आखिर है क्या इस विज्ञापन में आपत्तिजनक!

एक मित्र ने मुझसे सवाल पूछा है कि सर्फ़ एक्सेल के होली वाले विज्ञापन में आपको आपत्तिजनक क्या लगा, ज़रा तफ़्तील से बताएँ? उन्होंने इस विज्ञापन को दिल जीतने वाला विज्ञापन निरूपित किया है।

हर व्यक्ति को किसी भी संदर्भ में अपनी निजी राय रखने का अधिकार है और कम-से-कम मैं हरेक की निजी राय का बेहद सम्मान करता हूँ। पर मुझे इसमें जो आपत्तियाँ दिखीं, वे हैं :

  • इसमें रंग खेलने जैसी धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता को ‘दाग़’ के रूप में दर्शाया गया है और नमाज़ पढ़ने को पवित्र व नेक कार्य के रूप में। जबकि दोनों ही अपने-अपने ढंग से इबादत ही है।

किसी को स्नेह और अपनेपन के रंग में सराबोर करना ईश्वर की इबादत से कम नहीं। उसे ‘दाग’ बताना सदियों से चली आ रही परंपरा का अपमान है |

  • इसमें रंग खेलने वाले बच्चों को असंस्कारी, आक्रामक, उद्दंड, फूहड़ व परपीड़क दर्शाया गया है, जबकि नमाज़ पढ़ने वाले बच्चे को पीड़ित, लाचार, बेबस एवं डरा हुआ।

इसमें एक-दूसरे की परंपराओं के प्रति सम्मान और स्वीकार का भाव न उभरकर निषेध और वितृष्णा का भाव अधिक मुखरित हो रहा है। इसमें एक को श्रेष्ठ और दूसरे को निकृष्ट साबित करने की कुटिलता दिख रही है।

  • यह विज्ञापन बाल-मनोविज्ञान के विरुद्ध है। बाल-सुलभ व्यवहार तो यही होता कि एक बच्चा रंगों के खेल में अपनी सुध-बुध खोकर थोड़ी देर के लिए नमाज़ जैसे बड़ों द्वारा निर्देशित धार्मिक रिवाजों को भुला उन रंग खेलने वाली मंडली का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता।

आप सोचिए कि किसी रंग खेलने वाले बच्चे को कोई अभिभावक खींचकर किसी मंदिर ले जाने पर उतारू हो जाए तो आपकी क्या टिप्पणी होगी? या कोई बच्चा स्वयं ही कहे कि मुझ पर रंग मत डालो मुझे मंदिर जाना है या पूजा करनी है? क्या आप इसे स्वाभाविक, स्वप्रेरित, बाल-सुलभ आचरण ही मानेंगे?

  • एक भोली, मासूम, सुंदर और प्यारी-सी लड़की का सारा आक्रमण अपने ऊपर झेल उस नमाज़ पढ़ने जाने वाले बच्चे की मदद के लिए आगे आना यह दर्शाने की कोशिश है कि बहुसंख्यक समाज का अधिकांश तबका संवेदनहीन हो चुका है और ले-देकर थोड़ी-बहुत संवेदना कुछ कोमल, नरम दिल बच्चियों जैसों के कोनों में ही बची है, जिसे जमींदोज़ करने के लिए हम सब कमर कसे बैठे हैं!
  • ये न भूलें कि यह विज्ञापन एक विदेशी कंपनी ‘यूनीलीवर’ का है और तमाम विदेशी कंपनियाँ भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने के कुचक्र रचती रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इस विज्ञापन के द्वारा भी वह यह संदेश देने की कोशिश कर रही हो कि बहुसंख्यक आक्रामकता अब अल्पसंख्यक बच्चों तक को बख़्शने के लिए तैयार नहीं।
  • कम-से-कम पर्व-त्योहारों में तो हम जबरन हिंदू-मुस्लिम एंगल घुसेड़ने की कोशिश न करें। कोई कोना तो सुरक्षित रहे। कुछ तो कहीं बचा रहे। आप क्या चाहेंगें कि अब लोग पर्व-त्योहार भी मनाना छोड़ दें? या मनाएँ तो इस डर के साथ कि हमारा पड़ोसी क्या सोचेगा, उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी?
  • सोचिए तब क्या होती आपकी प्रतिक्रिया जब कोई हिंदू बच्चा अपने पारंपरिक उत्सव या फैमिली फंक्शन में अपने पड़ोसी, अपने मुस्लिम पड़ोसी को गैर-मज़हब का होने के कारण आमंत्रित ही नहीं करता?

आप उस पर रंग फेंकने को पड़ोसियों को उत्सव में शामिल करने के प्रयास के रूप में क्यों नहीं देखते? क्यों आपने उस छोटे-से बच्चे के मन में हिंदू-मुस्लिम का भाव भरा, बल्कि उसे आप सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव के अनूठे रंग या सौहार्द के प्रयास भी तो बता सकते थे?

आपने जान-बूझकर उसमें छद्म सेकुलर नैरेटिव डाला। क्यों, क्योंकि सेकुलरिज़्म बिकता है, क्योंकि सेकुलरिज़्म फ़ैशन है, क्योंकि सेकुलरिज़्म बौद्धिक होने का प्रमाण है। है न?

  • सोचिए तब क्या होती हमारी-आपकी प्रतिक्रिया, यदि विज्ञापन यों होता कि बक़रीद के मौके पर एक बच्चे को यहाँ-वहाँ बिखरे ख़ून के छींटों से बचते-बचाते दूसरा बच्चा मंदिर की ड्योढ़ी तक ले जाता और पृष्ठभूमि में चलता कि कुछ अच्छे काम में ‘दाग़’ लग जाएँ तो ‘दाग’ अच्छे हैं?
  • मैं फिर कहता हूँ, उस नमाज़ अदा करने वाले बच्चे के लिए बाल-सुलभ व्यवहार तो यही होता कि वह कुछ पल के लिए नमाज़ को भुला होली के रंग में डूब जाए और स्वाभाविक बचपन को भरपूर जी ले, उसी को सज़दा, उसी को इबादत समझे।

बल्कि एक छोटे-से बच्चे का रंगों के आकर्षण से मुक्त हो नमाज़ अदा करने के लिए जाने और एक छोटी-सी बच्ची का होली खेलना छोड़ उसे मस्जिद छोड़ने जाने में कुछ भी अस्वाभाविक न लगना हमारी-आपकी मानसिक कंडीशनिंग का जीवंत उदाहरण है।

दोष किसे दें, सच यह है कि हमारा मानसिक अनुकूलन एक निश्चित दिशा में सोचने के लिए कर दिया गया है।

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