कश्मीर सिंह की देश वापसी

कश्मीर सिंह भारत के पंजाब प्रांत के होशियार पुर जिले के निवासी थे। उनकी नौकरी 1967 में पंजाब पुलिस में लगी थी, लेकिन 1971 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

रोज़ी रोटी कमाने के चक्कर में वे सीमा पार कर पाकिस्तान चले गये थे। उन्हें 1973 में पाकिस्तान के रावलपिण्डी शहर से पकड़ा गया था। उन पर पाकिस्तान की जासूसी करने का आरोप लगा था। उस समय उनकी उम्र 32 साल थी। उन्हें 35 साल तक पाकिस्तान के जेल में सड़ना पड़ा।

उन्हें 18 साल तक पांव में बेड़ियों से जकड़ कर रखा गया था। उनकी गिरफ्तारी के पाँच साल बाद ही उन्हें फाँसी की सजा सुना दी गयी थी। 28 मार्च 1978 को सुबह के चार बजे उन्हें फाँसी दी जानी थी। फांसी की पूरी तैयारी हो चुकी थी। अचानक रात के दो बजे फाँसी की सजा निरस्त कर दी गयी।

फाँसी की सजा निरस्त होने के बाद भी कश्मीर सिंह और 30 साल पाकिस्तान जेलों में बंद रहे । उनके लिए मसीहा बनकर तत्कालीन कार्यवाहक मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी आए। यह बात सन् 2000 के बाद की है।

अंसार बर्नी लाहौर सेंट्रल जेल के दौरा करने आए थे। वहां वे कश्मीर सिंह से मिले। उन्हें कश्मीर सिंह का केस जायज़ लगा। उन्हें सरासर इसमें नाइंसाफी दिखी। एक आदमी अकारण ही 35 सालों से पाकिस्तानी जेल में सड़ रहा है, जिसकी फाँसी की सजा 30 साल पहले ही निरस्त कर दी गयी थी। अंसार बर्नी ने कश्मीर सिंह का केस पाकिस्तान सरकार के पास पुनर्विचार के लिए रखा। उस समय पाकिस्तान के प्रेसिडेंट परवेज़ मुशर्रफ थे। मामला कई सालों तक विचाराधीन रहा। आखिर 4 मार्च 2008 को पर्रवेज़ मुशर्रफ ने उनकी रिहाई के आदेश जारी कर दिए थे।

6 मार्च 2008 के दिन पाकिस्तान सरकार ने कश्मीर सिंह को वाघा बॉर्डर पर छोड़ दिया। दोनों तरफ से तालियाँ बजीं थीं। कश्मीर सिंह सीधे सच्चे इंसान थे। उन्होंने भारत पहुँच कर भारत की मिट्टी को न तो चूमा और न पत्नी परमजीत कौर से सार्वजनिक तौर पर गले मिले। केवल बच्चे शीशपाल सिंह के सिर पर हाथ रखा। और तो और वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक ही सवाल बार-बार पूछने पर झल्ला उठे थे – “एक ही सवाल बार बार क्यों पूछ रहे हो? अपने घर आने में किसे अच्छा नहीं लगेगा?”

वो कश्मीर सिंह जो भारत पाक रिश्ते का चेहरा बनकर उभरे थे, अंत समय में अपनी नाराज़गी छुपा न सके थे। उन्हें एक रात के लिए फाइव स्टार होटल में भी ठहराया गया था। होटल के नर्म बिस्तर पर उन्हें रात भर नींद नहीं आयी थी। मीडिया को वांछित टीआरपी की दरकार थी । उन्हीं दिनों भारत आस्ट्रेलिया का मैच भी था। उन्हें डर था कि कहीं क्रिकेट इस खबर पर हावी न हो जाए।

कश्मीर सिंह को पूरी दुनिया बदली नज़र आ रही थी। उनके हाथ में एक खिलौना पकड़ा दिया गया था, जिसे मोबाइल कहा जा रहा था। मोबाइल से वे दुनिया जहान से बात कर सकते थे। उनके गांव का नाम नांगलचोरां से नांगलखिलाड़ियां कर दिया गया था।

मीडिया ने अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए उन्हें युद्ध बंदी घोषित कर दिया था। 1972 / 73 में कौन सा युद्ध चल रहा था? मीडिया कर्मी भी भूखे प्यासे गरमी जाड़ा बरसात का सामना करते रहते हैं, एक अदद खबर पाने के लिए जो कि मसालेदार हो। मीडिया बाजे गाजे के साथ कश्मीर सिंह की रिहाई दिखा रहा था। यहां तक तो ठीक था, पर किसी के घाव को कुरेदना ठीक नहीं था। यह हक मिडिया को बिल्कुल नहीं था। उनकी मर्ज़ी जाने बिना उनसे अतीत के सवाल पूछना लाज़मी नहीं था।

मार डालो, तोड़ दो मुझे… मेरे अन्दर जो मेरे ठाकुर विराजमान है मेरे अन्दर जो भारत माता विराजमान है वहां तक तो मैं तुम्हें पहुँचने भी न दूंगी… क्योंकि… मैं एक संन्यासी हूँ इस आत्मतत्व को न मिटा सके कोई मैं वह अविनाशी हूँ… मैं संन्यासी हूँ…

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