मसूद को रिहा करने के सर्वसम्मत निर्णय में काँग्रेस का क्या रोल था राहुल?

“मसूद अज़हर को भारतीय कारागार से निकाल कर कंदहार ले जानेवाले कौन थे? यही अजित दोवाल ना? मोदीजी, जनता को सच क्या है, बताइए!”

इस आशय का ट्वीट कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने किया है। ज़ाहिर है, इस बात पर बड़ा रायता फैला है!

वैसे तो राहुल क्या कहते हैं या लिखते हैं, उसे कोई गंभीरता से नहीं लेता। हर बार अपने अज्ञान का एक प्रमाण वे खुद हो कर अपने हाथों में थमाने की वजह से भाजपा कार्यकर्ताओं में ख़ुशी की एक लहर-सी दौड़ जाती है। उनका यह ट्वीट भी उसी की एक कड़ी है!

IC814 विमान का अपहरण होने पर तत्कालीन भारत सरकार ने अपहरणकर्ताओं के साथ बातचीत करने के लिए जिन लोगों का चयन किया था उन में आईबी की ओर से अतिरिक्त निदेशक श्री अजित दोवाल और आईएफएस (भारतीय विदेश सेवा) से श्री काटजू का समावेश था।

ये लोग कंधार गए थे। अपहरणकर्ताओं की मूल मांगों में 135 कैदियों को रिहा करने की मांग शामिल थी। इन लोगों ने इस संख्या को 3 पर लाया। पर इस से भी वे स्वयं संतुष्ट नहीं थे।

इस बात पर तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री बृजेश मिश्र से श्री दोवाल की बड़ी तीखी कहा-सुनी हुई। अजित दोवाल कैदियों को रिहा करने के निर्णय से बिलकुल असहमत थे। निर्णय वैसे सरकार को लेना था। वाजपेयी सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुला कर अपनी सोच सभी के सामने रख, उनकी राय से ही अंतिम निर्णय लिया था।

इसके बाद सरकार की तरफ से भारतीय दल के प्रमुख के नाते श्री जसवंत सिंह भी कंधार पहुंचे थे। यहां श्री जसवंत सिंह केवल भारत के विदेश मंत्री ही नहीं, बल्कि भारत की ओर से वहां कोई भी निर्णय लेने के लिए पूर्णतया अधिकृत व्यक्ति के रूप में भारत के प्रतिनिधि दल का नेतृत्व कर रहे थे।

इस के विपरीत उस समय दोवाल आईबी के प्रमुख भी नहीं थे। इसलिए यह कहना, कि मसूद को मुक्त करने का निर्णय उनका था, हास्यास्पद है। और श्री गाँधी यदि यह स्पष्ट कर दें कि जहां यह निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया था उस बैठक में क्या कांग्रेस ने उस का समर्थन किया था, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो ही जाएगा!

खैर! राहुल गांधी की वास्तविक परेशानी क्या है? क्या दोवाल नाम की फांस का दर्द उन के मस्तिष्क तक पहुँच कर उन्हें भ्रमित कर रहा है? कुछ देर के लिए यदि हम भूल भी जाएं कि जिस फांस का दर्द राहुल गाँधी को होता है उसी फांस से पिंडी भी परेशान रहती है, मूल प्रश्न वैसा ही बाकी रहता है।

अब तक सत्ता पर आसीन होते हुए भी जिन्होंने खुद अपने हाथों खुद को ज़ंजीरों में जकड़ रखा था, हर पाकिस्तानी हमले का जवाब देने के समय जो ‘कूटनीतिक संयम’ जैसे शब्दों के पीछे अपनी कमजोरी, नामर्दगी छिपाते थे, उनको दोवाल का ‘आक्रामक बचाव’ का तत्त्व अस्वीकार हो, इसमें कोई आश्चर्य नहीं!

दिक्कत यह है कि चुनाव सर पर होते हुए यदि मोदी की मर्दानगी को ललकारा जाए तो अपने वोट कटेंगे, इस डर से कांग्रेस और पाकिस्तान मोदी को लक्ष्य न बना कर दोवाल पर निशाना साध रहे हैं। और ऐसे में ज़मीनी हक़ीक़तों को नजरअंदाज़ करते हुए बेबुनियाद और झूठे आरोप कर रहे हैं। ऐसा करते हुए वे देश के सुरक्षा तंत्र का मनोबल तोड़ रहे हैं, इस बात की उन्हें कोई परवाह नहीं!

एक कहावत है कि कौवे के शाप से गाय नहीं मरती! न दोवाल का कुछ बिगड़ना है, और न ही मोदी का! इस टुच्ची नौटंकी से बस एक ही सच उभर कर सामने आया है – देश की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी अपने सर लेने की श्री गांधी की औकात नहीं, उतनी समझ न उन में है, और न ही अन्य कांग्रेसी शिखर नेतृत्व में है!

इसलिए यदि देश को सुरक्षित रखना है तो नरेंद्र मोदी ही आवश्यक है!

जय हिंद!

(सुश्री स्वाति तोरसेकर के मराठी लेख का अनुवाद)

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