हम लोग सचमुच बहुत भोले हैं, मूर्ख हैं, अक्ल के अंधे हैं

इस्लामी रणनीति का बेहतरीन आयाम है मुरुना। इसका अर्थ लचीलेपन के काफ़ी निकट है और इसीलिये इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है।

मुरुना का इस्तेमाल मुसलमान अपने इर्द गिर्द के सांस्कृतिक पर्यावरण में घुलने मिलने के लिये करता है। इसे ठगी ही कहा जा सकता है।

इसके लिए कुरान (2:102) पर ध्यान देना आवश्यक है। कहा गया है कि, “यदि किसी आयत का निषेध किया जाये या उसे भूलने के लिये कहा जाये तो उसके बदले उससे बेहतर या वैसी ही आयत उपलब्ध कराई जायेगी।”

स्पष्ट है कि पवित्र पुस्तक के कुछ आदेश भुलाये जा सकते हैं क्योंकि कुछ आदेश बेहतर हैं।

खेल यहीं से शुरू होता है।

बेहतर आदेश मुसलमान अपने लिये रखता है और कम अच्छे आदेश गैर मुसलमानों के लिये, ताकि ग़ैर मुसलमानों का प्रतिरोध ढीला हो जाये और वे मुसलमान को भाई से भी बढ़कर मानें।

तो मुसलमान पूरी अंग्रेज़ियत अपना सकता है। आपके साथ बैठकर शराब भी पी सकता है। वह जिन्ना जैसा नास्तिक भी हो सकता है। वह मंदिर जा कर पूजा भी कर सकता है और आपका हिस्सा बन सकता है।

मुट्ठी भर दाढ़ी और टखनों तक सलवार वाला मुसलमान तो फिर भी ठीक है क्योंकि वह दिखाई देता है, पर मुरुना के लचीलेपन का बेहतरीन उदाहरण वे विमान अपहरणकर्ता हैं जो शराबख़ानों और नग्न नर्तकियों के क्लबों में जाते थे, पर 9/11 को अंजाम दिया।

कमाल है! सचमुच कमाल। हम लोग सचमुच बहुत भोले हैं। मूर्ख हैं। अक्ल के अंधे हैं।

भाई जगदीप सिंह के साथ अन्य मित्रों और अग्रजों के विचार आये जो मुझे लगता है कि इस लेख के साथ जोड़े जाने चाहियें। प्रस्तुत हैं:

जगदीप सिंह : क़ुरान को आप मोटे मोटे दो हिस्सों में बांट सकते हो। एक मोमिन को मोमिन के साथ व्यवहार, दूसरा मोमिन का काफ़िर के साथ व्यवहार। और क़ुरान का वो हिस्सा जो मोमिन का मोमिन के साथ वाला है वो गैर मोमिन को दिखाकर उल्लू बनाया जाता है। Quran is a war manual.

मैं : लेकिन ऐसा आप कुरान को पूरा पढ़कर ही कर सकते हैं। सूरों का क्रम बिखरा हुआ है, not logically arranged.

जगदीप सिंह : मैंने पूरी पढ़ी है जी। तुलनात्मक अध्ययन किया है इस्लामिक इतिहास, हदीस और क़ुरान तीनों पढ़कर ही आप इस बीमारी को जान सकते हो।

मैं : जगदीप सिंह मैं समझ गया। नहीं तो आप ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाल पाते।

मैं : जगदीप सिंह, और आपने बिल्कुल सही किया है। क़ुरान को इस्लामी इतिहास के साथ न पढ़ा जाये तो बेमतलब है।

जगदीप सिंह : तीनों को पढ़ने के बाद आपके दिमाग में दो भाव उत्पन्न होते हैं। एक ये कि अगर आप घनघोर स्वार्थी है तो आप मुसलमान बन जाएंगे क्यों कि इसके द्वारा आप अपनी पेट और सेक्स की भूख को आसानी से पूरा कर सकते हो और एक बहुत बड़ी जनसंख्या आपकी मज़हबी गुलाम होगी। दूसरा भाव ये आता है कि अगर सभी लोग मुसलमान बन गए तो प्रकृति आपको मार देगी क्यों कि ये सृजन को रोकता है जो प्रकृति विरुद्ध है। बिना सृजन के कोई नहीं बचेगा ये प्रकृति चाहती है।

मैं : जगदीप सिंह, बिल्कुल बिल्कुल। ज़बरदस्त आकलन है आपका।

जगदीप सिंह : धन्यवाद जी आपका।

Babu Pandey : जगदीप सिंह किस सृजन की बात कर रहें हैं?

मैं : Babu Pandey विचार के सृजन को। कुरान अंतिम पुस्तक है, मुहम्मद अंतिम नबी।

जगदीप सिंह : Exactly

जगदीप सिंह : Dileep Kumar Kaul अगर आप इस बातचीत पर एक पोस्ट बनाकर डाल सको तो आपका धन्यवाद होगा। ये सिर्फ मेरी इच्छा है, आपका मानना या न मानना आप की मर्जी है। लेकिन मुझे ये आवश्यक प्रतीत होता है मानव प्रजाति के लिए। धन्यवाद।

Ashutosh Hanjura : जगदीप सिंह, बहुत सही आकलन है आपका दीन ए इस्लाम का भी और इसको मानने और फैलाने वाले मुसलमानों का भी..! This requires lot of deep study, analysis and application of emerging facts to situations and happenings of contemporary times and events which you seem to have done so well and that’s really commendable… More power to your vision and wisdom. Stay blessed dear…

जगदीप सिंह : धन्यवाद जी। ये मैंने अपने बच्चों के लिए किया है और बिना लाग लपेट के स्वीकार करता हूँ, स्वार्थ में किया है। स्वार्थ हर एक शरीर की सच्चाई है। पर स्वार्थ को एक सीमा तक रखना मानवता है।

Ashutosh Hanjura : जगदीप सिंह, समझा नहीं… थोड़ा और विस्तार से बताएँ..

जगदीप सिंह : सृजन को रोकना मतलब पूरी मानव प्रजाति का खत्म होना। ये प्रकृति का नियम है।

जगदीप सिंह : अब कबूतर के आंख बंद कर लेने से बिल्ली तो नहीं भाग जाएगी ना श्रीमान।

मैं : जगदीप सिंह, मूलत: विचार को बाधित करना ही सृजन को बाधित करता है। इस्लाम बड़ी सूक्ष्मता से ऐसा करता है।

प्रख्यात चिंतक डॉ अजय च्रंगू के विचार :

हम लोग मूर्ख ही नहीं भयभीत लोग हैं जो लिबरल समुदाय की तरह व्यवहार कर रहे हैं। हम भयभीत हैं उन विनाशकारी प्रक्रियाओं से, जो इस्लामी विस्तार के साथ साथ चलती हैं। इन प्रक्रियाओं को भुला देना या खींच खांच कर सही ठहराना, हमारी आंखों में एकटक देख रहे विनाश के प्रति शुतरमुर्गी प्रतिक्रियाएं देने जैसा है। ऐसे विनाशकारी आक्रमण शुतुरमुर्गी मानसिकता को जन्म देते हैं।

Ajay Chrungoo : Not only stupid but frightened people behave as the liberal world has behaved. Frightened of the destructive processes that have accompanied Islamic expansion. Forgetting or rationalising are ostrich reactions to death staring at ones face. Mortal aggressions breed ostrich consciousness.

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