न्याय समाज की संगठित शक्ति से मिलता है, किसी कोर्ट कचहरी में नहीं

हिन्दू समाज पिछले सैकड़ों सालों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है… वह किसी सुप्रीम कोर्ट के भरोसे नहीं लड़ रहा है।

राजा दाहिर और मुहम्मद बिन कासिम के बीच मध्यस्थता करने सुप्रीम कोर्ट नहीं आया था।

मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज के बीच मध्यस्थता करने सुप्रीम कोर्ट नहीं आया था।

बप्पा रावल और राजा सुहेलदेव ने दुश्मनों से लड़ने के लिए किसी कोर्ट में अर्जी नहीं लगाई थी।

औरंगज़ेब ने जब गुरु के साहबजादों को दीवार में चिनवाया था, जब गुरुओं को कोल्हू में पिसवाया था और जलते तेल के कड़ाह में डाला था तो उस पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे-ऑर्डर नहीं लगा था।

न्याय किसी कोर्ट कचहरी में नहीं मिलता। न्याय समाज की संगठित शक्ति से मिलता है। एक व्यक्ति का न्याय समाज करता है। पूरे समाज का न्याय एक व्यक्ति नहीं करता।

मी लॉर्ड! समाज आपका सम्मान करता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि आप किसी सम्मान के योग्य हैं। हम अपने देश का सम्मान करते हैं, इसकी व्यवस्था का सम्मान करते हैं। यह संविधान और ये कोर्ट संयोग से उस व्यवस्था के अंग हैं। धोखे से आप भी वह सम्मान पाते आ रहे हैं, जिसे गँवाने में अभी तक अपनी तरफ से आपने कोई कसर छोड़ी नहीं है।

पर यह आपकी काबिलियत और आपकी तारीफ हो, ऐसा नहीं है। आपकी जगह उस कुर्सी पर अगर कोई ऐरा-गैरा भी बैठा होता तो नाक बन्द करके हम उसका भी सम्मान कर देते। बल्कि ऐसे कई उस कुर्सी पर बैठ कर और सम्मान पाकर गए हैं। ऐसे एक को कुछ दिन पहले हमने पाकिस्तान के चैनल पर पाकिस्तान की तरफदारी करते सुना। अक्सर किसी को किसी आतंकी के लिए आधी रात को कोर्ट खोलते देखते हैं। अलगाववादियों के लिए बोलते सुनते हैं।

गंदगी बढ़ती जा रही है, दुर्गंध फैल रही है। कुर्सी पर बैठने मिल गया है, और वह बर्दाश्त किया जा रहा है तो सर पर मत बैठने लगिये। देश किसी न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया के खंभों पर नहीं टिका है। देश हज़ारों सालों से और आज भी धर्म के स्तंभ पर टिका है। दुर्भाग्य से हम आज उस खंभे पर आघात करने वालों को बर्दाश्त कर रहे हैं।

अन्याय प्रतिकार को जन्म देता है। सहनशीलता की जो एक सीमा होती थी वह कब की टूट चुकी है। लोग तो पागल कुत्तों को पत्थर मार मार कर, सर कुचल कर मार देते हैं… पर क्या है ना कि देखने में अच्छा नहीं लगता। कुत्तागाड़ी मँगानी होगी… आशा है कि 2019 के चुनावों में जनता अपने नेताओं से हज़ार के नोट और दारू की बोतल के बजाय वह कुत्तागाड़ी माँगेगी।

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