भारत का स्वर्णिम अतीत और धूसर वर्तमान का सच – 2

कुछ दिन बीते होंगे कि मेरे एक प्रिय मित्र का एक शेयर्ड फ़ेसबुक पोस्ट आया “विश्व में कहीं शायद अमेरिका ने दूसरी या तीसरी बार HIV एड्स के मरीज को इन विषाणुओं से मुक्त करने में सफलता पाई है ।”

यह खबर अतिशय सुखदाई थी पर अगली लाइन बवाल थी जिसमें क्षमाप्रार्थना के साथ मुझे उद्धृत करके पूछा गया था कि वेदों में या प्राचीन भारतीय ज्ञान मंजूषा में इस से सन्दर्भित कोई जिक्र है जिसका पेटेण्ट कराया जा सके वर्ना 400-500 साल के बाद कहीं हमें ये पछतावा न रहे कि हमारे अतीत में ये सब ज्ञान था पर बस हम थोड़ा चूक गये।

बात चुटीली थी और हम चुटैल हुए भी। पर इस कटाक्ष से हम व्यथित हुए पर आहत नहीं कारण क्योंकि व्यंग्य सटीक था और हम इस मामले में बिलकुल निःशस्त्र। व्यथा निःशस्त्र होने की ज्यादा थी व्यंग्य-बाण की टीस उतनी नहीं थी।

मन व्यथित हुआ कि हमने इस आयुर्वेद का ककहरा भी क्यों न पढ़ा? और इसके लिये दूर जाने की जरूरत भी न थी अपनी दादी नानी के कदमों में ही ये प्राथमिक ज्ञान मिल जाता पर आधुनिकता की धुँध मे पहले हमारे संयुक्त परिवार प्रथा को एकल परिवार में बदल दिया और हमारी विरासत हमारे लिये दुरूह जनरल नॉलेज बन गई।

गज़ब बात है कि हर्बल प्रॉडक्ट या आयुर्वेदा या योगा को बड़ी जल्दी से हम स्वीकार कर रहे हैं वगैर खुद को दकियानूसी घोषित किये पर जहाँ सनातन संस्कृति के सम्यक पालन की बात उठी, भारत में फैली कुरीतियाँ मुँह चिढ़ाने लगती हैं।

कुरीतियाँ भी कैसी …. घूँघट प्रथा या परदा प्रथा ( बुरका तो वैज्ञानिकता से पूर्ण है ), पशुओं के मुँह वाले ईश्वर की पूजा (वैसे चश्मा वाले सेण्टा बाबा, और अक्षत यौवना मरियम का पुत्रवती होने की पूर्ण वैज्ञानिकता के प्रमाण इन फ़र्स्ट जनरेशन स्यूडो इंडियन के पास हैं ), मनु के प्रमाण पर हमारे बुद्धिजीवी मित्र उपहास करते हैं और मनुस्मृति की वज़ह से सारे ब्राहमण और हिन्दुत्व वादी मनुवादी कहलाने को अभिशप्त हैं पर 1500 साल पहले जिस धर्म का भ्रूण भी माता के गर्भ में असंभव था उसका शरिया कानून और उसमें वर्णित महिलाओं के प्रगति का परचम 3- तलाक और उसी तलाक की समाप्ति के लिये हलाला जैसी दिव्य प्रथा पर इन बुद्धिजीवियों की आस्था काबिल-ए-तारीफ़ है।

तो इस नई शिक्षण व्यवस्था से हमारे नव शिक्षित भारतीयों को यूँ तो किरानी बनने से ज्यादा तालीम नहीं दी पर अपनी विरासत से नफ़रत करने में स्वर्ण पदक पाने योग्य जरूर बना दिया ।

जहाँ एक उच्च शिक्षा प्राप्त इस्लाम, ईसाई, यहूदी, सिख या सनातन के वृक्ष की छोटी डालियाँ बौद्ध, जैन, आर्य समाज के अनुयायी अपने सम्प्रदायों की मान्यताओं के प्रति कुछ अधिक आस्थावान और नास्तिक हो जाता है वहीं हमारा सनातनी भाई मंदिर में जाकर “खुश तो बहुत होगे तुम कि जिसने आजतक तेरे मन्दिरों की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ी …. वगैरा वगैरा ” डायलॉग झाड़ता है और हम WOW कहकर सिनेमा हाल में तालियाँ बजाते हैं पर आज तक किसी अन्य मतावलम्बी ने अपने धर्म की सर्वोच्च सत्ता पर थोड़ी भी व्यंग्यात्मक टिप्पणी की हो ये हम नहीं ढूँढ पाये।

हर आशावादी वक्तव्य के बाद इंशा अल्लाह,”ओ माय गॉश”, बुद्धं शरणं गच्छामि, जय जिनेन्द्र, णमो अरिहंताणं, सत् श्री अकाल, वाहे गुरु दा खालसा वाहे गुरु दी फ़तह और ऐसे कई वाक्य आपको सुनने को मिल जायेंगे और ये सारे वक्तव्य दकियानूसी होने का प्रमाण नहीं बल्कि प्रगतिशीलता का उदाहरण बनते हैं पर इस बीच अगर अगर जय श्री राम का उद्घोष हो जाये तो साम्प्रदायिकता का ज़हर समाज में घुलने लगता है।

दरअसल पश्चिमी भाषा में कही गई गाली भी हमें अपनी परम्परा में दिये गये आदर सूचक शब्दों से भव्य प्रतीत होते हैं।

खैर हम आते हैं अपनी पुरातन संस्कृति की चिकित्सा व्यवस्था पर जिस पर व्यंग्य मेरे भाई किया है।

सामान्यतया भारतीय अपने अतीत पर गर्व करते हैं इसमें बुद्धिजीवी तबका शामिल नहीं है क्योंकि इनकी पढ़ाई के अनुसार अगर अंग्रेज़ नहीं आते तो भारत में आज भी सिर्फ़ साधु और साँपों का बोलबाला होता और अगर इयान फ़्लेमिंग की पेन्सिलीन का आविष्कार नहीं होता तो आज भारतीयों का शरीर ज़ख्मों से भरा होता।

अगर आयुर्वेद में कोई एड्स, कैन्सर, थैलिसीमिया, तपेदिक आदि की कोई दवा मिल भी जाये तो भारत की आर्ष परम्परा उसे पेटेण्ट करने की किसी भी अमानवीय कोशिश के खिलाफ़ होगी, कारण जीने का हक़ वास्तव में मानवता का का मौलिक अधिकार है और पेटेण्ट कराना गरीबों से जीने का हक़ छीनने जैसा होगा।

अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस जैसे विकसित देश तो शुद्ध प्राण वायु भंडारण का पेटेण्ट करा सकते हैं, चीन बाघ के दैहिक अवशेषों से यौनशक्ति वर्धक दवाओं के निर्माण के पेटेण्ट और टाइगर फ़ार्मिंग की अनवरत कोशिश कर रहा है पर अन्तर्राष्ट्रिय समुदाय उसे इसकी इज़ाज़त नहीं देकर कम से कम Save Tiger Mission में अपना अमूल्य योगदान दे रहा है। विदेशों में स्वच्छता की चमक इसलिये दिखाई देती है क्योंकि विकासशील देशों के उद्योगपतियों की कबाड़ीनुमा चरित्र बेस्ट आउट आफ़ वेस्ट का सहारा लेकर सारा जैविक, औद्योगिक और मेडिकल कचरा आयात कर कर के अपनी मातृभूमि को विदेशी कचरों से पाट रहे हैं और वह भी बस कम लागत पर अधिक मुनाफ़ा के चलते।

आपको याद होगा कि हल्दी के पेटेण्ट की लड़ाई हमने जीती थी पर क्या अपना पेटेण्ट स्थापित करने के लिये? आपका भी जवाब होगा नहीं बस उस मुकदमे में जीत से हल्दी पेटेण्ट के दुश्चक्र से निकल गया और एक आम आदमी को एक सस्ते एन्टीबायोटिक औषधि के लिये किसी अमेरिकी कंपनी को पैसा नहीं चुकाना होगा चाहे वह आदमी नेपाल का हो या नैरोबी का, कराँची का या काहिरा का।

आयुर्वेद की किताबों में किया गया शोध, मानवता को लगभग मुफ़्त में स्वाथ्य दिलवायेगा। आपको याद होगा कि तपेदिक को राजयक्ष्मा कहते थे कारण सिर्फ़ इसी मर्ज के इलाज में किसी व्यक्ति को खूब सारा पैसा खर्च करना पड़ता था यही हाल शायद दमा का भी था। धन के अभाव में लोग इस मर्ज से मरते थे। शरतचन्द्र की कथाओं का कई नायक इसी मर्ज का शिकार हुआ है। इस मर्ज को छोड़ कर बाकी किसी भी मौसमी बीमारी के लिये आयुर्वेद का ज्ञान हर घर के अनपढ़ गँवार बड़े बूढ़ों को था और बीमारी लगभग वगैर एक धेला खर्च किये हो जाती थी।

सांप और बिच्छू के काटने पर मन्त्रों से ज़हर उतारने के साक्षी अब भी कई मिल जायेंगे पर आपको जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि इस विद्या के माहिर को इसके लिये एक पैसा लेने पर भी इस विद्या से हाथ धोना पड़ता था। पर हमारा पढ़ा लिखा बुद्धिजीवी समुदाय तो पेटेण्ट चाहता है कि कोई साँप का काटा अगर आये तो हम अपने पेटेण्ट के बदले उससे धन प्राप्त करें और वन टाइम यूजेबल सीडी में उस मन्त्र की रिकार्डिंग देकर अपने अमूल्य, प्राचीन और लोककल्याणकारी धरोहरों की सौदेबाज़ी से अकूत दौलत कमायें। इसी लोभ ने शायद हमारा वह ज्ञान हमसे छीन लिया।

मेरे मित्रों को एड्स की दवा की तलाश आयुर्वेद में चाहिये पर खुद और अपनी सन्तति को संस्कृत की छाया से भी दूर रखेंगे। मतलब रामस्वरूप बीमार पड़े, परिणाम-स्वरूप दवा लाये। भई कुरान पढ़ना हो तो खुद अरबी पढ़ना तो सीखना ही पड़ेगा। आयुर्वेद पढ़ना है तो संस्कृत तो सीखनी ही पड़ेगी । हम फ़्रेंच सीखेंगे पर संस्कृत तो मनुवादियों की विरासत है, श्राद्ध, शादी और कर्मकाण्डों के श्लोकों से भरा पड़ा है, इसे कौन सीखे।

गज़ब बात है कि नहीं? आप अंग्रेज़ी मिडियम से पढ़कर और पाश्चात्य जीवन शैली अपना कर एड्स की बीमारी पाइये और कोई निकम्मा संस्कृत में आयुर्वेद पढ़कर आपके लिये उस एड्स से मुक्त होने की आयुर्वेदिक दवा तलाश करे।

अपने भारत में जहाँ माता पिता और गुरु भी कमर के बाद सीधा जांघों के नाम ही शरीर के अंगों के नाम पर सिखाते हों, यौनांगों से संबंधित बीमारी गुप्त रोग कहलाती हो, इन रोगों का इलाज बस स्टैण्ड/ रेलवे स्टेशन के किनारे अंधेरे से कमरे में कोई अंगूठाछाप डाक्टर शाही दवाखाना में बैठ कर करता हो, यौन शिक्षा का सारा जिम्मा गूगल और पोर्न साइटों के कंधों पर पड़ा हो, एक नव विवाहित युवा अपनी पत्नी के अंतर्वस्त्रों और सैनिटरी नैपकिन व निरोध की खरीदी भी लगभग फुसफुसाते हुए लहज़े में किसी अनजान दुकानदार से ही कर पाता हो वहाँ पर हमारे बुद्धिजीवी मित्र गण एड्स की दवा तलाश करने का जिम्मा आयुर्वेद के सिर पर डालना चाहते हैं और असफ़लता की स्थिति में उस ज्ञान को भी ज्योतिष की तरह पोंगा पन्थी साबित करने की ज़बरदस्त कोशिश करने को उत्साहित बैठे हैं। तो ऐसे बुद्धिजीवियों के लिये मेरा सिर नतमस्तक है।

आयुर्वेद सदैव सफल है पर आपने देखा होगा कि जिस सुषेण ने लक्ष्मण को मृत्यु से बचाया उसी गुणी ने रावण, मेघनाद या कुम्भकर्ण को जीवन दान क्यों नहीं दिया जबकि वह तो लंका का निवासी था और लंकेश के लिये यह उसका पुनीत और अनिवार्य कर्तव्य था। याद कीजिये कि रावण ने भी शत्रु की प्राण रक्षा के लिये वैद्य को प्राण दण्ड नहीं दिया।

आयुर्वेद की ऋचाओं में कायाकल्प तक की गुंजाइश है फिर एड्स जैसी यौन संक्रमणजन्य रोग के लिये कोई उपचार न हो यह नामुमकिन है पर किसी को दधीचि की तरह हड्डियाँ तो दान देनी पड़ेंगी अगर अनुसंधान से अमोघ अस्त्र शस्त्र की खोज करनी है तो। हमारा प्रोफ़ेशनल चरित्र हमें समझाता है कि हमें क्या करना, कोई ना कोई तो तलाशेगा और हम कीमत देकर खरीद लेंगे।

पर मित्र, ” दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम ” ये कहावत पुरानी है। कोई उपजायेगा तभी तो आपके हक़ का दना अस्तित्व में आयेगा। आप सब जानते हैं आयुर्वेद के समुद्र को अपने ज्ञान की मथानी से मथना होगा तभी हम सभी के हर मर्ज़ का इलाज मिलेगा पर अंग्रेज़ी की धौंस पट्टी देकर भारतीयता का अपमान जबतक हमारा तथाकथित आभिजात्य समाज करता रहेगा, आयुर्वेद के खजाने की एक कौड़ी भी आम आदमी के हाथ नहीं आने वाली।

आज कल हम आप जिसे आयुर्वेद मान रहे हैं या स्पष्ट कहें तो आयुर्वेदा, वह दादी नानी के नुस्खों से ज्यादा कुछ नहीं। बल्कि जान लीजिये कि आपके आस पास की प्रकृति ही आपकी हर बीमारियों की दवा समेटे बैठी है बस आपको इसकी जानकारी होनी चाहिये। आस पास देखिये आज भी किसी भी मादा जानवर की सिजेरियन डिलेवरी नहीं होती। कुत्ते, घोड़े आदि भी वही बीमार पड़ते हैं जो इन्सानों की सोहबत में रहते हैं वरना ज़हर की वज़ह से हुई मौत के बाद लाशों को कौवे, गीध, कुत्ते और सियार भी मुँह नहीं लगाते और वह भी वगैर किसी पैथोलोजिकल लैब की रिपोर्ट देखे।

अगर आज के समय में यक्ष का युधिष्ठिर से सामना होता और वह पूछता कि आश्चर्य क्या है तो युधिष्ठिर का उत्तर होता कि हे आर्य, जब एक अरबी जानने-पढ़ने वाला कुरआन में अपनी बीमारियों का इलाज़ नहीं ढूँढता, कोई भी ईसाई बाइबिल के वर्सेज में अमरत्व का विधान नहीं तलाशता और यही हाल लगभग सभी नवोदित धर्मों के माननेवालों का है उस दौर में वेदों को पढ़े बिना बुद्धिजीवी भारतीय अपने सनातन धर्म के मूल वेदों में अपनी बीमारियों की इलाज की उम्मीद कर रहे हैं और ऐसा नहीं होने पर उसका मज़ाक उड़ाने से भी नहीं चूक रहे हैं यही आश्चर्य है।

इस आलेख का अंत प्रिय अटल जी की कविता से कर रहा हूँ …..

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्त्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY