युद्ध और शान्ति

घर्षण ही जीवन है। ऊर्जा के लिए घर्षण ही एकमात्र उपाय है। यदि एक सांस बाहर और एक अंदर न हो तो मुमकिन नहीं जीना। अब योग में ध्यान का महत्व है। ध्यान अपने आप में घर्षण का प्रतीक है। त्यागने की प्रक्रिया। विचारों को केंद्रित करने की जद्दोजहद। ये एक लगातार की जाने वाली ऐसी विधि है जिसका परिणाम बहुत बाद में ध्यान लग जाने जैसी स्थिति के रूप में आता है।

मेजर गौतम राजऋषि का कथन है “युद्ध की ज़रूरत हो तो युद्ध, और प्रेम की तो प्रेम… और ज़रूरत पड़े तो दोनों साथ भी!” इसका गम्भीर रूप से विवेचन करने की ज़रूरत है। ये कथन जब किसी सैन्य मेजर के मुखारविन्द से आता है तो समझना सरल हो जाता है कि युद्ध और शान्ति के मध्य असल क्या है?

सेना में प्रविष्ट होने वाला हर युवक महज किसी नौकरी के लिए नहीं बल्कि वो देश को समर्पित होकर ही अपनी सेवाएं देने पहुंचता है। युद्ध करना उसका एकमात्र उद्देश्य भी है और युद्ध रोकना भी। शान्ति स्थापना के लिए ही वो देश की अग्रिम पंक्ति में खड़ा स्वयं को समर्पित रखता है। उसके लिए फिर देश ही सर्वोपरि है। ये वो खुद भी जानता है और उसके परिवारजन भी।

वो जानते हैं कि सैनिक के जीवन का उद्देश्य क्या होता है! ये एक बड़ा विषय है किंतु इतना समझने योग्य कि शान्ति के लिए सैनिक का महत्व सर्वोपरि है। सैनिक युद्ध जैसी स्थितियों के मध्य देश को सुरक्षित भी रखता है और शांतिदूत की तरह भी निखरता है।

बहरहाल, मानव विकास क्रम में हिंसा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। युद्धों का महत्व है और उसके पश्चात शान्ति की एक बनाए रखने वाली गति है। शान्ति नामक शब्द संघर्ष से ऊब कर पैदा हुआ शब्द है। शान्ति एक ऊब है। ये जो युद्ध न करने की तख्तियां उठाए घूम रहे लोग हैं , ये खुद एक तरह से लड़ रहे हैं इसके खिलाफ कि युद्ध न हो। युद्ध हो और युद्ध न हो जैसी बातें उन विचारों, भावनाओं के मध्य की जंग है जिसका परिणाम ही शांति है। चाहे युद्ध हो या युद्ध न हो। फिर क्यों है ये संघर्ष कि युद्ध न हो?

पूरी दुनिया में जो देश बंटे हैं या कह दें बने हैं ये शान्ति के बाद नहीं बल्कि युद्ध के बाद बने है। यानी शान्ति युद्ध के बाद की स्थिति है। इसके लिए एक देश को बहुत सारे उद्ध्म करना पड़ते हैं। शान्ति के लिए ताउम्र लड़ते रहना है। युद्ध के लिए एक अवधि तक। फिर भी हम शान्ति चाहते हैं युद्ध नहीं। क्योंकि युद्ध में आँखों के सामने मौतों का तांडव होता है। बिछड़ते हैं सगे-सम्बन्धी। असमय। एक भय है। दुःख है। ये मानवीय स्तर की भावनाएं हैं। किंतु ये भी मानवीय स्तर की भावनाएं ही हैं जो जीत के लिए, देश के लिए मर मिटने को आतुर है। मर मिटना शौर्य है, जांबाजी है और रोमांच है। जीवन रोमांच का ही प्रतिनिधित्व करता है। मगर शान्ति उसे थमाती है। क्या बिना संघर्ष शान्ति का कोई लाभ है?

बिना थके आराम करने का कोई अर्थ है क्या? जीवन अर्थों में जीना और मरना बहुत साधारण सी बात है। कुछ शास्त्रों में तो मृत्यु का समय निर्धारित बताया गया है यानी जब आनी है तब ही आनी है। कौन नहीं मरता? बिना युद्ध लड़े भी लोग मरते हैं, और जिन्हें हम असमय कहते हैं वो भी मरते तो हैं ही बिना युद्ध के। तो मृत्यु युद्ध का परिचायक मान लें और इसका विरोध करें ये हजम होने जैसी बात नहीं लगती बल्कि ये एक ऐसे ख़ौफ़ की बात है जो अपने अस्तित्व के लिए ही खतरनाक स्थिति की जन्मदाता है।

युद्ध करो- घोष वाक्य है कृष्ण का। जब कोई विकल्प शेष न हो तब ये एक अवश्यम्भावी स्थिति है। जो अवश्यम्भावी है उसके लिए युद्ध न करने जैसी भावनाओं का प्रचार करना कोरी बकवास है और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। न ही मानवीय स्तर पर भी ये उचित है। ये मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं बल्कि स्थापना का प्रतीक है। मानव की वीरता का लक्षण। क्योंकि प्रारम्भ से आज तक यही होता रहा है । क्योंकि यही होते रहने से कोई भी रोक नहीं सकता। क्योंकि यही मानव का लक्षण है। क्योंकि यही प्राणिमात्र का स्वभाव है। क्योंकि यही शान्ति के लिए आवश्यक है, क्योंकि यही शान्ति की स्थापना का सूत्र है।

बावजूद युद्ध नहीं चाहिए। तानाशाही मानसिकता को छोड़ दें तो कोई युद्ध नहीं चाहता। महाशक्ति बन जाने वाले देश भी युद्ध नहीं चाहते। फिर क्यों ये आतंक है? आतंक तानाशाही प्रवृत्ति का एक मुख्य तत्व है जिसके खात्मे के लिए आवश्यक हो जाता है युद्ध। और हर वो देश जो आतंक को पोसता है उसके खिलाफ एकजुट होकर लड़ना ही मानवता की स्थापना करना है। निश्चित है कि ये भी रक्तरंजित होगा। किन्तु तब जब सारी कोशिशें व्यर्थ हो जाए।

भारत शान्ति प्रिय देश है। भारतवासी शान्ति के योगी हैं। किंतु यहीं यदि नागा सम्प्रदाय है तो वो इसीलिए कि शान्ति में खलल डालने वाले असुरों का संहार ज़रूरी है। इसलिए युद्ध किसके खिलाफ है ये देखा जाना और उसके साथ हो जाना ही शांति के प्रयास में आहुति डालना है। आतंक कब तक सिर चढ़ कर बोलेगा! कितने मासूमों, निरपराध लोगों की बलि ले चुके इस आतंक को खत्म करने हेतु एक बड़ी सैन्य कार्यवाही ज़रूरी हो जाती है। इसलिए जो तख्तियां आतंक के विरोध में युद्ध की उठी ज्वाला के खिलाफ हैं वो मनोबल गिराने के लिए होती हैं। इससे बाज़ आना ज़रूरी है।

अमिताभ जगदीश

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