वही विजेता घोषित हुआ, जिसने लिखा इतिहास

एक मित्र ने कुछ दिनों पहले मज़ाक मज़ाक में कहा – अपनी तारीफ करना इतना ज़रूरी काम है कि मैं इसे दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ सकता।

बात हँसी मज़ाक की थी, हँसी मज़ाक में निकल गयी. पर आगे सोचा तो बात इससे गहरी लगी।

चर्चिल ने दूसरे विश्वयुद्ध के संदर्भ में कुछ ऐसा कहा था – I know history will be kind to me, because I intend to write it.

और यह बात उसने पूरी संजीदगी से कही थी। विश्वयुद्ध जीतने के बाद वह इसका इतिहास लिखने में जुट गया और 6 वॉल्यूम में उसने दूसरे विश्वयुद्ध का इतिहास लिखा। लड़ाई जीत कर भी चर्चिल चुनाव हार गया, पर वह इतिहास लिखने का अपना लक्ष्य नहीं भूला। उसे इसके लिए 1953 में साहित्य का नॉबेल प्राइज़ भी मिला।

हम कहते हैं, इतिहास हमेशा विजेताओं ने लिखा है. पर यह संभवतः पूरा सत्य नहीं है। आज विजय और विजेता के माने बदल गए हैं। लड़ाई की जीत अधूरी जीत है। असली लड़ाई उस जीत का इतिहास लिखने से शुरू होती है।

पुलवामा का हमला और उसके बाद भारतीय सेना की सनसनीखेज़ एयर स्ट्राइक का ही उदाहरण ले लीजिए। हमने उनके अड्डे नष्ट कर दिए, सैकड़ों आतंकियों को मारा… पाकिस्तान की पैंट गीली हो गई। पर यह जीत, जीत जैसी क्यों नहीं महसूस हुई?

क्योंकि इस लड़ाई के चारों ओर जो नैरेटिव बना, हम वह हार गए। हमारे देश की और दुनिया भर की मीडिया में अपनी जीत हम स्थापित नहीं कर पाए। पश्चिमी मीडिया का सुर और यहाँ के जनमत का परसेप्शन यही रहा कि यह लड़ाई बराबर पर छूटी, बल्कि पाकिस्तान की ही बढ़त रही। हम सैन्य आक्रमण में जीत कर भी नैरेटिव हार गए।

आज युद्ध बदल गया है। युद्ध में जीत-हार के मायने बदल गए हैं। आज कोई देश किसी को हरा कर उसपर कब्ज़ा नहीं जमा सकता। बल्कि यह कहें, आज किसी देश पर दुश्मन अपनी फौज से कब्ज़ा नहीं करता, अपने नैरेटिव से कब्ज़ा करता है। इसी की जीत-हार असली जीत-हार है।

आज दुनिया को देख लीजिए। इसकी सारी महाशक्तियों को देख लीजिए। अमेरिका के पास टेक्नोलॉजी है, रूस के पास सेना है, चीन के पास इकॉनमी है। जापान दुनिया के सबसे अच्छे कंप्यूटर बनाता है, जर्मनी सबसे अच्छी कारें बनाता है, इज़राइल सबसे अच्छे हथियार बनाता है… इंग्लैंड के पास कुछ नहीं है, इंग्लैंड कुछ नहीं बनाता…

फिर भी जब आप दुनिया की महाशक्तियाँ गिनते हैं तो इंग्लैंड को इग्नोर नहीं कर सकते… क्योंकि अंग्रेज़ सिर्फ एक ही चीज़ बनाते हैं… ये बात बनाते हैं…

इसमें अंग्रेज़ों का कोई मुकाबला नहीं है। यहाँ हर जगह, हर स्तर पर कम्युनिकेशन स्किल की बात होती है, इसी एक बात का बोलबाला है। इनके पास कुछ भी नहीं है, पर इनके पास मीडिया है। और इसी ताकत के बल पर ये आज भी सुपरपावर हैं।

चर्चिल ने इसी ताकत को पहचाना था, इसी की बात की थी। और इसी के दम पर इंग्लैंड जो पूरे द्वितीय विश्वयुद्ध में एक दूसरे दर्जे की ताकत था, जिसने सचमुच अपने दम पर एक लड़ाई नहीं लड़ी, जो इस लड़ाई के छह में पहले चार साल अपने बिल में दुबका रहा और आखिरी के दो साल अमेरिका का पिछलग्गू बना रहा… वह विश्वयुद्ध का विजेता कहलाया।

इंग्लैंड ने कोई लड़ाई नहीं जीती। लड़ाई अमेरिका ने जीती थी, इंग्लैंड तो सिर्फ उसका पिछलग्गू था। अगर हिटलर यह लड़ाई जीतता तो इंग्लैंड शायद उसका पिछलग्गू भी बन जाता।

पर अपने समय की दो महान हस्तियों, हिटलर और चर्चिल में एक आज दुनिया में घृणा का पात्र माना जाता है, अमानवीय क्रूरता का पर्याय गिना जाता है वहीं दूसरा नॉबेल पुरस्कार पाता है, सम्मान से याद किया जाता है।

नहीं, इसलिए नहीं कि उसने लड़ाई जीती। बल्कि इसलिए कि उसने उस लड़ाई का इतिहास लिखा था। कह सकते हैं कि इतिहास शायद विजेताओं ने नहीं लिखा है, बल्कि जिसने इतिहास लिखा है, वही विजेता घोषित हुआ है।

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