सहिष्णु और संवेदनशील समाज भी जब प्रतिक्रिया करे तो समझने चाहिए संकेत

लेखक हूँ तो मित्र सूची में स्वाभाविक रूप से अधिकांश वामपंथी और अवार्डवापसी गिरोह के सदस्य हैं।

मैं इनके साथ ब्लॉक-ब्लॉक इसलिए नहीं खेलता कि दूसरों की दृष्टि और दृष्टिकोण क्या है, देखते रहना चाहिए। इससे आप की दृष्टि साफ़ होती रहती है।

यह तो स्पष्ट है कि इनको मोदी से चिढ़ है, नफरत की हद तक। वैसे ये उन सभी को पसंद नहीं करते जो इनसे भिन्न सोचता है।

और इनकी बौद्धिक कंगाली तो इस स्तर की है कि ये बहुत सीमित सोचते हैं। साथ ही होता है कुतर्क, फिर चाहे विषय कोई भी हो।

मोदी को लेकर इनकी बेचैनी इसलिए बढ़ गई है कि चौकीदार ने कोई दरवाज़ा इनके लिए खुला नहीं छोड़ा, जिसमें से घुस कर ये अपनी बौद्धिक तबाही मचा सकें। आज की तारीख में इनके पास कोई बिंदु नहीं, जिस को लेकर ये मोदी पर प्रहार कर सकें।

और इनके तरकश में जो भी तीर थे उनको इन्होंने जब-जब चलाया तब-तब ये सोशल मीडिया पर बुरी तरह धोये गए हैं, क्योंकि इनके तीर दिशाहीन और कमज़ोर होते थे। इसलिए देख लीजिये चुनाव घोषित होने के दूसरे दिन तक यह कोई एजेंडा अब तक नहीं चला पाए।

इस बीच कल एक फेसबुकिया लेखक की एक पोस्ट पर निगाह चली गई। ये फेसबुक भी कमाल की चीज़ है, जैसे ही आप को पचीस-पचास शेयर मिलते हैं आप अपने आप को मठाधीश मानने लगते हैं। और ऐसा होते ही आप में वामपंथी अवगुण प्रवेश कर जाता है। क्योंकि मठाधीश साहित्य के क्षेत्र में ही विशेष रूप से पाए जाते हैं। जो अपने बंद कमरे में अपने गिरोह के साथ बैठ कर अपना आधा-अधूरा ज्ञान बांटते हैं। यहां कोई आप की बात का विरोध नहीं करता, कर भी नहीं सकता क्योंकि आप उसे कमरे से अर्थात साहित्य से बाहर करते रहे हैं। यही हाल यहां के फेसबुकिया मठाधीशों का है, जैसे ही आप ने कोई प्रश्न किया तो आप को ब्लॉक कर दिया जाएगा।

एक फेसबुकिया मठाधीश की कल एक पोस्ट थी, जिसमें अपने समर्थको से अपील की गई कि मोदी के पिच पर नहीं जाना है। बल्कि मोदी समर्थकों को अपने पिच पर लाना है।

मगर सवाल उठता है कि मोदी ने कोई पिच छोड़ी कहाँ है। चलो सरसरी निगाह से देख लेते हैं।

सबसे आम चुनावी मुद्दा होता है महंगाई। क्या कोई इस बात को नकार सकता है कि पिछले अनेक दशकों में यह पहली बार हुआ है कि महंगाई नियंत्रित है। बाकी आप अगर कुतर्क करोगे तो ज़मीन पर आमजन द्वारा अच्छे से धोये जाओगे।

इसके अलावा एक प्रमुख मुद्दा होता है बेरोज़गारी। तो इस दौरान जितनी तेज़ी से विकास हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ अतः स्वाभाविक रूप से रोज़गार पैदा हुए हैं।

इसके अलावा प्रशासन, विदेश नीति, कूटनीति, आर्थिक क्षेत्र आदि-आदि ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहां काम नहीं हुआ हो। यहां तक कि सामाजिक क्षेत्र में ऐसे-ऐसे अभूतपूर्व कार्य हुए हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, जैसे कि स्वच्छता और शौचालय।

गरीब के लिए क्या और कितना हुआ है, यह आप किसी असली गरीब से पूछिए और महिलाओं के लिए तो रसोई गैस से लेकर ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दे ही काफी हैं उनके जीवन में बड़े बदलाव के लिए।

इन सामान्य मुद्दों के अतिरिक्त भी अनेक विषय हैं, जिन पर अगर किसी ने कुछ भी कहने का प्रयास किया तो प्रहार उल्टा पड़ेगा। उसमें है भ्रष्टाचार। क्या यह एक उपलब्धि नहीं कि पिछले पांच साल में कोई भ्रष्टाचार की खबर नहीं आई जबकि पांच साल पहले सिर्फ यही खबर बनती थी। यही कारण है जो राफेल को जबरन उठाने का प्रयास हुआ और वो भी रा-फेल हुआ।

एक और मुद्दा है आतंक का। इस विषय पर तो स्पष्ट मत है कि आतंकवाद कश्मीर घाटी तक सीमित कर दिया गया है वरना वो दिन क्या कोई भूल सकता था जब हिन्दू के हर त्यौहार पर आतंक का साया होता था।

इस विषय पर दो बिंदु उठाये जा रहे हैं, एक है आतंकी को छोड़ना। और इसके उठाते ही आम जनता जवाब देने के लिए सक्षम है। क्योंकि सभी जानते हैं कि वो आतंकी क्यों छोड़ा गया था बल्कि साथ ही आम जनता वो लिस्ट भी हाथ में पकड़ा देती है जो बिना किसी विशेष कारण से अन्य के शासन काल में छोडे गए थे।

एक फेसबुकिया लेखक लिखता है कि पुलवामा भी करवाया गया है और यह कहते ही सवाल उठे कि इस तरह से तो सत्तर साल में अब तक जितने भी आतंकी हमले हुए वे सब तत्कालीन सरकार द्वारा करवाए गए माने जाने चाहिए। और इस सूची को देखते ही यह गिरोह निरुत्तर हो जाता है।

मुझे तो इससे आगे एक बात और भी कहनी है कि यह पहली सरकार है, जिसने आतंकी हमले की प्रतिक्रिया में दुश्मन पर वार किया। कम से कम घर में घुस कर मारने की हिम्मत तो दिखाई। और बिना किसी अपने नुकसान के। कोई अगर इस पर भी अगर यह कहता है कि पड़ोसी देश की सेना और सरकार भी इस एयर स्ट्राइक में शामिल थी तो फिर तो हमे ऐसे सक्षम मोदी को और अधिक बहुमत से लाना चाहिए जो दुश्मन को भी साध लेता है।

इस मोदी विरोधी गिरोह का अंतिम बिंदु होता है हिन्दू-मुस्लिम। उनके मतानुसार समाज में नफरत बढ़ी है। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और है, अब तक सिर्फ मुस्लिम-मुस्लिम होता था, अर्थात मुस्लिम तुष्टीकरण में सारी सीमायें लांघ दी गई थी, अब सिर्फ यह हुआ है कि बहुसंख्यक हिन्दू समाज जो अब तक दबाया और प्रताड़ित किया गया था वो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उठ खड़ा हुआ है। वरना उसकी कोई बात ही नहीं करता था। इसके लिए यहां एक उदाहरण ही काफी होगा कि चुनाव घोषित होती ही रमजान की बात की जाने लगी मगर किसी ने भी यह नहीं कहा कि इसी चुनाव के दौरान नवरात्र भी आएंगे।

आमजन अब विचारों की एकपक्षीयता और विरोधाभास को स्वीकार करने के मूड में नहीं है, इसलिए कपड़ों पर दाग धोने वाले सर्फ पाउडर की भी जमकर धुलाई हो रही है। एड बनाने वाला एक साधारण-सी बात नहीं समझ पाया कि आप अधिक सफेद कपड़े पहनाकर उस मासूम बच्चे को मुख्य धारा से दूर कर रहे हो और इस तरह से समाज को जोड़ने की जगह जाने-अनजाने बाँट रहे हो।

बहरहाल, आम जनता मूर्ख नहीं होती और अगर कोई पढ़ा-लिखा यह समझे कि सिर्फ वही समझदार है तो सच में वो मूर्ख है। इन सब के बीच कोई अगर बहुसंख्यक समाज द्वारा दी जा रही अनेक प्रतिक्रियाओं के संदेश को नहीं पढ़ पा रहा तो इसमें आप का कसूर है क्योंकि हिन्दू समाज मूल रूप से सहिष्णु है, संवेदनशील भी, ऐसे में अगर वो कोई प्रतिक्रिया कर रहा है तो मान लिया जाना चाहिए कि कोई न कोई बात है।

संक्षिप्त में कहना हो तो देश का आमजन जाग चुका है। उसे कोई भी मीठी गोली खिला कर गुलाम बनाये रखना अब सम्भव नहीं। उलटे इस बार अनेक राजपरिवार के किले ध्वस्त होंगे और कइयों की नींव हिला दी जाएगी। याद रहे, समय जितना बलवान होता है उतना ही निष्ठुर भी।

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