मुझे कुछ कहना है

नरेंद्र मोदी द्वारा 16 मई 2014 में चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनने के 6 माह के ही अंदर, उनके एक से एक बड़े समर्थक, उनसे दुखी, हताश व आक्रोशित हो गए थे।

ये सब उथले लोग थे, जो अपनी प्राथमिकता के अनुसार मोदी जी का समर्थन कर रहे थे। ये वे सब लोग थे जिनको इसका दम्भ था कि मोदी को मोदी जी बनाने वाले वे लोग है। ये वे लोग थे, जिनको अपने घर परिवार की समस्याओं को निपटना नहीं आता लेकिन भारत की समस्याओं से निपटना बखूबी आता था।

आज 2019 आ गया है और 23 मई 2019 को एक नए मोदी के भारत के प्रधानमंत्री के रूप में आने की यात्रा शुरू हो चुकी है।

इसी मुहर्त पर, मैं अपने एक पुराने लेख को आधार बना, फिर से अपनी बात सामने रख रहा हूँ ताकि लोगों की अपने खुद के स्वार्थ व प्राथमिकता की शून्यता से उपजी जो झल्लाहट है, उसका नकारात्मक प्रभाव भारत के भविष्य पर नहीं पड़े।

मुझे कहना है

लेकिन मुझे उनसे नहीं कहना है जो मुझसे 16 मई 2014 से पहले ही, दूर नदी के उस पार खड़े थे। मुझे आज भी याद है कि वे उस पार से ही बार बार चिल्ला रहे थे कि नदी बड़ी उग्र व अशांत है और इस नदी पर, नाव का नया नाविक, नाव के लायक बिल्कुल नहीं है।

मुझे तो उन लोगों से कहना है जो नदी के इस पार, मेरे साथ ही खड़े थे। वे मेरी तरह ही नाव के नए नाविक पर विश्वास कर रहे थे।

जब यह नया नाविक, चप्पू चलाते हुए कहता था कि उसके इरादे बड़े मज़बूत है और उसके हाथों में पुरुषार्थ का दम है तब हम सभी लोग, ‘हईया हईया’ का कोलाहल करते हुए उसके उत्साह को और बढ़ाते व उसको और आत्मविश्वास देते थे।

जब वो कहता था उसका सीना 56 इंच का है और लाख तूफान आने के बाद भी, उसके हाथ से नाव की चप्पू नहीं छूटेगी तब हम सभी लोग, अपना अपना सीना भी 56 इंच का नाप लेते थे।

जब वह नाविक, नाव मुख्य धारा में लेकर पहुंचा था, तब मौसम में परिवर्तन हुआ और गड़गड़ाहट के साथ आकाश में काली घटा छाने लगी थी। तूफ़ान के उठने का अंदेशा होने लगा था। तेज़ हवाओं से नदी में बड़ी बड़ी लहरें उठी और उन लहरों के थपेड़ों से नाव भी हिलती नज़र आने लगी थी। नाव के अंदर पानी भी भरने लगा था, लेकिन वह नाविक, लहरों को चीरते हुए, तेज़ बहाव को काटते हुए, नाव को खेते हुआ आगे ही बढ़ाता रहा था।

लहरों के हर थपेड़े पर, जब वह नाव हिलती थी, तो उस पार पर खड़े लोग ताली पीट पीट के और कहकहे लगाते हुये चिल्लाते, “देखा! हम नहीं कहते थे कि ये नाविक नाव को डुबो देगा!”

इस पार, मैंने भी देखा कि मेरे साथ खड़े हुए कुछ लोगों के चेहरे उतरने लगे थे, चेहरा सफेद पड़ने लगा था। तेज धार की लहरें जब नाव को उछालती थी, तब उनका कलेजा, उनके मुँह को आने लगता था।

मुझे बड़ी कोफ़्त होती थी उन पर, जो मेरे साथ ही खड़े थे। जिन लोगों को ठीक से तैरना भी नहीं आता था, वे मेरे अगल बगल खड़े हुये, नाविक को नाव चलाने और सम्भालने का ज्ञान देने में लगे थे।

कुछ की चिंता व अविश्वास उस शीर्ष पर पहुंच गया कि वे उस पार से आ रहे अट्टाहास से इतने विचलित हो गए कि वे भी उस पार के लोगों के साथ अपना स्वर मिलाने लगे थे।

अहंकार से उपजे, आक्रोश और व्यंग से मिश्रित आवाज़ें मेरे बगल से भी आने लगी थी, “कहाँ गया 56 इंच? नाव डगमगा क्यों रही है? नाव में पानी कैसे भरने लगा है? भगाओ उसे! यह खुद तो डूबेगा, नाव भी डुबो देगा! हम लोगों ने इस पर जो दांव खेला था वो तो डूबा ही समझो।”

मै इन स्वार्थी, अविश्वासी व चारित्रिक रूप से हीन साथियों की नहीं सुन रहा था।

मै तो एक टक, उस नाविक को उस नाव पर देख रहा था।

उसके चेहरा सपाट था।

वो न उस पार की सुन रहा था और न इस पार की सुन रहा था।

वो जानता था कि शांत नदी में तो उसके साथ देने वाले और हौसला बढ़ाने वाले इस पार, मेरे जैसे लोग काफी हैं लेकिन आंधी तूफान और अँधेरे में, उसे खुद ही उस नाव को खे कर पार लगानी है।

उसे मालूम है कि कब और कैसे नाव मोड़नी है, कब और कैसे नाव से पानी को निकालना है और उसे यह भी मालूम है कि नाव कहाँ उतारनी है।

वह मेरे जैसे इस पार खड़े लोगों के लिए नाव नहीं चला रहा है और न ही उनके भरोसे चला रहा है। उसे अपने पर भरोसा है कि वह नाव निकाल लायेगा क्योंकि उसको नाव के प्रति आसक्ति तक प्रेम और श्रद्धा है। उसको इस बात का कोई भी दर्द नहीं है कि उसकी नाव के प्रति जो प्रतिबद्धता है, उसका आंकलन और विश्वास करने से उसके ही समर्थक ही कहीं चूक गए हैं।

उस नाविक को जब नदी में उठे तूफान से, नाव को खेते निकालते हुये देख रहा हूँ तो संशय की माला में जकड़े उन लोगों से कहना चाहता हूँ कि जिस नाव एवं नदी का ज्ञान और आने वाली दुर्गमता का जब वे खुद ही आंकलन नहीं कर सकते हैं तब श्रेष्ठ यही है कि सब उसी नाविक पर ही छोड़ दिया जाय, जिस पर उन्होंने विश्वास कर के 16 मई 2014 को विजयी बनाया था।

आज जब 23 मई 2019 की बारी है तब यही पुरानी बात कहूँगा कि यदि आप नाविक पर भरोसा नहीं रखेंगे, तो जो उस पार खड़ी भीड़ है, उसी में ही आपका प्रतिबिम्ब दिखेगा। आज तो उस पार, पाकिस्तान, इमरान खान, अज़हर मसूद ‘जी’ इत्यादि सभी खड़े हैं।

मेरा मित्रों से कहना है कि अभी तो अगले 2 महीने नाव और उछलेगी। अभी तो नाव, नदी में छिपी, खतरनाक चट्टानों से भी टकरायेगी। अभी नाविक, नाव में और पानी आने देगा। लेकिन वह नाव पलटने नहीं देगा। वह चप्पू नहीं छोड़ेगा।

जैसे वह चप्पू व नाव का साथ नहीं छोड़ेगा, वैसे ही आपको भी 16 मई 2014 के विश्वास पर, अपना विश्वास बनाये रखना है। यही विश्वास और दृढ़ता 23 मई 2019 को दिखाना है क्योंकि उसको आपके विश्वास पर विश्वास है और वो उस विश्वास को खोने नहीं देगा।

आप बस आप बने रहें… नरेंद्र मोदी वही बने रहेंगे। वो सिर्फ हमको ही नहीं बल्कि हमारी आगामी पीढ़ी को भी नदी पार करा देंगे।

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