युद्ध क्यों? : प्रायोजित अशान्ति को शान्ति में बदलने अनिवार्य है युद्ध

आज मेरे मित्र ने मेरे एक फेसबुक पोस्ट के उत्तर में लिखा है कि युद्ध इतना ही अनिवार्य है तो चीन के कब्ज़े वाली भूमि वापस ले कर दिखाएँ। सचमुच बात मार्के की थी, मैंने भी कुछ जवाब दिया तभी उनका एक और कमेण्ट मौजूँ हुआ कि बल, बुद्धि और विद्या का प्रयोग मानवता के कल्याण के लिये होना चाहिये। युद्ध से कोई समाधान (हल) नहीं मिलता।

अब मेरे मित्र को कौन बताये कि बन्धुवर, हल तो सिर्फ़ किसान के पास होता है बाकी लोग तो बस अपनी मुसीबतों के समय हल ढूँढने निकलते हैं और अपनी सारी ऊर्जा समस्या हल करने में लगा देते हैं।

और अब तो किसान भी हल के बदले ट्रैक्टर ले रहा है और और ट्रैक्टर के लिये गये लोन चुकाने के लिये सरकार की ओर ऋण माफ़ी योजना की उम्मीद लगाये बैठा है और निराश होकर हल के बदले हलाहल सेवन कर रहा है।

तो भाई, आज की तारीख में हल कहीं नहीं है बस हिन्दी वर्णमाला की किताब में मिलेगा ’ह’ से हल।

तो बचा आपका सवाल कि युद्ध क्यों जब हल नहीं मिल सकता तो लीजिये कुछ तर्क हाज़िर हैं।

इसी शीर्षक से पहले वाले लेख में एक उल्लेख चाणक्य के नाम से है कि “शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चर्चा प्रवर्तते” जिसका अर्थ यह है कि अगर आपके देश की सीमाएँ शस्त्र द्वारा सुरक्षित हैं तभी आपको ज्ञान हासिल करने का हक है।

शायद आपको मालूम हो कि गुरुदेव रविन्द्र टैगोर जब जापान के एक विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह प्रमाण पत्र वितरण हेतु पहुँचे तो वहाँ के छात्रों ने उनके हाथों से प्रमाण पत्र लेने से यह कहकर इनकार कर दिया कि एक गुलाम देश का नागरिक एक आज़ाद मुल्क के छात्रों को प्रमाण पत्र कैसे दे सकता है।

आप आज़ाद और स्वतन्त्र हैं तभी आपकी आवाज़ सुनी जायेगी वर्ना अपने बल, बुद्धि और विद्या का मानव कल्याण के लिये मात्र प्रयोग करने वाला तिब्बत आज चीन का उपनिवेश से ज्यादा कुछ नहीं है। और ये भी ध्यान रखियेगा कि चीन जिस बौद्ध धर्म को अपना राजकीय धर्म घोषित किये हुए है उसी धर्म के सर्वोच्च हस्ती दलाई लामा और पणछेन लामा उसी बौद्धों के बैटिकन, तिब्बत के नागरिक और नेता या शासक हैं।

यह तो कुछ ऐसा ही है कि कोई नमाज़ी किसी मस्ज़िद के आलिम को अपना नौकर बना ले या पोप को किसी पब में बियर परोसने के काम में लगा दिया जाये पर कुरीतियाँ तो सनातन धर्म, हिन्दू, भारत और आखिरकार मोदी के आचरण में ही हैं और यही सोचना आज के भारतीय बुद्धिजीवियों की खालिस पहचान है। अगर आपने सनातन धर्म कि हिमायत कर दी तो आप भक्त हैं, खास कर मोदी भक्त। कभी बिस्मार्क की आयरन एण्ड ब्लड पालिसी भी पढ़कर देखिये आपको पता चल जायेगा देश को एकीकृत और स्वतंत्र रकने के लिये युद्ध के लिये तत्पर रहना क्यों आवश्यक है।

दलाई लामा के नोबल प्राइज़ के अलावा आज तिब्बत के स्वर्णिम अतीत के पास गर्व करने को कुछ नहीं है मात्र चीन के तलवे चाटने छोड़ कर कारण वह आज आजाद नहीं और उसे गुलाम बनाने वाला देश विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध देश चीन जबकि तिब्बत बौद्धों के लिये बस वैसा ही जैसा सूफ़ियों के लिये हज़रत निज़ामुद्दीन चिश्ती की दरगाह।

तुलसी ने भी कहा है कि “पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं”। पर वहीं दूसरी ओर वही एक बौद्ध देश म्यांमार और वहीं के बौद्ध भिक्षु असिन विराथू कहानी पर एक नज़र डालिये। अपने देश में मुसलमानों की ज्यादती के खिलाफ़ हथियार उठा बैठा यह युवक और आज वह समस्या म्यांमार से दूर रोहिंग्या मुसलमानों के रूप में बाँग्लादेश की सीमा पार करती हुई भारत की सीमा में सुनामी की लहरों के मानिन्द घुसने को तत्पर है वह भी वहाँ जिस देश में आमिर खान, शाहरुख, नसीर जैसे नामचीन मुसलमानों को असहिष्णुता के चलते भारत छोड़ने का मन कर रहा है और इस डर को ये माननीय सरे महफ़िल इकरार भी कर चुके हैं और मजे की बात की इन सबकी बीवियाँ सनातनी युवतियाँ है । और इन नामचीन मुसलमानों का डर भी उन रोहिंग्याओं को भारत आने से नहीं रोक पा रहा है।

ध्यान दीजिये कि एक अहिंसक बौद्ध ने अस्त्र उठाया तो उसके देश को अस्थिर करने वाली ताकतें देश छोड़ कर भाग गईं पर दूसरे देश ने अपनी सारी ताकत मानवीय मूल्यों की रक्षा में लगाया तो आज वह देश चीनी सैनिकों के बूटों के नीचे कराह रहा है।

मानवीय मूल्य जैसे दया, करुणा, सेवा, सहअस्तित्व, शान्ति, सहयोग, भाईचारा, सेक्यूलरिज़्म आदि विजेताओं की मटरगश्तियाँ हैं बस वर्ना ये सारे मूल्य सिर्फ़ पराजित कौम के संस्कार में ही मिलते हैं । वर्ना मुर्गे में ये सारे गुण हैं पर क्या कोई भी इन्सान तन्दूरी चिकन खाने का इरादा छोड़ पायेगा? पर वही इन्सान क्या तंदूरी बाज खाने की सोच भी सकता है? फ़र्क बस आक्रामकता है। शायद बाज का गोश्त मुर्गे के गोश्त और बाघ का गोश्त बकरे के गोश्त से बेहतरीन भी हो पर बाज की आक्रामकता और बाघ होने का एहसास ही नानवेजिटेरियनों की ज़ुबान से जायके का एहसास गायब कर देगा वज़ह आप जानते हैं कि शिकारी को भी ये ललक शिकार बना देगी।

मेरे कई मित्र उसी रोग से ग्रस्त हैं जिससे आमतौर पर पढ़े लिखे सनातनी पीड़ित हो जाते हैं और वह है सत्य, अहिंसा और सेक्युलरिज़्म ( धर्मनिरपेक्षता नहीं)। इसका प्रमुख लक्षण सनातन धर्म की कुरीतियों को खोद खोद कर निकालना और अन्य धर्मों की कुरीतियों में साक्षात ईश्वर के आदेश की मुहर दिखने लगती है जैसे घूँघट प्रथा बुरी और बुर्का प्रथा एक अज़ीमोशान सलीका, दशहरे का मूर्ति विसर्जन दकियानूसी पर ताज़िये का ज़ुलूस में रूहानियत और पाकीज़गी, सनातन धर्म के कर्मकांड पोंगा पन्थी पर सेण्टा क्लाज़ के गिफ़्ट डाइरेक्ट जीसस के दया का प्रतीक, 3 तलाक पर फ़ैसला धार्मिक मुद्दों में हस्तक्षेप पर 377 धारा की समाप्ति से समलैंगिकता का प्रचार प्रसार तरक्कीयाफ़्ता होने का तमगा वगैरह वगैरह॥

दरअसल मैं इन मित्रों का स्वागत भी करता हूँ कारण चान्दी का चम्मच मुँह में लेकर पैदा हुए एक अनुभव हीन के पीछे छिप कर खड़े विपक्ष की वज़ह से संसद में जो विपक्ष नहीं दिखाई देता रहा था उसकी भूमिका इस सेक्यूलर मित्रों की फ़ौज़ ने पूरी कर दी है।

अब एक मुद्दा चीन के खिलाफ़ युद्ध न छेड़ कर पाकिस्तान के खिलाफ़ विहुल क्यों फूँकना चाहिये इस सन्दर्भ में । यह बात सोचनी पड़ेगी कि चीन एक सम्प्रभु सत्ता है जो सीमा पर बदतमीजियाँ तो करता है पर सीधे तौर पर भारत में अस्थिरता का बढ़ावा नहीं दे रहा है और उसकी ओर से नाकाबिल ए बर्दाश्त मुद्दों पर भारत भी अपना कड़ा रुख दिखा चुका है और डोकलाम उदाहरण है पर पाकिस्तान एक सम्प्रभु राष्ट्र के रूप में एक छ्द्म युद्ध को बढ़ावा दे रहा है और खुद तमाशबीन की तरह मासूमियत का इज़हार कर रहा है। कश्मीरी मिलिटेण्टों की प्रायोजित हरकतों को वह कश्मीरियों के असन्तोष का नाम दे देता है और खुद प्रच्छन्न गाड फ़ादर की भूमिका में बैठा रहता है।
अमरनाथ की बस पर हमला हो या उड़ी या पुलवामा अटैक, २६/११ का मामला हो या बाम्बे ब्लास्ट हर कारिस्तानियों के तार पाकिस्तान की सरहदं के अंदर हीं जुड़े मिलते हैं। इस प्रच्छन्न युद्ध का दोषी पाकिस्तान है जिसमें चीन की संलिप्तता नकारी नहीं जा सकती है पर आतंकियों के छापामार युद्ध से अगर निज़ात पानी हो तो आतंकवाद की आग को मिलने वाली आक्सीजन को रोकना होगा मतलब उसका पाकिस्तान कनेक्शन काटना होगा और इसी लिये युद्ध अनिवार्य है।

आज़ादी बड़ी मँहगी चीज़ है मेरे दोस्त। आज़ाद कश्मीर पाकिस्तान के कब्ज़े में सिसकता कश्मीर है बरना मिग और मिराज के अटैक के बाद कम से कम कराहता ज़रूर पर रोने का हक़ भी आज़ाद मुल्क के हिस्से में हीं आता है।हाँ उन बम के धमाकों से हमारे सेक्युलरों की लाबी ज़रूर चीख रही है पर उस गुलाम कश्मीर के बाशिन्दों को तो मातम का हक भी नहीं।

ये मानने में कोई गुरेज़ नहीं कि आज़ादी भले हीं अनशन करके हासिल कर लीजिये पर अगर आज़ादी को कायम रखना है तो युद्ध के लिये हर पल तैय्यार रहना पड़ेगा।

मैं सत्ता की तरफ़दारी में ये लाइनें नहीं लिख रहा हूँ। मेरे लिये भारत प्रथम है और आज की सत्ता मुझे देश हित में ज्यादा खड़ी दिख रही है बरना कई नेता तो लाशों की गिनती में घोटाले के बीज देख रहे हैं। हम एक ऐसे युद्ध से दो चार हो रहे हैं जिसमें पाकिस्तान को सिर्फ़ हथियार भेजने पड़ रहे हैं चलाने वाले हाथ और छलनी होने वाले सीने हमारे अपने हीं हैं। एक बड़ी शल्य चिकित्सा की आवश्यकता है इस कश्मीर के लिये पर बेकाबू हाथों के पत्थर और चीन व पाकिस्तान के सौजन्य से प्राप्त हथियारों के बदौलत हमारा कश्मीर शान्त हीं नहीं हो रहा है।

बाढ़ में राहत पहुँचाकर सेना ने, भारत की सत्ता ने सदाशयता दिखाई पर क्या इस मानवीय गुण के प्रदर्शन ने कुछ भी सकारात्मक किया ? ज़वाब आपको खुद मिल जायेगा।

युद्ध के लिये सन्नद्धता ने हीं सीमापार गये हुए सैनिक की सहज वापसी संभव किया है पर फिर भी अगर किसी को मानवीय मूल्यों के माध्यम से आतंकवाद का नाश और पाकिस्तान में सुधार दिखाई दे रहा है तो मान लीजिये कि वह सो रहा है और सपना देख रहा है।

युद्ध कदापि एक सर्वमान्य हल नहीं हो सकता है आपके मानवीय मूल्य तभी विरोधियों को दिखाई देंगे जब आप अमानवीय शक्ति का प्रदर्शन करने में सक्षम हैं। घर में ज़बरन घुसने वाले डाकुओं को वेलकम लिखा डोर मैट आकर्षित नहीं कर सकता। मानवीय संवेदनाएँ शान्ति पूर्ण परिस्थितियों में ही असरकारी होती हैं और किसी प्रायोजित अशान्ति को शान्ति में बदलने के लिये युद्ध अनिवार्य है।

उत्तिष्ठ_भारत

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