शिव : अकेला ईश्वर जिसमें हैं मनुष्य के सारे गुण

शिव एक ऐसे देवता हैं एक ऐसे ईश्वर हैं जो आर्य, अनार्य, देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, पापी, पुण्यात्मा, आस्तिक, नास्तिक, जीवित या मृत, भूत या पिशाच सब के आदरणीय हैं।

एक आम आदमी जैसा ही तुनकमिज़ाज़ देवता जो एक दो पल में स्वतः व्यक्त श्रद्धा से क्षण में प्रसन्न होकर राक्षसों को भी इन्द्र पद देने में समर्थ है परन्तु अगले ही पल क्रुद्ध होकर कामदेव के अनश्वर शरीर को भष्म करने में भी देर नहीं करता है।

उसे रावण रचित शिव ताण्डव स्तोत्र सुनने में आनन्द आता है वहीं दूसरी तरफ राम की निष्काम श्रद्धा के वशीभूत होकर आर्यावर्त के आखिरी भूमि पर रामेश्वर नाम से प्रतिष्ठित हो जाता है और वह भी उसी प्रिय भक्त रावण के शत्रु के लिये।
भक्तों की तपस्या का फल देते समय काल और अपने सामर्थ्य की सीमा के परे जाकर भी वरदान देने में इतना बेतकल्लुफ़ कि भस्मासुर को वरदान देकर खुद हीं उसके जाल में फँसने वाला सर्व शक्तिमान आपने कहीं देखा है?

अपनी पत्नी सती के लिये ससुर दक्ष प्रजापति का अपमान सहकर भी मौन रहने वाला पर वहीं सती के देहत्याग के वाद उसी दक्ष का गला काटने वाला एक आम मनुष्य सरीखा देवता किसे प्यारा नहीं होगा ?
पूरे अपौरुषेय ग्रन्थों जैसे वेद , उपनिषद , पुराण को पढ़कर देख लें अपनी पत्नी की मृत्यु पर उसकी मृत देह को अपने काँधे पर उठा कर युगों तक पागलों की तरह भटकने वाला प्रेमी विश्व की किसी संस्कृति के पास नहीं है। कभी अपने ईश्वर प्रभु श्री राम के लिये हनुमान को बन्दर बनाकर खुद मदारी बनने वाला औघड़ कभी कुछ हीं साल बाद समुद्र किनारे उन्हीं के कर कमलों से अपनी पूजा भी करवा लेता है।

रावण से उसके दस सिरों की आहुति लेकर कुबेर का अखण्ड साम्राज्य सहित त्रिलोक की सारी सम्पदा का अधिकारी बनाने वाला शिव अपने ग्यारहवें स्वरूप के लिये एक सिर की अनुपलब्धता से क्रुद्ध भी हो जाता है और अपने एकादश रुद्र के अंशावतार पवनपुत्र हनुमान के हाथों उसके संहार की भूमिका भी लिखनेवाला आशुतोष कब आशुक्रुद्ध बन जाये पता नहीं।

एक मात्र देवता जो संगीत और नृत्य का मर्मज्ञ है और खुद नटराज कहलाता है। एक अनोखा देव जो भक्त की तपस्या से प्रसन्न होने पर किरात के रूप में दो दो हाथ करके उसकी ताकत आजमाता है और उसे सृष्टि का अनोखा अद्वितीय मानव बना देता है जिसे पाशुपतास्त्र और ब्रह्मास्त्र दोनों की विधि आती हो और वह भक्त है अर्जुन।

सारे देवता जहाँ अपने ऐश्वर्य प्रदर्शन में लीन रहते हैं वहीं शिव का दिगम्बर स्वरूप और व्याघ्रचर्मावृत रुप, चिता भष्म आवेष्टित शरीर, बूढ़े बैल नन्दी की सवारी और हाथों में त्रिशूल और डमरू उन्हें यायावर स्वरूप में ढालता है। सृष्टि के विपन्नतम व्यक्ति से भी हीनतम वस्त्र पहनने वाला यह हर आम इन्सान को अपने जैसा लगता है इसीलिये आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि पूरे भारतवर्ष में सबसे ज्यादा मन्दिर अगर हैं तो शिव और हनुमान के ही मिलेंगे।

ना काहू से दोस्ती ना कहू से बैर वाला एटिट्यूड रखने वाला यह ईश्वर ज़हर और नशीले पदार्थ को भी भक्त की ओर से सहर्ष स्वीकार करता है और समुद्र मन्थन का सारा ज़हर खुद पी जाता है। अपने सभी आराधकों को कभी अपना प्रसाद ग्रहण करने को भी विवश नहीं करता है और हर हाल में भक्तों की अर्द्ध प्रदक्षिणा ही स्वीकार करता है।

परन्तु यदि भक्त एकात्म भाव से समर्पित हो जाये तो उसे किसी अन्य देवता के आराधना की ज़रूरत हीं नहीं रह जाती है इस लिये परम्परा कहती है कि जो शिव का प्रसाद ग्रहण करता है उसे किसी भी अन्य देवता के प्रसाद को ग्रहण करने की आवश्यकता हीं है।

शिव की भक्त वत्सलता का क्या उदाहरण दिया जाये कि दक्ष के शाप से क्षय रोग ग्रस्त चन्द्र के शरणागत होने पर उसे अपने मस्तक पर ग्रहण किया और उस शाप से लगभग मुक्त हीं कर दिया । भगीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से उतरती गंगा की तीव्र धारा को अपनी जटाओं में थामने को तैयार हो जाने वाला यह भोला ईश्वर गंगा के अभिमान को भाँपकर उसे वर्षों तक अपनी जटाओं में उलझाये रखता है और पुनः भगीरथ की प्रार्थना पर हीं गंगा को जटाओं से नियन्त्रित रूप से मुक्त भी करता है।

भारतीय कृषक के रूप को धारण करने वाला यह महादेव सदैव एक आम आदमी दिखता है और उसी की तरह सोचता भी है। कवि विद्यापति की नचारी सुनने के लिये उनका नौकर उगना बनने वाला यह ईश्वर सचमुच अनोखा है । ब्रह्मा और विष्णु जहाँ अपने ४ मुँह और ४ हाथों से कुछ विशिष्ट दिखते हैं वहीं शिव का स्वरूप आम तौर पर हाशिये पर खड़े जन सामान्य से मेल खाता है और शायद समता मूलक समाज कि कल्पना को साकार करने वाले साम्यवाद को साक्षात अपनी जीवन शैली में उतारने वाला यह एक अकेला सर्वशक्तिमान है मतलब देवताओं के समाज का अकेला वामपन्थी या कम्यूनिस्ट।

शिव का स्वरूप इतना व्यापक है कि बुद्ध और महावीर के पंच महाव्रत का पालन करने वाला और खासकर अपरिग्रह को अपने चरित्र मे उतारने वाले इस शिव से लगभग सारे पीर पैगम्बरों के चरित्र मिलते हैं । गौतम बुद्ध , वर्धमान महावीर या जैन धर्म के बाकी सारे तीर्थंकर , ईसा, मूसा , नानक , श्रीचन्द उदासीन , मत्स्येन्द्रनाथ , गोरखनाथ, नानक, आदि शंकराचार्य ( हजरत मुहम्मद भी ऐसे हीं होंगे पर मैं विश्वासपूर्वक नहीं कह सकता क्योंकि मेरी जानकारी अधूरी है), कबीर , रैदास , तुलसी या सूर सबके सब शिव हीं दिखेंगे। आगे क्या कहूँ गाँधी और विनोबा तक में वह छवि दिखेगी। बाबा आमटे, नानाजी देशमुख, सुन्दरलाल बहुगुणा और आज के अनादरित अन्ना की उस आदर्शवादी छवि में जब वे लोक पाल के लिये अनशन पर थे आपको शिव स्वरूप के दर्शन होंगे पर जैसे हीं स्वार्थ के कण उनसे चिपटे वे कब शिव से शव बन गये पता भी नहीं चलेगा।

इस महाशिव रात्रि में स्वयं में शिव को ढूँढें और उसमें सहायता करेगा आदि शंकराचार्य का निर्वाण षटक …..

मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु:
न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥

ओम्

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY