद पर प्रतिबन्ध की मांग 2016 से भारत लगातार इसलिये कर रहा है ताकि चीन के आतंकी चेहरे को लगातार बेनकाब किया जाता रहे। ‘कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना’ की यह भारतीय कूटनीति अभी तक सफल रही है। आतंकवाद के मुद्दे पर चीन लगातार अकेला पड़ता जा रहा है।

मोदी सरकार की आक्रामक कूटनीति के कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन की छवि आतंकवाद समर्थक की बनती जा रही है। ऐसी रणनीतियों का प्रभाव दूरगामी होता है और निर्णायक अवसरों पर बहुत घातक सिद्ध होता है।

ध्यान रखिये कि मसूद अज़हर के खिलाफ UNSC के प्रतिबन्ध की मांग कल भारत ने नहीं की थी। यह प्रस्ताव फ्रांस और ब्रिटेन का था। कल के घटनाक्रम में चीन ने भारत के बजाय फ्रांस और ब्रिटेन का विरोध मोल लिया है। ऐसे घटनाक्रमों के निहितार्थों की सूची बहुत लम्बी है। जिनका ज़िक्र फिर कभी करूंगा। फिलहाल उपरोक्त संकेतों के उल्लेख को ही पर्याप्त समझता हूं।

इसलिए मसूद मुद्दे पर कल से शुरू हुए मीडियाई मूर्खोत्सव और उसमें प्रचण्ड निर्लज्जता के साथ खुशी से झूम कर नाच रही कांग्रेस के सियासी नंगनाच से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं।

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