डरते वही हैं जो गलत होते हैं

कल 2019 लोक सभा चुनावों के तारीखों की घोषणा हो गई। सात चरणों में होने वाले देश के इस महापर्व के तारीखों में भी विपक्ष द्वारा कोई बखेड़ा खड़ा न किया जाए, रात रात तक भी विश्वास न हो रहा था।

आखिरकार विपक्ष ने उसमें भी समस्या ढूंढ ही ली और आज सुबह चुनाव के कुछ ‘विशेष’ लोगों से सम्बंधित ‘विशेष’ तारीखों का – लगे करने विलाप।

ये विलाप करना इन विपक्षियों को कितना बढ़िया लगता है, यह तो ख़ैर देखते ही बनता है।

विलाप का आधार इन्होंने यह बनाया कि इन तारीखों पर उन ‘विशेष’ लोगों को काफी तकलीफ होगी। क्यों भाई – यहाँ तो नरेंद्र मोदी जब नवरात्र के अवसर पर नौ दिनों का व्रत तक सिर्फ जल पर रह कर रखते हैं, उस वक़्त भी उनका हर काम, कुछ भी हो देश के अंदर या बाहर – अनवरत चलता है।

और यह खबर एक बार नहीं, मीडिया द्वारा कई बार कवर हुई है, यहाँ तक कि अमेरिका के व्हाइट हाउस तक को भी ऐसा देखकर आश्चर्य होता होगा। उस वक़्त तो कोई यह नहीं कहा कि – प्रधानमंत्री, इस वक़्त आप कृपया कुछ न करें, आपको असुविधा होगी, आप आराम करें!

फिर बाकि जिस आधार पर अभी विशेष समुदाय वाले चिल्लपों मचा रहे हैं मुझे आगे कहने कि आवश्यकता ही नहीं। एक बार बाहर जा कर वोटिंग ही तो करना है, इसमें समस्या है किधर, यह कोई मुझे बता दे पहले?

मतलब कांग्रेस और जितने भी विपक्षी हैं, किस हद तक गिर सकते हैं, उसकी भी कोई सीमा तय की है क्या? एक कांफ्रेंस इस पर भी कर ही लें!

या फिर मान लें कि जितना इस बार ये सभी डरे हुए हैं, उतना पहले कभी भी नहीं थे। डर में होशो हवास खो बैठे हैं। क्या कर रहे हैं, उसके दूरगामी परिणाम मालूम नहीं इन्हें। येन-केन-प्रकारेण अपनी पूरी ताकत लगा दी है, अपना वर्चस्व को बचा ले जाने के लिए।

इनकी फंडिंग जो कई स्रोतों से आती थी, उस पर भी मोदी सरकार द्वारा अंकुश लग चुका है – भारी समस्या इससे भी है और इसके लिए सभी पार्टियां भरसक प्रयास कर रही हैं गलत तत्वों से हाथ मिलाने का। उन्हें मालूम है बिन फंडिंग 2019 का महासंग्राम लड़ने में दिक्कत आएगी।

और भी कई कई कारण हैं, तभी अगर पिछले कुछ महीनों का क्रम जोड़े तो वह इस प्रकार से आता है – राफेल डील पर सरकार को घेरना – कुलभूषण जाधव केस पर हल्ला करना – पुलवामा अटैक पर भी सरकार की आलोचना – भारत द्वारा जवाबी कार्यवाही के सबूत मांगना – कहीं न कहीं काफी हद तक देश का ध्यान सिर्फ विंग कमांडर अभिनन्दन की रिहाई तक सीमित करने की कोशिश (यहाँ पर मेरा यह कहना हरगिज़ नहीं है कि यह घटना महत्वपूर्ण नहीं थी किन्तु इस घटना को विपक्षियों ने अलग रंग देने की पूरी कोशिश की है) जिससे पाकिस्तान के आतंकियों पर सरकार और कोई एक्शन ‘न’ ले (कुछ ऐसा का ही प्रयास था, यहाँ पर ‘न’ के कई आयाम हैं)।

इसी बीच पुलवामा अटैक में हमारे जितने वीर सैनिक शहीद हुए धर्म के आधार पर उनकी जानकारी निकाल कर जनता के सामने पेश करना – और जब किसी से भी ठीक से बात न बनी तो वापस राफेल मुद्दे को उठाना।

इस बीच चुनाव के तारीखों पर शोरगुल करना – साथ ही एक नए जुमले के साथ कांग्रेस आई है कि 1999 का कांधार प्रकरण हुआ और उसमें मोस्ट वांटेड आतंकियों को छोड़ा गया, तब उन्हें एस्कॉर्ट करते वक़्त का फोटो जारी करना।

मतलब यह तो कुछ बातें ही लिखी मैंने यहाँ। ऐसे अनगिनत देश विरोधी कामों में हमेशा से ही कांग्रेस या अन्य विरोधी पार्टियां लगी रही हैं। सकारात्मक रूप से कभी भी अपने विपक्षी दल होने के कर्तव्य का निर्वहन न किया।

आज जो कुछ है जनता के सामने है।

जनता को तो पूछना चाहिए इनसे कि – भाई, आखिर चाहते क्या हो तुम लोग? सिर्फ मोदी का हटाना, गिरना, मारना ही उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

और अगर ये सभी महानुभाव सही हैं, तो फिर डर कैसा?

कोई माने या ना माने – डरते वही हैं जो गलत होते हैं – प्रकृति का सीधा सा नियम है।

जनता अपनी आँख, नाक और कान खुले रखे।

एक बार फिर से – कौन आपके लिए हितकर है उसे समझते हुए अपना वोट डालें।

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