कल अगर युद्ध हो तो क्या कोर्ट से परमीशन लेनी होगी कि बम फेंके या नहीं!

राफ़ेल में पुनः सुनवाई की याचिका के दौरान कल सरकार ने कुछेक ज़बरदस्त बिंदु रखे।

सबसे पहले तो यही था कि हर बार कोई एक डॉक्युमेंट चुरा कर एक अख़बार पब्लिश कर देता है, सूत्रों के हवाले से। सरकार इस पर कार्यवाही करेगी।

दूसरा यह कि अदालत का कार्य होता है फ़ाइनल डिसीजन पर सुनवाई करना। थॉट प्रॉसेस पर अदालत सुनवाई नही कर सकती। प्रायः ऐसा होता है निर्णय लेने में कि सभी लोग पहले दिन एक जैसा नही सोचते, अंत तक सारे सबूत देख सुन कर सोचने लगते हैं। यह अदालत का काम नहीं कि रोज़ रोज़ कोई क्या सोच रहा था इस पर सुनवाई करे।

तीसरा यह कि अदालत इस मामले को वैसे ही ले रहा है जैसे कोई एडमिनिस्ट्रेटिव मसले की सुनवाई हो रही हो। कल को अगर युद्ध हो तो क्या अदालत से परमीशन लेनी होगी कि बम फेंके या ना फेंके?

चौथा यह कि दुनिया के किसी भी देश में रक्षा सम्बंधी उपकरणों पर खुली अदालत में ऐसी बहस नही होती जैसी इस अदालत में हुई। दुश्मन देश भारत की युद्धक तकनीक अदालत से जान जाएँगे।

पाँचवा यह कि राफ़ेल भारत के लिए पंद्रह साल से ज़रूरी रहा है, अभी आपने देखा भी कि भारत को F16 का सामना मिग 21 से करना पड़ा।

छठा यह कि अब यह क़ानूनी लड़ाई से ज़्यादा राजनैतिक लड़ाई हो गई है। अदालत के बयानों को तोड़ मरोड़ कर राजनीति में प्रयोग करता है विपक्ष।

सातवाँ यह कि बार बार इस तरह से सुनवाई, तारीख, जाँच, चोरी के डॉक्युमेंट और राजनीति के आधार पर कर संदेश यही जाता है कि भारत से सैन्य उपकरण की डीलिंग ख़तरे वाली है, यहाँ बस मामले को लटकाते रहते हैं।

अंत में यह कि राफ़ेल भारत के लिए राफ़ेल बहुत ज़रूरी है। बहुत हुआ, बार बार इस पर राजनीति ना की जाए, साथ ही अदालत भी ये ध्यान दे कुछ मुद्दे उसके दायरे से बाहर के होते हैं, जिनमें यह भी है।

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